: भाग एक : देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर वाले कथन को अक्सर चरितार्थ करने वाला राज्य गोवा सिर्फ पानी प्राकृतिक छंटा और खूबसूरत समुद्री तटों, पर्यटन से लेकर ऐय्याशी के स्वर्ग से लेकर शराब और काजू फेनी की नगरी के नाम से ही विख्यात नहीं है. यहाँ के लोग भले ही मस्त हों मगर यहाँ की राजनीति और राजनेतागण गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर हैं और कब किस मंत्री की कुर्सी छीन जाये और कब किस सरकार का तख्ता पलट जाएँ, ये कहना राजनीतिक पंडितों के लिया भी कठिन है.
गोवा की सड़कों पर एक कहावत बड़ी ही मशहूर है कि भले ही दो लोग कुत्ते-बिल्ली की तरह किसी बात पर दिन भर लड़ रहे हों पर शायद शाम को दोनों को एक ही बार में एक ही टेबल पर साथ-साथ पीते देखा जा सकता है. मूलतः यहाँ के लोग बड़े ही मस्त मिजाज़, मिलनसार और जेवत वाले हैं. मगर यहाँ की राजनीति है जिसने राज्य के चाल-ढाल से लेकर उनके तेवर तक को बदल दिया. जोड़-तोड़ की राजनीति में गोवा उत्तर पूर्वी राज्यों को भी कई बार मात दे चुका है. गोवा की राजनितिक अस्थिरता की इस से बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है कि साल १९९० और २००५ के बीच यहाँ पर कम से कम १५ मुख्य मंत्री बदले गए. ये कमाल सिर्फ दिगंबर कामत ही कर दिखा पाए कि मुसीबतों के बाद भी उन्होंने अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी विगत पांच साल में नहीं छीन जाने दी, भले ही कांग्रेस पार्टी और राज्य का वैसे कबाड़ा क्यों न हो गया हो.
३ मार्च को होने वाले चुनाव में इस बार २१५ उम्मीदवार मैदान में हैं और इस बार ये लगता है कि वहां के मतदाता शायद अपना कुछ अलग ही रंग दिखाएँ क्यों कि गोवा के चुनावी मैदान में फिर परिवारवाद और खनन माफिया का बोलबाला है और जनता जनार्दन उनको सबक सिखाने के लिये तैयार हो रही है. ४० सीटों वाली विधान सभा में पिछले चुनाव में कांग्रेस तो १६ सीटें मिली थी जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने ३ सीटें हासिल की थी. भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ चौदह सीटें ही मिल पायी थी और बाकी बचे सीटों में स्थानीय पार्टियों ने अपना कमाल दिखाया था. इसबार चुनावी मैदान में कई बागी और निर्दलीय उम्मीदवार हैं, जो कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के लिखे खासी मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं.
इस बार भी कांग्रेस आला कमान ने परिवारवाद को झाड़-पोंछ कर बड़े की कारगर ढंग से मैंदान में उतारा है. भले ही गोवा की जनता उनसे तंग क्यों ना आ गयी हो. उम्मीदवारों को चयन करने वाली कमिटी के प्रमुख आस्कर फर्नांडिस से जब सवाल किया गया कि क्या पूरी पार्टी में और बेहतर उम्मेदवार नहीं थे? तो उनका जवाब था कि जीतने की योग्यता को ही मुख्य आधार बनाया गया और परिणाम सामने है. कांग्रेस पार्टी ने इस बार कम से कम १४ उम्मीदवारों का टिकट दिया जो परिवारवाद की श्रृंखला से आते हैं. और उनके साथ ७ और ऐसे प्रत्याशी हैं, जो फूल के साथ कीड़ा भी भगवान के पास चला गया वाली कहावत को चरितार्थ कर शायद चुनाव जीत जाएँ. मतलब ये कि खुद कांग्रेस पार्टी ने ही साबित कर दिया कि बाहुबली और परिवारवाद वाले नेताओ की तुलना में वो दिगंबर कामत और प्रदेश कांग्रेस अधक्ष सुभाष शिरोडकर को कुछ नहीं समझती है. पार्टी की नीति, आदर्श और सिद्धांत गया तेल लेने. जिसकी लाठी उसकी भैंस और जब बाबा आस्कार का वरदहस्त हो तो फिर क्या कहना?
