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जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर में कर्मचारियों की चौथाई सेलरी रोकी गई

: प्रबंधन ने सुनाया पूर्व कंपनी का पे स्लिप जमा करने का फरमान : जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर में कार्यालय का माहौल गरम है. खबर है कि कर्मचारी बेहद गुस्‍से में हैं. बताया जा रहा है कि सभी लोगों की 25 प्रतिशत सेलरी प्रबंधन ने रोक ली है. जिसके चलते पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों में असंतोष व्‍याप्‍त है. बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने कहा है कि जब तक सभी लोग पे स्लिप और अपने डाक्‍युमेंटस नहीं जमा कराते हैं तब तक सेलरी नहीं दिया जा सकता. सभी लोगों से जल्‍द से जल्‍द सभी कागजात जमा करने के फरमान सुनाए गए हैं.

: प्रबंधन ने सुनाया पूर्व कंपनी का पे स्लिप जमा करने का फरमान : जनसंदेश टाइम्‍स, गोरखपुर में कार्यालय का माहौल गरम है. खबर है कि कर्मचारी बेहद गुस्‍से में हैं. बताया जा रहा है कि सभी लोगों की 25 प्रतिशत सेलरी प्रबंधन ने रोक ली है. जिसके चलते पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों में असंतोष व्‍याप्‍त है. बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने कहा है कि जब तक सभी लोग पे स्लिप और अपने डाक्‍युमेंटस नहीं जमा कराते हैं तब तक सेलरी नहीं दिया जा सकता. सभी लोगों से जल्‍द से जल्‍द सभी कागजात जमा करने के फरमान सुनाए गए हैं.

बताया जा रहा है कि दूसरे अखबारों से छोड़ कर आए लोग अब फंस गए हैं. शैलेंद्रमणि त्रिपाठी ने सभी लोगों के लिए मौखिक रूप से सेलरी निर्धारित कर दी थी. इन लोगों से पे स्लिप नहीं लिए गए थे, जिसने जितना बताया उसके हिसाब से उसकी सेलरी तय कर दी गई. लिहाजा किसी ने भी डाक्‍युमेंट सबमिट नहीं किया. जब बात सेलरी की आई तो एचआर और एकाउंट विभाग ने सबसे पे स्लिम मांग ताकि उससे बीस से पचीस फीसदी अधिक सेलरी तय की जा सके. खबर है कि अब तक ज्‍यादातर लोगों ने सेलरी स्लिप जमा नहीं किया है.

हालांकि असली खबर यह है कि अब शैलेंद्र मणि त्रिपाठी एवं एमडी अनुज पोद्दार के बीच वर्चस्‍व की लड़ाई के चलते यह हुआ है. संजय तिवारी को कारपोरेट एडिटर बना दिया जाना शैलेंद्र मणि को रास नहीं आ रहा है. संजय की रिपोर्टिंग भी सीधे एमडी को है, जिससे मामला और बिगड़ रहा है. बताया जा रहा है कि संजय तिवारी ने आते ही शैलेंद्र मणि के जागरण वाली स्‍टाइल में बांटी गई सेलरी को कारपोरेट स्‍टाइल में करने की कोशिश शुरू कर दी, जो अब शैलेंद्र मणि एंड कंपनी को भारी पड़ रही है.

सूत्र बताते हैं कि शैलेंद्र मणि की 170 कर्मचारियों वाली लिस्‍ट को सीजीएम अनिल पाण्‍डेय ने काट कर 109 तक पहुंचा दी है. उन्‍होंने अखबार का प्रिंटिंग बजट भी तय कर दिया है, जिसके चलते शैलेंद्र मणि खुश नहीं हैं. माना जा रहा है कि यह सब संजय तिवारी के सुझाव पर किया गया है. कुछ नए लोगों की भर्तियां भी की गई हैं, जिससे दोनों गुट आपस में नाराज है. यहां भी जागरण जैसी स्थिति बन गई है. गुटबाजी अभी से शुरू हो गई है. अब गुटबाजी से कर्मचारियों का कितना नुकसान होगा यह अभी बता पाना मुश्किल है. पर इस तरह के माहौल से कर्मचारी परेशान होने लगे हैं.  

बताया जा रहा है कि शैलेंद्र मणि ने जिस तरह से चेहरा देखकर सेलरी तय की है, उससे प्रबंधन भी खुश नहीं है. एक ही पद के लिए अलग-अलग लोगों को अलग-अलग सेलरी है. भड़ास जल्‍द ही एक ही पद के लिए बांटी गई अलग-अलग सेलरियों की लिस्‍ट आप तक पहुंचाने की कोशिश करेगा ताकि असली विवाद का कारण पता चल सके. बताया जा रहा है कि पूरा मामला इसी बात को लेकर फंसा है कि एक पद के लिए अलग-अलग सेलरी क्‍यों? लिहाजा अब सबकी सेलरी कारपोरेट स्‍टाइल में करने के लिए अनुज पोद्दार ने सबसे पे स्लिप की मांग की है. इसके बाद ही सभी की बकाया सेलरी दी जाएगी.

बताया जा रहा है कि इसमें मुश्किल ये आ रही है कि कुछ ऐसे लोगों की भी भर्ती कर ली गई है, जो कहीं काम नहीं करते थे या जिन्‍हें पहले पे स्लिप नहीं मिलती थी या जिन्‍हें पे स्लिप मिलती थी वे दुगुने वेतन पर यहां आए हैं. ज्‍यादा परेशानी ऐसे लोगों को है, लिहाजा वे भड़के हुए हैं. एक तरफ वे शैलेंद्र मणि से भी खुश नहीं हैं कि उन्‍हें यहां लाकर फंसा दिए तो दूसरे तरफ वे कार्यालय के भीतर एमडी अनुज पोद्दार, सीजीएम अनिल पांडेय एवं कारपोरेट एडिटर संजय तिवारी को इन लोगों की अनुपस्थिति में गरिया भी रहे हैं. मामला तनावपूर्ण है. बताया जाता है कि अगर ये लोग कार्यालय में मौजूद रहेंगे तो मारपीट भी हो सकती है.

हालांकि कर्मचारियों का कहना है कि ज्‍वाइन करने से पहले उन्‍हें इस तरह का कोई फरमान जारी नहीं किया गया था. अब इस स्थिति में वो क्‍या करें. पुराने संस्‍थान से अब कैसे अपनी पे स्लिप और अन्‍य कागजात मांगे. उनका कहना है कि उन्‍हें तो जनसंदेश टाइम्‍स लाकर फंसा दिया गया है. वे अब ना तो इधर के रहे ना उधर के हुए. अगर इतनी ही सेलरी मिलनी थी या पैसा कटना था तो वे अपने पुराने संस्‍थानों में ही भले थे. खैर, अब हल क्‍या निकलेगा ये तो समय बताएगा, पर कर्मचारियों के लिए माहौल मुश्किल भरा जरूर है.

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