गोवा को भगवान परशुराम की धरती कहा गया है. पौराणिक कथाओं के अनुसार परशुराम ने समुद्र में तीर मार कर इस जगह को अलग कर दिया था. कालांतर में ये शिलाहर, कदम्बा, बहमनी, आदिलशाह और उसके बाद करीब ४५० वर्षों तक पुर्तगालिओं के अधीन रहा. सन १९६३ में गोवा, दमन और दीव केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जाना गया. यहाँ पर पहली बार विधान सभा चुनाव उसी साल हुआ. महाराष्ट्र गोमान्तक पार्टी के दयानंद बंदोड़कर राज्य के पहले मुख्य मंत्री बने और उनकी अगुआई में पार्टी ने सन १९६४, १९६७ और १९७२ का चुनाव जीता. बंदोड़कर अपने मृत्यु पर्यंत यहाँ के मुख्यय मंत्री बने रहे. उनका देहांत १९७३ में हुआ और फिर उनकी पुत्री शशिकला काकोडकर मुख्यमंत्री बनी और सन १९७९ तक उनका शासन रहा.
उसी साल पहली बार इस केंद्र शासित प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया गया. सन १९७९ के दिसंबर में हुए चुनाव में पहली बार महाराष्ट्र गोमान्ताक पार्टी को करारा झटका लगा, जब कांग्रेस पार्टी जीत कर आई और सत्तरी रजवाड़े के प्रताप सिंह राने १९८५ में मुख्य मंत्री बने. इनका शासन १९९० तक रहा. ३० मई १९८७ को गोवा को स्वतंत्र राज्य का दर्ज़ा मिला. मगर तब से लेकर कई सालों तक गोवा राजनितिक अस्थिरता का केंद्र रहा. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कई सन १९९० से २००५ के बीच में १५ मुख्यमंत्री बदले गए, जिनमें प्रताप सिंह राणे से लेकर, चर्चिल अलेमाओ, डॉ. लुईस प्रोटो बर्बोसा, रवि नायक, डॉ. विल्फ्रेड डिसूजा, लुज़िनो फलेरियो और फ्रांसिस्को सरदिन्हा के नाम शामिल हैं.
भारतीय जन्नत पार्टी गोवा में पहली बार सत्ता में सन २००० में आई. आईआईटी मुंबई से शिक्षा प्राप्त मनोहर पर्रीकर मुख्यमंत्री बने और उनका शासन पांच साल से कुछ कम समय तक रहा. जनवरी २००५ में उनकी सरकार अल्पमत में आ गयी, जब उनकी पार्टी के चार विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया. पर्रीकर विधानसभा पटल पर अपना बहुमत साबित करने में असफल रहे और राज्य में कुछ समय के लिए फिर से राष्ट्रपति शासन लगा दिया. मगर जून २००५ में विपक्ष ने नेता प्रताप सिंह राणे फिर से मुख्य मंत्री बने और इस तरह अब तक वो ६ बार राज्य के मुख्यमंत्री पद पर रह चुके हैं. सन २००७ के आम चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पायी. कांग्रेस पार्टी को १७ सस्तें मिली जब कि भारतीय जनता पार्टी १४ सीटें ही बटोर पायी. राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी को ३ सीट मिली. एक ज़माने से राज करती चली आई महाराष्ट्र गोमंतक पार्टी सिर्फ २ सीटें ही जीत पाई, जबकि चर्चिल अलेमाओ का गोवा बचाओ फ्रंट २ सीट ले गया. यूजीडीपी को सिर्फ एक सीट मिली जब कि एक निर्दलीय उम्मीदवार जीता. काफी जद्दो-जहद के बाद दिगंबर कामत ४० सीटों वाले सदन में अपना बहुमत साबित कर मुख्यमंत्री बने.
इस बार गोवा के चुनावी मैदान में कुल २१५ उम्मीदवार खड़े हैं. मगर अब तक के रुझान से साफ़ ज़ाहिर है कई सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को अपनी ज़मीन बचाना बहुत ही मुश्किल होगा. इसके कई कारण है. ये सही है कि मुख्यमंत्री दिगंबर कामत अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे और कांग्रेसी नेतागण हर बार यही दोहराते हैं कि इतने सालों बाद कम से कम गोवा में एक स्थिर सरकार तो थी. मगर सच ये है कि उनका प्रशासन बहुत ही लचर रहा और गठबंधन दल का हर मंत्री मनमानी करता रहा, चाहे वो बाबुश मोंसेरात हों या फिर अलेमाओ बंधू या फिर कोई और. दिगंबर कामत को अपनी कुर्सी बचाने की पड़ी रही और इसीक्रम में गोवा कानून-व्यवस्था से लेकर और कई जगहों पर फिसड्डी बन गया. सैलानियों का स्वर्ग कहा जाने वाला गोवा इस दौरान, ड्रग और माफिया का अड्डा बन गया, दूसरी तरफ खनन माफिया से लेकर कसीनो माफिया तक अपनी मनमानी करते रहे और सरकार आँखे मूंदे रही.