गोवा में अलेमाओ परिवार के ४ लोगों को टिकट दिया गया है, जिसमे चर्चिल और जोकिम अलेमाओ के साथ-साथ उनकी दो औलादें भी शामिल है. वलंका अलेमाओ को कांग्रेस ने बेनौलिम से टिकट थमा दिया जब की जोकिम के बेटे युरी को टिकट का जुगाड़ एनसीपी के कोटे से हो गया. यह दीगर बात है कि अलेमाओ बंधुओं के अत्याचार का आलम यह है कि उनके खिलाफ गोवा की पुलिस भी केस दर्ज करने की हिम्मत नहीं करती. दक्षिण गोवा में अलेमाओ का कानून ही चलता है. अगर फ्रेंकी सेक्वेरा जैसा कांग्रेस कार्यकर्ता बेनौलिम क्षेत्र से अपनी उम्मीदवारी के लिए परचा भरता है तो दूसरे दिन उसकी दुकान जला दी जाती है. अगर सविओ रोड्रिक्स जैसा पत्रकार ब्रिटिश संसद के द्वारा अलेमाओ की चुनावी सभा में खुलेआम वोट मांगते हुए वीडियो की तलाश में जाता है, तो वलंका अलेमाओ खुद उनको फोन पर उसकी दोनों बेटियों को घर से उठा लेने की धमकी देती है. सारा महकमा चुप रहता है. कांग्रेसी नेता कुछ सरे आम बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. ये वही वालंका अलेमाओ हैं, जिसने एक बार सरेआम ऐलान कर दिया था कि उसको बेनौलिम से टिकट देने के लिए कांग्रेस आला कमान को झुकना पड़ेगा और उसने कांग्रेस आला कमान को झुका कर दिखा दिया. कुल मिलाकर लब्बो-लुबाब ये है कि आला कमान के चहेते गोवा में जाकर अलेमाओ के सामने आज भी दुम हिलाते दिखते हैं चाहे वो आस्कर फर्नांडिस हों या फिर राज्य प्रभारी जगमीत सिंह बरार या फिर पी सुधाकर रेड्डी. ऐसे में गोवा की जनता इसबार कांग्रेस पार्टी का क्या हश्र करेगी ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
अगर खबरचियों की माने तो अलेमाओ खेमे ने कुल ६ सीटे कांग्रेस पार्टी से झटक ली है. कुर्तोरिम से कांग्रेस के प्रत्याशी को भी अलेमाओ खेमा का सिपहसलार माना जाता है और यही हाल फतोर्दा के एमके शेख का भी है जो उसके मुरीद हैं. उसके बाद बारी आती है बाबुश मोंसेरात के खेमे का जिसमें कुल ७ प्रत्याशी हैं. कामत सरकार में मंत्री रहे मोंसेरात की दादागिरी का आलम ये है कि उन्होंने संतक्रूज़ की महिला विधायक का टिकट कटवा कर अपने आप को वहां पर काबिज़ कर दिया और अपनी पत्नी जेनीफर को बगल के तालेगाओ क्षेत्र से कांग्रेस का टिकट दिला दिया. उनके खेमे में कोंकण के उम्मीदवार इसिडोर फर्नांडिस, पणजी से नितिन पारेख, कम्बर्जुआ से पांडुरंग मद्कैकर और प्रियोल से उनके भाई धाकु मद्कैकर के अलावा कलंगूट से अग्नेल फर्नांडिस भी हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मापूसा के प्रत्याशी आशीष शिरोडकर भी उनके करीबी बताये जाते हैं. उसके बाद आता है राणे के कुनबा का, जिसमें मौजूदा विधान सभा अध्यक्ष प्रताप सिंह राणे परये से और उनके पुत्र तथा मौजूदा मंत्री विश्वजीत राणे वालपोई से चुनाव लड़ रहे हैं. साथ में संक्वेलिम से प्रताप गवास, बिचोलिम से राजेश पत्नेकर, पर्नेम से दयानन्द सोपते और सिओलिम से उदय पय्लेकर भी शामिल हैं. इसके अलावा रवि नाइक और उनके पुत्र रितेश नाइक भी मैदान मैं हैं.
