रविशंकर पंत जी पत्रकारिता के बेहद विनम्र और भद्र पुरुष थे. बनारस में एक साल से अधिक समय उनके सहयोगी के रूप में काम करने का मौका मिला. बिल्कुल पत्रकार मित्र के रूप में दिखते थे. आज के दौर में कुछ एक सम्पादकों के दरोगई भूमिका से बिल्कुल अलग थे. पंत जी बनारस की संस्कृति में रच-बस गए थे. हिंदुस्तान से उनकी विदाई की पीड़ा उनके सहयोगियों को अखरती रही.
बनारस में किराया के कमरे में सालभर रहे और उस दौर में उन लोगों ने भी उनसे कन्नी काट ली, जो नौकरी के लिए चिरौरी करते थे. पंत जी का जाना हम सबके लिए वज्रपात के समान है. कच्ची गृहस्थी में किसी पत्रकार का जाना मन को झकझोर देता है. खासकर पंतजी जैसे पत्रकार का, जिन्होंने जीवन में कभी दंद-फंद नहीं किया. ऐसे शख्स के परिवार को भगवान जरूर सामर्थ्य देंगे जिससे वे जिंदगी का बाकी समय बिता सकें. एक नन्हीं सी बिटिया उनकी गोद में अक्सर उछल-कूद करती थी. हम समझते हैं उससे भी बहुत मोहब्बत करते थे. उसका हाल सोचकर आंखों से बस आंसू गिरते हैं.
धर्मेंद्र सिंह
बनारस





