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अनपढ़ से लेकर डाक्‍टर तक मैदान में, सभी दलों की निगाह मुस्लिम वोटरों पर

छठे चरण के लिए उत्तर प्रदेश के चुनाव में इन दिनों गहमागहमी मची है। हर दल ने जिताऊ और फर्राटेदार हिन्दी और अंग्रेजी बोलने वालों को ज्यादा तरजीह दी है। लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी प्रत्याशी शामिल हैं जो डाक्टरेट तक की शिक्षा ग्रहण कर चुके है। सपा में साक्षर प्रत्याशी 88 हैं। जिनमें 27 स्नातक और 15 परास्नातक तथा 2 डाक्टरेट पास हैं। बसपा 19 स्नातक  और 12 स्नातकोत्तर 2 डाक्टरेट की डिग्री लिये हुए हैं। भाजपा में 26 स्नातक 11 स्नातकोत्तर और 2 डाक्टरेट हैं। पीस पार्टी में 6 स्नातक, 4 परास्नातक तथा 1 एक प्रत्याशी डाक्टरेट की डिग्री धारण किये हुए है। कांग्रेस में 10 स्नातक, 9 परास्नातक तथा एक डाक्टरेट डिग्री वाला प्रत्याशी है। भाजपा को छोड़ सपा, बसपा और कांग्रेस में कक्षा पांच पास 15 उम्मीदवार हैं।

छठे चरण के लिए उत्तर प्रदेश के चुनाव में इन दिनों गहमागहमी मची है। हर दल ने जिताऊ और फर्राटेदार हिन्दी और अंग्रेजी बोलने वालों को ज्यादा तरजीह दी है। लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी प्रत्याशी शामिल हैं जो डाक्टरेट तक की शिक्षा ग्रहण कर चुके है। सपा में साक्षर प्रत्याशी 88 हैं। जिनमें 27 स्नातक और 15 परास्नातक तथा 2 डाक्टरेट पास हैं। बसपा 19 स्नातक  और 12 स्नातकोत्तर 2 डाक्टरेट की डिग्री लिये हुए हैं। भाजपा में 26 स्नातक 11 स्नातकोत्तर और 2 डाक्टरेट हैं। पीस पार्टी में 6 स्नातक, 4 परास्नातक तथा 1 एक प्रत्याशी डाक्टरेट की डिग्री धारण किये हुए है। कांग्रेस में 10 स्नातक, 9 परास्नातक तथा एक डाक्टरेट डिग्री वाला प्रत्याशी है। भाजपा को छोड़ सपा, बसपा और कांग्रेस में कक्षा पांच पास 15 उम्मीदवार हैं।

छठे चरण में कुल प्रत्याशियों में बड़ी पार्टियों के 360 उम्मीदवारों में 2 निरक्षर, 12 साक्षर, 7 छठवीं पास, 35 आठवीं पास, 49 हाईस्कूल, 62 इंटर, 66 स्नातक, 48 प्रोफेशनल स्नातक,  62 स्नातकोत्तर, दस डॉक्टरेट तथा 7 अन्य कंडीडेट शामिल हैं। प्रदेश में 28 तारीख होने वाले छठे चरण के मतदान के लिए प्रमुख दलों ने कुल 360 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे हैं। इनमें 51 फीसदी से ज्यादा उम्मीदवार स्नातक या उससे ज्यादा पढ़े लिखे हैं। 59 प्रत्याशियों में पीस पार्टी ने एक निरक्षर प्रत्याशी भी खड़ा किया है। छठे चरण में दस उम्मीदवार पीएचडी हैं। अगर ये डाक्टर चुनाव में माननीय बनकर विधानसभा पहुंच पाते हैं तो यह यूपी के लिए वरदान की तरह साबित हो सकते हैं। लेकिन डर इस बात का है कि कहीं वह भी पिछली सरकारों के माननीयों की तरह भ्रष्टाचार के दलदल में न फंस जाएं। देखना है कि इनमें कौन विजयी होता है। सबसे ज्यादा 66 स्नातक चौथे चरण के चुनाव में थे।