मतलब ये हुआ कि ४० सीटों वाली विधान सभा में अलेमाओ-मोंसेरात-राणे गुट अकेले ही २१ सीटों पर काबिज़ होगा, अगर उसके सारे प्रत्याशी चुनाव जीत गए और फिर उसके बाद कांग्रेस पार्टी का क्या होगा ये तो आला कमान जाने या फिर गोवा के प्रभारी गण. ज़ाहिर है कि सीटों की ऐसी बन्दर-बाँट से कांग्रेस के पुराने और नए कार्यकर्ता खासे नाराज़ हैं. पूरे कांग्रेस खेमे में भयानक रोष व्याप्त है और वो अपना गुस्सा मत दान के दिन ही निकालेंगे. मगर उस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात है गोवा चुनाव पर खान और खनन माफिया का लम्बा साया जिसकी छांव में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों आराम फरमा रहे हैं. इसमें चौंकाने वाली तीन बातें है. एक तो ये है कि दिगंबर कामत विगत १२ सालों से खान मंत्री रहे हैं, चाहे वह मनोहर परिकर की सरकार हो या फिर कांग्रेस की. ये विभाग उन्होंने कभी नहीं छोड़ा. गोवा में राजनीति से भी बड़ा व्यापार खान और खनिज का है, जिस हमाम में सब नंगे और एक साथ हैं. परिकर तीन सालों के कहते चले आ रहे हैं कि खनन माफिया का कारोबार गोवा में ४००० करोड़ से ऊपर का रहा है. मगर विधान सभा में भी इसके लिए उन्होंने कभी अपने पुराने मित्र कामत पर ऊँगली नहीं उठाई. दबाब में आकर भले ही सरकार ने शाह कमीशन बिठा दिया मगर उसका फैसला तो चुनाव के बाद ही होगा.
फिलहाल दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र में खनन तथा राज्य की खनिज सम्पदा के दोहन के बारे में एक से विचार हैं. दोनों पार्टियों ने खान और खनन से जुडी कई बातों पर एक जैसी प्रतिक्रियाएं भी दी है. राज्य में खनिज लोहे के ढ़ोने से लेकर उसके मूल्यों पर भी अपनी नीतियों का खुलासा किया है. मुख्यमंत्री दिगंबर कामत से लेकर मनोहर परिकर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और जोकिम अलेमाओ ज़माने से खनन व्यवसाय से जुड़े रहे हैं. संगुइम, कुरचोरिम, सवार्देम और बिचोलिम गोवा के ऐसे ४ विधान सभा क्षेत्र हैं जहाँ खनन माफिया का वर्चस्व है और दोनों पार्टियों ने ऐसे ही उम्मीदवारों को उतारा है. मिसाल के तौर पर युरी अलेमाओ से लेकर खनिज परिवहन ठेकेदार सुभाष फलदेसाई इस बार चुनाव मैदान में हैं. फलदेसाई को टिकट देने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने दो बार जीते अपने विधायक वासुदेव मेंगओंकर का पत्ता काट दिया. सर्वोदेम में निर्दलीय विधायक अनिल सल्गओंकर का वर्चस्व रहा है और इस बार भाजापा बेवाहर पर एक और खनिज परिवहन के बड़े ठेकेदार गहेश गओंकर को मैदान में उतारा है. कांग्रेस के उम्मीदवार गोविन्द सावंत भी इसी क्षेत्र से जुड़े हैं. बिचोलिम क्षेत्र से भी खनिज माफिया वाले लोगों की चांदी है. दूसरी तरफ एमजीपी ने दीनार तरकार को संतक्रूज़ से उतारा है. कुल मिलकर ये कहा जा सकता है कि पार्टी चाहे कोई
भी हो, गोवा की खनन माफिया ने तकरीबन १० जगहों पर अपने चुनावी मोहरे फिट कर दिए हैं. जीत कर जो भी आएगा वो उनकी रहनुमाई करेगा.
जारी…
लेखक अजय एन झा वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक हैं. ये हिंदुस्तान टाइम्स, आजतक, डीडी न्यूज, बीबीसी, एनडीटीवी एवं लोकसभा टीवी के साथ वरिष्ठ पदों पर काम किया है. अजय से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.





