उत्तर प्रदेश में पांचवें चरण के मतदान के बाद केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने राष्ट्रपति शासन सम्बन्धी जो बयान दिया, उसको सिर्फ कोरी धमकी मानना बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती। इसके पीछे अवश्य एक गहरी राजनैतिक साजिश है। अगर कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली पर आप नज़र डाले तो साफ़ तौर पर पाएंगे कि राहुल गाँधी जो कहना चाहते हैं वो खुद न कह कर किसी दूसरे बड़े नेता से कहलवा कर जनता का मूड मिजाज़ भापने की कोशिश करते हैं। बाटला हाउस पर दिग्विजय सिंह से एक बयान दिलवाते हैं और जब विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया देखते हैं तो चिदंबरम से दूसरा बयान दिलवा देते हैं। अल्पसंख्यक आरक्षण को मुस्लिम आरक्षण बता कर सलमान खुर्शीद के माध्यम से प्रचार करवाते हैं। चुनाव आयोग से मोर्चा खुलवाते हैं और मामला तूल पकड़ता देख उनसे माफ़ी मंगवाकर दूसरे मंत्री को आगे करके वही बयान दिलवा देते हैं।
इसी तरह से राष्ट्रपति शासन सम्बन्धी बयान भी पहले उन्होंने दिग्विजय सिंह से दिलवाया और और यह देख कर कि जनता पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है बल्कि जनता और भी ज्यादा मुखर होकर वोटिंग कर रही है, तो एक बार फिर केंद्रीय मंत्री को आगे कर खेल-खेल में जनता को चेतावनी दिलवा दी। राहुल गाँधी इस बात को बहुत अच्छे तरीके से जानते हैं कि अपनी ताकत को एक करोड़ गुना भी अधिक लगा कर वे उत्तर प्रदेश में सत्ता के नजदीक नहीं पहुंच सकते और इस बात को खुद अपने मुंह से बनारस में राहुल ने स्वीकार भी किया कि इस चुनाव में पार्टी खड़ी हो जाएगी। ऐसे (खुद खड़े हो कर बताया) इसके बाद हम काम करेंगे। क्या काम करेंगे और किस चीज पर काम करेंगे ये तो उस समय नहीं बताया लेकिन राजनीति की थोड़ी भी समझ रखने वाले जान गये कि राहुल का इशारा २०१४ लोक सभा चुनाव की तरफ है। मतलब साफ़ है कि राहुल वर्तमान चुनाव हम खेलेंगे नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे क़ी तर्ज़ पर लड़ रहे हैं।
जितना बड़ा सत्य यह है कि मतदान प्रतिशत में जबरदस्त इजाफा हुआ है उतना ही बड़ा सत्य यह है कि किसी भी पार्टी को २००७ क़ी भांति स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार बहुत कम हैं, ऐसे में विधायकों क़ी खरीद-फरोख्त को रोकने के नाम पर राष्ट्रपति शासन लगाना आसान हो जायेगा और जनता को भी अटपटा नहीं लगेगा, क्योंकि बार-बार बयान दिलवा कर उसको अभी से अभ्यस्त बनाया जा रहा है। यदि ६ मार्च को राष्ट्रपति शासन क़ी सम्भावनायें उभरती हैं तो राहुल गाँधी को अपरोक्ष रूप से अगले एक साल तक अपनी काबिलियत दिखाने का मौका मिल जायेगा। राजभवन के माध्यम से कांग्रेस क़ी समानांतर सत्ता का एक वर्ष खुद को दूसरे से बेहतर बताने में गुजरेगा। इस पूरी पटकथा के एक महत्वपूर्ण किरदार होंगे महामहिम राज्यपाल उत्तर प्रदेश, जिनका कार्य काल अप्रैल में समाप्त हो रहा है और निश्चित रूप से कांग्रेस उनके स्थान पर गाँधी परिवार के किसी खास राजनैतिक शख्शियत को, जैसे शिवराज पाटिल को इस पद पर बैठा सकती है, जिसके माध्यम से उसके अपने राजनैतिक एजेंडे को पूरा किया जा सके और फिर एक वर्ष बाद यानी क़ी मई २०१३ के बाद २०१४ के लोकसभा चुनाव सामने होंगे, जिसमे मंच से अबकी बार राहुल गाँधी पूछेंगे कि बताओ भैया पिछले एक साल में तुम्हारे प्रदेश में कितने घोटाले हुए? कि भैया बताओ पिछले एक साल में तुम्हारे प्रदेश में कितने सीएसओ मार डाले गये? बताओ भैया किसी पार्टी के गुंडों की गुंडई चली? बताओ भैया किसी ने मंदिर मस्जिद के नाम पर राजनीति करने कि कोशिश क़ी, नहीं ना तो फिर लाओ न कांग्रेस को।
उस समय क्या होगा ये कोई नहीं बता सकता, शायद बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आन्दोलन की कुंद पड़ चुकी आग और भाजपा में हर बड़े नेता के प्रधानमन्त्री बनने की ख्वाहिश की नकारात्मकता का सकारात्मक असर राहुल के पक्ष में पड़ जाये और शायद नहीं भी, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि २०१४ में जो होगा वो होगा, अभी २०१२ का क्या होगा? क्या मतदाताओं के जोश का कुछ भी परिणाम नहीं निकलेगा, तो मित्रों इतना समझ लीजिये कि ये भी हो सकता है कि कांग्रेस के युवराज का अपरोक्ष बयान उनके गले की हड्डी भी बन जाये और आगे आने वाले दो चरणों में मतदाता और भी ज्यादा उत्साह से मतदान करे, जो किसी एक पार्टी के पक्ष में चला जाये और युवराज की मंशा धरी की धरी रह जाये। अभी तो इंतज़ार है ६ मार्च का, जब सबकी किस्मत का जादुई पिटारा खुलेगा। अब इस पिटारे से क्या निकलेगा निःसंदेह किसी के लिए होली की गुझिया की मिठास तो किसी के लिए आखत पर पड़ने वाली मार। तब तक सपा और बसपा की धुक-धुक जरुर बढ़ी रहेगी क्योंकि बाकी दलों के पास खोने को कुछ भी नहीं है, पर इनके पास तो सत्ता पाने की संभावना है।
लेखक क्रांति किशोर मिश्र यूपी में सुदर्शन चैनल के ब्यूरो प्रमुख हैं.





