मुझे लगता है, हिन्दुस्तान ने ‘आओ राजनीति करें‘ नाम का कैंपेन नहीं किया होता तो पेड न्यूज के अधिक आरोप उस पर नहीं लगते। अखबार ने इस कैंपेन को खबरों से पहले विज्ञापन में डाल कर छापा। लेकिन उसने कोई उत्कंठा पैदा नहीं की। यह मोबाइल कंपनियों या टीवी धारावाहिकों आदि बाजारू उत्पादों के विज्ञापन जैसा ही प्रतीत हुआ। कैंपेन में बड़ी गलती इसके शीर्षक वाक्य की मुझे लगती है। नीति शब्द क्रियावाचक नहीं है। इसलिये राजनीति को करने वाली चीज नहीं कहा जा सकता। नीति तो एक मार्ग है, जिस पर चलने का काम किया जाता है।
‘आओ राजनीति पर चलें’ या 'आओ राजनीति के मार्ग को साफ करें' अथवा 'आओ राजनीति के मार्ग को सही दिशा में ले चलें' जैसे शीर्षक अधिक उचित थे। इस प्रस्तुतिकरण की तैयारी के समय कंपनी दूरगामी परिणामों को नहीं सोच पायी। जिनके बारे में अब सुनने को मिल रहा है। लेकिन सच यह भी है कि चरित्र को पत्तल पर रख कर सिर्फ आदर्शों की जलेबी बांटने से कंपनियों का पेट नहीं भरता। स्ट्रिंगरों का खून भले ही पिया जाता रहे लेकिन कुर्सी पर बैठने वालों और विमानों में उड़ने वालों की तनख्वाह कहां से पूरी होगी। ईमानदार लोगों को भी अपनी तमाम जरूरतों के लिये अधिक पैसा चाहिये। और इस के लिये चुनाव से बेहतर मौका कोई नहीं होता।
‘हिन्दुस्तान’ ने भी वही किया जो सभी कर रहे हैं। लेकिन हालात की वजह से उसे दंश झेलना पड़ा है। एक तो उसने कैंपेन चलाया, दूसरे यूपी में अभी उसकी उतनी पकड़ नहीं है। तीसरे उसके तमाम लोगों ने व्यक्तिगत स्तर पर सांठगांठ की। अब अखबार ने अपने ऊपर लग रहे पेड न्यूज के आरोपों को नकारने के लिये 23 फरवरी के अंक में एक शानदार समाचार प्रकाशित किया है। दरअसल अखबार ने शरद यादव की कुछ बतबतियों से जवाब निकालने की कोशिश की है। लेकिन शरद की टिप्पणी को क्लीन चिट की तरह से प्रयोग करने से अखबार के भीतर इन आरोपों को लेकर चल रहे अंर्तद्वन्द्व और उन्हें नकारने को लेकर मचा हाहाकार सामने आता है।

भई, शरद यादव कौन हैं। एक अखबार को दूध का धुला बता कर अन्य पर कीचड़ उछालने का उन्हें अधिकार किसने दिया। ये अखबारों का अपना मामला है। चलिये उन्हें कुछ देर के लिये देश का बड़ा नेता और मार्गदर्शक मान कर उनके टिप्पणी करने को जायज मान लेते हैं। परंतु इससे उनके द्वारा की गयी इस ‘अनआफीशियल’ टिप्पणी को बड़ी खबर के रूप में आम पाठक के सामने प्रस्तुत करना बेढंगा लगता है। एक नेता के नितांत निजी क्षणों को छह कॉलम शीर्षक के साथ छापने के निहितार्थ के अलावा उस ब्रांड की छटपटाहट को समझा जा सकता है। अखबार ने खबर कितना महत्व देने की कोशिश की है, आज का मुखपृष्ठ देख कर भी अंदाजा हो जाता है। फ्रंट पेज की लीड खबर के बीच ‘विशेष कवरेज’ की हैडिंग से एक डिब्बी लगी है। डिब्बी में पहले नंबर पर इस खबर का शीर्षक दिया है।
खबर पढ कर लगता है कि ‘हिन्दुस्तान’ को दूध का धुला शरद यादव नहीं, अखबार खुद, अपने आप बता रहा है। कहावत में कहें तो अपने मुंह मिंया मिट्ठू बन रहा है। मगर पेड लूट में पीछे कोई नहीं है। प्रत्याशियों के विज्ञापन में ‘हिन्दुस्तान’ से ठीक तीन गुनी कीमत वसूलने वाला आगरा का अन्य प्रमुख अखबार तो सिर्फ इसलिये निशाने पर नहीं आया, क्यों कि वह चुप चोर बना बैठा रहा। उसने खबरों में चुनाव पर बेहद मामूली सामग्री दी। किसी प्रत्याशी की निगेटिव खबरें नहीं छापेंगे, अपने लोगों को यह कसम दी गयी। यह अखबार राजनीति के स्थानीय मुद्दों और खबरों को नहीं छापने की जलालत को आचार संहिता का दुपट्टा ओढ़ कर छिपाता रहा।
इस मायने में हिन्दुस्तान को क्रियाशील कहेंगे। उसने कैंपेन भी किया, पैसा भी बटोरा। भई जो काम करेंगे, गल्तियां भी उसी से होंगी। अपराध करना बुरा नहीं है, अपराध करके स्वीकार न करना अधिक बुरा है। हिन्दुस्तान ने जलालत भी सही और अब सफाई भी दे दी। उत्तर प्रदेश में मायावती द्वारा अपने मंत्रियों को क्लीनचिट देने के बाद कानून का काम ठंडा पड़ जाता है। शरद यादव की सफाई को पढ़ कर लोगों का गुस्सा कम हो अखबार की इसके अलावा और क्या मंशा हो सकती है। इस खबर से कुछ हासिल हो न हो, इतना तो पता चलता है कि अखबार में अपराधबोध है। इसलिये हम आशा कर सकते हैं उसमें शर्म भी अभी बची होगी। यह आशा भी कर सकते हैं कि जिसमें अपराध बोध है वह एक दिन उसे सुधार भी सकता है।
मुकेश मणिकांचन
सिरसागंज