गोवा के प्रभारी कांग्रेस महासचिव बीके हरी प्रसाद भी घटक दल के बेलगाम मंत्रियों पर अंकुश लगाने में नाकामयाब रहे. उसके बाद जगमीत सिंह बरार को राज्य का प्रभारी बना दिया गया. शुरू में उन्होंने भी कई डींग-पैतरे दिखाए मगर कुछ ही महीनों के भीतर वो भी अलेमाओ और राणे के कुनबे में समा बैठे. ज़ाहिर है, राज्य की चरमराती कानून-व्यवस्था, शिक्षण माध्यम वाले बिल पर विवाद, कानकोण में गिरि जनों पर हुए अत्याचार से लेकर ऐसे और कई मुद्दे हैं, जिसके मद्देनज़र राज्य से बहुत से मतदाता कांग्रेस से अपना मुंह मोड़ सकते हैं. उसपर से तुर्रा ये कि टिकट बांटने में और भी अंधेरगर्दी हो गयी. आस्कर फर्नांडिस की अध्यक्षता में ४० सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची तीन खेप में आई. इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में और भी रोष फैल गया. कुल मिला कर ये हुआ कि कई जगहों पर पार्टी के कर्मठ और पुराने कार्यकर्ताओं की जगह परिवारवाद को प्राथमिकता दी गयी और अंजाम ये हुआ कि आज कांग्रेस पार्टी को कम से कम १० जगहोंपर बागी उम्मीदवारों से लोहा लेना पड़ रहा है.
इस बार कांग्रेस पार्टी राज्य की ४० सीटों में से ३३ पर चुनाव लड़ रही है जब कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को ७ सीटें दी गयी है. पिछले चुनाव में राकपा को ३ सीटें मिली थी. मगर इसबार इसकी स्थिति थोड़ी पतली लग रही है और अगर स्थानीय राजनितिक पंडितों की माने तो शायद इसबार राकपा को एक या दो सीटों से ही संतोष करना पड़ सकता है. दूसरी तरफ कांग्रेस खेमे में पहली २२ सीटों की जारी लिस्ट में १२ सीटें परिवारवाद की भेट चढ़ गया. इसकी सब से बड़ी मिसाल थी संत क्रूज़ विधान सभा क्षेत्र से ४ बार विधायक रह चुकी विक्टोरिया फफ्नान्दिस, जिनका टिकट काट कर बाबुश मोंसेरात को दे दिया गया. इसके पीछे की गणित ये है कि अब तक मोंसेरात तलेगाओ से लड़ते थे. मगर गोवा के नए रीजनल प्लान के तहत करीब ५० लाख वर्ग मीटर ज़मीन को आवास क्षेत्र में लाने की योजना है और बाबुश वैसे भी गोवा के भू-माफिया के पुराने चहेते रहे हैं. इसलिए कांग्रेस के कर्णधारों ने उनकी ही जमकर वकालत की और टिकट देने में कामयाब रहे. उधर कुपित विक्टोरिया ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर अपने पुत्र रुडोल्फ फर्नांडिस को मैदान में उतार दिया. अब ये कहा जा रहा है कि विक्टोरिया कम से कम कांग्रेस को ३ विधान सभा क्षेत्रों में नुकसान पहुंचा सकती है. कांग्रेस की दूसरी लिस्ट में ७ नाम जारी किये गए जिसमें भाजपा से टूट कर आये दो विधायकों को भी टिकट दिया गया.
मगर सब से ज्यादा खींचतान बाकी के ४ सीटों को लेकर हुई और एक बार फिर ये साबित हो गया कि कांग्रेस पार्टी फिर अपनी ही बिछाई जाल में फंस गयी है. इसमें सबसे पहला बिंदु रहा मुर्मुगाओ सीट जिसमें सैफुल्लाह खान और युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सल्कल्प अमोनकर के बीच झगड़ा था. कांग्रेस आला कमान वहां पर एक मुसलमान को टिकट देना चाहती थी, क्यों कि गोवा के चाणक्य कहे जाने वाले विजय सरदेसाई को फतोर्दा से टिकट देने की बात चल रही थी. राहुल गाँधी की टीम ने वर्तमान युवा कांग्रेस की अध्यक्ष प्रतिमा कुटिन्हो को फतोर्दा से टिकट देने का ऐलान कर और मुसीबत खड़ी कर दी. मगर गोवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुभाष शिरोडकर और दिगंबर कामत के चहेते संकल्प ने आखिर में मुर्मुगाओ से बाजी मार ली. फतोर्दा से सबसे दबंग कहे जाने वाले उम्मीदवार विजय सरदेसाई ने अहमद पटेल से लेकर सैम पित्रोदा के दरबार की भी कई बार प्रदक्षिणा कर डाली और दिगंबर कामत ने तो भरी सभा में यहाँ तक कह दिया कि किसमें हिम्मत है कि सरदेसाई का टिकट काट दे? मगर अंततः सरदेसाई मुगालते में मारे गए और उनकी जगह एक के शेख को फतोर्दा से टिकट दी गयी. विजय सरदेसाई अब निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में हैं और कहा जा रहा है कि वो अपने अपमान का बदला कांग्रेस को कम से कम ४ सीटों पर हरा कर ही लेंगे. फतोर्दा में तो कांग्रेस हारेगी ही, दिगंबर कामत के लिए भी सरदेसाई खासी मुसीबत मडगाव में बन सकते हैं क्यों कि भले ही मोती दोंगोर के मुसलमान दिगंबर को बाबा कहते हों, मगर सरदेसाई का दबदबा वहां पर भी कुछ कम नहीं है.
