पटना विश्वविद्यालय के सीनेट हाल में सेवानिवृत न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू -जो भारतीय प्रेस परिषद् के प्रमुख भी हैं- के साथ शुक्रवार को जो हुआ, उससे एक बात सिद्ध हो गयी है कि बिहार अभी लाठी-तंत्र से मुक्त नहीं हो पाया है. अंतर इतना है कि पहले लोग लाठीवाले को दूर से पहचान लेते थे, पर अब लाठीवाले को पहचानना मुश्किल है -मसलन वे कभी शिक्षक के रूप में मिलेंगे, तो कभी फेसबुक जैसे साइटस पर प्रवचन… देते अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते बुद्धिजीवी.
आखिर क्या कह दिया न्यायमूर्ति काटजू ने? उन्होंने कहा कि मुझे पता चला है कि बिहार में मीडिया पर एक अघोषित बैन लगा हुआ है, हालाँकि मैंने स्वयं इन तथ्यों को जांचा नहीं है. बस फिर क्या था प्रतिष्ठित पटना महाविद्यालय के प्राचार्य आपे से बाहर हो गए. गुरु तो गुरु उनके कुछ चेले ने भी दबंगई दिखानी शुरू कर दी. इत्तेफाक से प्राचार्य महोदय की पत्नी जद (यू) की विधायक हैं. खैर न्यायमूर्ति काटजू पर इन नौटंकियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने अपनी पूरी बात कह डाली. इस घटना के बाद जहाँ सत्तारूढ़ दलों के नेताओं ने खुद को अपने घरों में व्यस्त रखना मुनासिब समझा, विरोधी पार्टी के नेतागण और बुद्धिजीवी लोग फेसबुक पर लगे रहे -पूरी घटना का छीछालेदर करने में. नतीजा अगले दिन आया -जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस प्रकरण पर कुछ भी बोलने से मना कर दिया और लालू प्रसाद ने न्यायमूर्ति काटजू को बिहार बुलाकर सम्मानित करने की घोषणा कर डाली.
अब रही बात बिहार में मीडिया पर एक अघोषित बैन लगने की -तो ये बड़ा ही संवेदनशील मामला है और इतनी बड़ी बात पर या तो नीतीशजी ही बोल सकते हैं या फिर भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख (क्योंकि यह एक संवैधानिक स्वायत्तशासी संगठन है, जो प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने व उसे बनाए रखने, जन अभिरूचि का उच्च मानक सुनिश्चित करने से और नागरिकों के अधिकारों व दायित्वों के प्रति उचित भावना उत्पन्न करने का दायित्व निबाहता है). परिषद मूलतः अपनी जाँच समितियों के माध्यम से अपना कार्य करती है तथा पत्रकारिता नियमों के उल्लंघन के लिए प्रेस के विरूद्ध अथवा प्राधिकारियों द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के लिए ब्रेक्स से प्राप्त शिकायतों पर निर्णय देती है.
हास्यास्पद बात यह है कि इस पूरे प्रकरण पर किसी बड़े पत्रकार ने अपनी राय नहीं रखी. उनकी जगह तथाकथित बुद्धिजीवियों ने अपनी भड़ास निकालनी शुरू कर दी. पटना में तो ऐसे बुद्धिजीवियों का बोनाफाइड ग्रुप है -जो अपनी आधी समझदारी के आवरण में सरकार के समर्थन में पूरा प्रचार करती है. यहाँ कहने को तो समस्याओं का मंथन होता है, पर सरकार की गलत नीतियों का विरोध नहीं होता. 'नीतीश कुमार मनुष्य नहीं देवता हैं' या 'नीतीशजी को भारत-रत्न दो' जैसे नारे भी यहाँ मिलते हैं. यानी ये ग्रुप आक्रामक आलोचकों को बहलाने-बरगलाने का काम करते हैं. और तो और -एक महाशय ने तो भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख के प्रति कहा कि भाषण देने से पहले उन्हें तथ्यों की पड़ताल कर लेनी चाहिए थी.
ऐसे भाई लोग नीतीशजी की आलोचना का जवाब भी कुछ यूं देते है -लालू के राज से तो बेहतर है नीतीश का राज. उनको शायद ये भी ज्ञात नहीं है कि भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख ने भी कल ये बयान दिया था. पर नीतीशजी की चमचागिरी में उनको ठीक से सुनायी भी तो नहीं देता. अब बिहार में मीडिया पर एक अघोषित बैन की बात! इससे पहले कि बेताल डाल पर भाग जाये – मेरा उत्तर होगा – शत-प्रतिशत बैन. और मेरी इस मान्यता को रिजर्व बैंक का कोई अधिकारी या फिर औद्योगिक समूह का कोई आला अधिकारी खंडित नहीं कर सकता.
लेखक संजीव झा लम्बे समय तक टाइम्स ऑफ इंडिया से जुड़े रहे हैं. फिलवक्त स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.