मुसलमानों को लुभाने में जुटे दल  : उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सपा व बसपा में मुसलमानों के अपने पाले में लाने की होड़ लगी हैं। छठे दौर में मेरठ जोन सहित आगरा व अलीगढ़ में मतदान होना है। यहां करीब दो दर्जन से अधिक सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में रहते हैं। मुसलमानों के सहारे हवा का रूख बदलने को लालायित केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद व बेनी प्रसाद वर्मा के बाद अजित सिंह भी अब मुसलमानों को लुभाने की मुहिम में लग गए है। पहले मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट देने में दरियादिली उसके बाद उनके हक की लड़ाई का ढिंढोरा पीटने के बाद अब वोट के सौदागार आस लगाए हैं कि मुस्लिम वोटो की मलाई उनकी ‘थाली’ में गिर जाए। भाजपा भी पिछड़े मुसलमानों की पैरवी कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सम्मेलनों की तैयारियों में जुटी है। मुसलिम उम्मीदवारों को उतारने में बसपा अव्वल नंबर की पार्टी रही। समाजवादी पार्टी दूसरे व तीसरे नंबर पर कांग्रेस-रालोद गठबंधन रहा जिसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मुसलमान उम्मीदवारों को मैदान में उतारा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब ढाई दर्जन सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर मुख्य भूमिका में रहते हैं। इन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 25 से 45 फीसदी है। 2002 के चुनाव में  मुसलिम मतदाताओं ने मुलायम सिंह को अपना रहनुमा माना था लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में बिगड़ी कानून व्यवस्था व दूसरी वजहों से मुसलिम मतदाताओं ने बसपा की ओर रूख कर लिया। अबकी बार कोई दावे के साथ नहीं कह पा रहा है कि मुस्लिम वोटर उनकी जद में है। कांग्रेस ने इस बार मुसलमानों को लुभाने के लिए सिर-आसमान एक कर रखा है। वैसे नब्बे के दशक से पहले कांग्रेस का मुसलिमों पर खासा प्रभाव था। बाद में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव व बसपा सुप्रीमों मायावती के बीच मुस्लिम मतों पर हक जताते की होड़ सी लगी है। मुसलमान, भाजपा के कथित डर से कभी बसपा तो कभी सपा के साथ झूलता रहा, लेकिन इस बार मुसलमान वोटरों ने अंत समय तक अपने पत्ते नहीं खोले। इस खमोशी को देखते हुए कांग्रेस-सपा या बसपा कोई दावा करने की स्थिति में नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतों को लेकर कांग्रेस, सपा और बसपा के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है तो सपा और बसपा में भी घमासान मचा हुआ है। राष्ट्रीय लोकदल के अजित सिंह, जयंत चौधरी तथा कांग्रेस नेता राशिद अल्वी तमाम चुनावी सभा कर मुस्लिमों की बदहाली के लिए बसपा व सपा को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। अजित सिंह ने मुलायम की पार्टी पर मुसलमानों को बरगलाने का आरोप लगाया तो राशिद अल्वी ने गुजरात दंगों को याद दिलाकर उनके जख्म हरे करने की कोशिश की। मुस्लिम आरक्षण को अजित सिंह ने सामाजिक न्याय की लड़ाई बताया। मुस्लिम मतों पर नजर जमाए बसपा ने भी किला फतह करने के लिए अपने मुस्लिम चेहरों को आगे कर रखा है।

बहुजन समाज पार्टी के दिग्गज नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी व मुनकाद अली समेत दूसरे मुस्लिम नेता बड़ी संख्या में यहां सभाएं कर मुस्लिम वोटरों को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन अंतिम समय में लोकायुक्त द्वारा नसीमुद्दीन के भ्रष्टाचार के विरुद्ध सीबीआई जांच की सिफारिश से बसपा का यह मुस्लिम चेहरा दागदार हो गया है। सपा सुप्रीमो मेरठ में सभा कर चुके हैं। पिछड़े मुसलमानों के हितों की बात कर भाजपा भी पश्चिम में मुस्लिम सम्मेलन कर रही हैं। भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी की अगुवाई में ये सम्मेलन मेरठ, अलीगढ़ बदायूं व बरेली में होंगे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस समय 09 मुस्लिम विधायक हैं। बागपत, सहारनपुर, बुलंदशहर, अलीगढ़ और आगरा से एक-एक और मेरठ तथा मुजफ्फर नगर से दो मुस्लिम विधायक हैं। इस बार एक खास बात यह है मुसलमानों में भाजपा का कोई हौव्वा या डर नहीं है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा ने 48 मुस्लिम उम्मीदवार  मैदान में उतारे हैं। कांग्रेस व रालोद गठबंधन के 23  मुस्लिम उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भी बसपा ने बड़ी तादाद में  मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, लेकिन तब पश्चिम उत्तर प्रदेश की आगरा छावनी सीट से जुल्फिकार अहमद भुट्टों  व बुलंदशहर से हाजी अलीम  गाजी ही जीत दर्ज करने में कामयाब हो पाए थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने खराब प्रदर्शन के बावजूद सपा के मुस्लिम उम्मीदवार शाहिद मंजूर किटौर से व जमीर अल्लाह अलीगढ़ से विजय हासिल करने में कामयाब हुए। यहां केवल दस सीटों पर जीत दर्ज करने वाले लोकदल के तीन मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। पिछले विधानसभा चुनाव में हाजी याकूब  यूडीएफ के टिकट पर चुनाव जीते थे लेकिन बाद में वे बसपा में शामिल हो गये। इस बार याकूब लोकदल के टिकट पर सरधना से उम्मीदवार हैं।  मुस्लिम मतों को लेकर सभी दलों में घमासान मचा है, लेकिन सियासी हल्कों में दखल रखने वाले कुछ मौलानाओं का तो यही कहना है कि  मुस्लिम मतों का किसी एक दल के पक्ष में रूझान नहीं होने जा रहा है।  

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

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