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फर्जीवाड़ा : कहां से निकलता है उत्‍कल मेल का रांची संस्‍करण

रांची : झारखंड में अंधेरगर्दी है. समाचार पत्र-पत्रिकाओं के नाम पर यहां कागजों पर करोडों का वारा-न्यारा किया जा रहा है. यहां एक मामले की चर्चा की जा रही है. जो इस संदर्भ की एक कड़ी मात्र है. ओडिसा राज्य में एक समाचार पत्र है. इस पत्र का नाम है उत्कल-मेल. उत्कल मेल के सर्वेसर्वा हैं- पीतवास मिश्र. इस समाचार पत्र का मूल निवास राऊरकेला बताया जाता है. वैसे इस पत्र का प्रकाशन ओडिसा के राऊरकेला सहित भुवनेश्वर, छत्‍तीसगढ में रायपुर, झारखंड में रांची और जमशेदपुर तथा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से करने का दावा किया जाता है.

रांची : झारखंड में अंधेरगर्दी है. समाचार पत्र-पत्रिकाओं के नाम पर यहां कागजों पर करोडों का वारा-न्यारा किया जा रहा है. यहां एक मामले की चर्चा की जा रही है. जो इस संदर्भ की एक कड़ी मात्र है. ओडिसा राज्य में एक समाचार पत्र है. इस पत्र का नाम है उत्कल-मेल. उत्कल मेल के सर्वेसर्वा हैं- पीतवास मिश्र. इस समाचार पत्र का मूल निवास राऊरकेला बताया जाता है. वैसे इस पत्र का प्रकाशन ओडिसा के राऊरकेला सहित भुवनेश्वर, छत्‍तीसगढ में रायपुर, झारखंड में रांची और जमशेदपुर तथा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से करने का दावा किया जाता है.

उत्कल मेल के ओडिसा में उडिया तथा हिंदी तथा बाकी स्थानों पर हिंदी में प्रकाशित होने की बात कही जाती है. समाचार पत्र के मालिक, संपादक, प्रकाशक मुद्रक पीतवास मिश्र को इस फील्ड में महारथ हासिल है. उन्होंने अपने सभी संस्करणों के डीएवीपी दर ले रखें हैं. वैसे उत्कल मेल का केवल राऊरकेला इंडस्ट्रीयल एरिया में ही प्रिंटिंग मशीन होने की बात कही गयी है. अब कहानी झारखंड में उत्कल मेल की. राष्ट्रीय सहारा समाचार पत्र में बतौर वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत शरण रांची से सेवा दे रहे थे. अब वे इस समाचार पत्र में नहीं हैं. पटना के रहने वाले प्रशांत को विरासत में पत्रकारिता मिली है. रांची में कुछ वर्षों तक पत्रकारिता करते यह जगह उन्हें रास आ गयी लेकिन राष्ट्रीय सहारा को प्रशांत शरण रास नहीं आये. उन्हें हटा दिया गया.

जब वे बेरोगार हो गये. उन्होंने दूसरी जगह तलाशनी शुरु की. उत्कल मेल पर उनकी निगाहें टिकी. पत्र के मालिक पीतवास मिश्र से संपर्क कर उन्हें न सिर्फ समाचार पत्र का फाइनेंसर (लातेहार के पांडे जी) उपलब्‍ध करवा दिया बल्कि प्रशांत शरण ने दौड-धूप कर पटना के संबंधों का लाभ उठा कर उत्कल मेल को गृह विभाग झारखंड सरकार से राज्य सरकार की स्वीकृत पत्र-पत्रिकाओं की सूची में डलवा दिया. झारखंड की राजधानी रांची से यह मंशा सफल नहीं हुई लेकिन जमशेदपुर संस्करण को प्रशांत लाभ दिलाने में सफल हो गये. बात यहीं नहीं खत्म हुई. प्रशांत ने सोचा चलो बेरोजगारी खत्म हुई परंतु ऐसा नहीं हुआ. फाइनेंसर पांडे जी और पीतवास मिश्र ने प्रशांत शरण को काम निकलने के बाद दूध में गिरी मक्खी की तरह फेंक दिया. प्रशांत का तिलमिलाना लाजिमी था. अभी वे एक नई पत्रिका झारखंड 30 दिन निकाल रहे हैं. इस मैग्जिन में उन्होंने उत्कल मेल पर स्टोरी लिखी है. उसे आपको भी भेज रहा हूं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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