प्रदेश कांग्रेस प्रमुख सुभाष शिरोडकर की हालत थोड़ी ठीक है क्यों कि वहां पर भाजपा के विधायक और कभी शिरोडकर के सहायक रहे महादेव नाइक को अपनी ही पार्टी के बागी विश्वास प्रभुदेसाई से लोहा लेना पड़ रहा है. और जगहों पर कांग्रेस की हालत बहुत ठीक नहीं कही जा सकती है क्यों कि नए कार्यकारी अध्यक्ष फ्रांसिस्को सरदिन्हा इस बात को खुद मानते हैं कि पार्टी को परिवारवाद महंगा पड़ सकता है क्यों कि गोवा की जनता ऐसे हालत से तंग आ चुकी है. मगर जगमीत सिंह बरार और आस्कार फर्नांडिस आज भी ताल ठोंक कर कहते हैं कि कांग्रेस अकेले ही २५ सीट ले आयेगी. उनकी गणित और अर्थशास्त्र का आधार तो वे ही जाने मगर वो इस बात को भूल जाते हैं कि पिछली सरकार में साथ में रही महाराष्ट्र गोमंतक पार्टी ने इस बार कांग्रस का साथ क्यों छोड़ दिया. इस चुनाव में एमजीपी भाजपा के साथ है और वो कम से कम ५ सीटें जीत लेने की स्थिति में है.
इस बार प्रणब मुखर्जी के बदले आस्कार फर्नांडिस और उनकी पत्नी ब्लोसम फर्नांडिस ने पणजी में कांग्रेस पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया. मगर उसमें भी भयानक गलती हो गई. कुशासन और भ्रष्टाचार को ढंकने के उत्साह में घोषणा पत्र में उस नेउरा गाँव में भी पुल बनाने की बात कही गयी जहाँ कोई नदी है ही नहीं. पार्टी ने गोवा वासियों को १५० यूनिट तक मुफ्त बिजली देने की घोषणा की है और गोवा को झुग्गी-झोपड़ियों से भी मुक्त करने की बात की है. मगर आज की सच्चाई यही है कि गोवा में कांग्रेस को शायद पराजय का मुंह देखना पड़े क्यों कि ज़मीनी हालत उसके खिलाफ है. एक तो पार्टी के बीच अंदरूनी कलह, दूसरा परिवारवाद के प्रति जन आक्रोश और तीसरा विगत पांच वर्षों में कांग्रेस का ढुलमुल और लचर प्रशासन शायद गोवा की जनता को कांग्रेस से मुंह मोड़ लेले को मजबूर करेगा.
ऐसे में अगर पार्टी को १६ सीटें भी मिल गयी तो वो एक बार फिर से सरकार बनाने का दावा पेश करेगी. अब देखना है कि ३ मार्च को जनता का ऊँट किस करवट बैठता है मगर अब तक के रुझान और जन मानस का रुख देख कर तो यही लगता है कि शायद वो १३ से १४ सीटों पर ही सिमट जाए. कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी ने एक बार फिर से गोवा के मतदाताओं से पार्टी को वापस सत्ता में लाने की पुरजोर अपील तो की मगर कई कार्यकर्ताओं के चेहरे इस बात को भली-भांति दर्शा रहे थे कई वो खुश नहीं हैं. यही हाल पार्टी के चुनाव मैनेजरों का और पार्टी के पर्यवेक्षकों का हैं, जिनको दिगंबर कामत सरकार के खिलाफ शिकवे-शिकायतों का पुलिंदा ही मिल रहा है.
लेखक अजय एन झा वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक हैं. ये हिंदुस्तान टाइम्स, आजतक, डीडी न्यूज, बीबीसी, एनडीटीवी एवं लोकसभा टीवी के साथ वरिष्ठ पदों पर काम किया है. अजय से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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