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हताश बसपा की चाहत- चुनाव के बाद भाजपा उसकी मदद करे

: यूपी में सत्ता खेमे में खलबली, बसपाई चालें धराशायी, हताशा में भाजपा से संपर्क : लखनऊ। बसपा में खलबली है। भीतर ही भीतर बेचैनी है। इसलिए कि उसे लगने लगा है कि वह सत्ता में नहीं आ रही है। सत्ता के भीतर केसूत्रों की माने तो उसने सत्ता में वापसी के लिए कई मजबूत सीढिय़ाँ बनायी थीं लेकिन वे भी या तो टूट गयी हैं या टूट रही हैं। बसपा नेतृत्व और उसके कट्टïर समर्थक नौकरशाहों ने मिलकर बसपा की वापसी के लिए दो मुकम्मल योजनाओं पर चुपचाप काम किया था, मगर अब उन्हें लगने लगा है कि दोनों ही सत्ता का लक्ष्यवेध करने में सफल नहीं होने जा रही हैं। इस नाकामी को पचा पाना शीर्ष बसपा नेतृत्व के लिए मुश्किल हो रहा है। धीरे-धीरे यह हताशा सत्ता खेमे को निगलने लगी है।

: यूपी में सत्ता खेमे में खलबली, बसपाई चालें धराशायी, हताशा में भाजपा से संपर्क : लखनऊ। बसपा में खलबली है। भीतर ही भीतर बेचैनी है। इसलिए कि उसे लगने लगा है कि वह सत्ता में नहीं आ रही है। सत्ता के भीतर केसूत्रों की माने तो उसने सत्ता में वापसी के लिए कई मजबूत सीढिय़ाँ बनायी थीं लेकिन वे भी या तो टूट गयी हैं या टूट रही हैं। बसपा नेतृत्व और उसके कट्टïर समर्थक नौकरशाहों ने मिलकर बसपा की वापसी के लिए दो मुकम्मल योजनाओं पर चुपचाप काम किया था, मगर अब उन्हें लगने लगा है कि दोनों ही सत्ता का लक्ष्यवेध करने में सफल नहीं होने जा रही हैं। इस नाकामी को पचा पाना शीर्ष बसपा नेतृत्व के लिए मुश्किल हो रहा है। धीरे-धीरे यह हताशा सत्ता खेमे को निगलने लगी है।

सूत्र बताते हैं कि दरअसल भ्रष्टाचार, घोटालों और लूटमार के आरोपों से घिरी सरकार और उसके कर्ता-धर्ताओं को चुनाव से काफी पहले इस बात का अंदेशा हो गया था कि उनकी सोशल इंजीनियरिंग इस बार काम नहीं करने वाली है क्योंकि सर्वजन का नारा देने वालों की करतूत से दलित समुदाय की कुछ गिनी-चुनी जातियों को छोड़कर बाकी जन नाराज है। सरकार ने उनके लिए पांच सालों में कुछ किया नहीं। इस नाराजगी को परिणाम में बदलने से रोकने के लिए वफादार प्रशासनिक अधिकारियों की मदद से उन विधानसभा क्षेत्रों में जहाँ पार्टी जीती थी और जहाँ बहुत कम मतों के अंतर से हारी थी, सुनियोजित ढंग से ऐसे 6 से 10 हजार वोटर जोड़े गये, जो बिना किसी गलती के बसपा को वोट दे सकें। साथ ही ऐसे हजारों वोटरों को मतदाता सूचियों से बाहर भी किया गया, जो या तो गैर-बसपाई थे या बसपा के खिलाफ जा सकते थे। छह चरणों केमतदान में हर बार ऐसी शिकायतें खुलकर सामने आयी हैं कि तमाम मतदाताओं केपास वोटर कार्ड तो हैं लेकिन मतदाता सूची में उसके  नाम नहीं है। छठें चरण में तो ऐसी शिकायतों का पिटारा ही खुल गया था।

सूत्रों के अनुसार सोचा यह गया था कि जनाक्रोश और विरोधी दलों के अभियान से प्रभावित होने वाले वोटिंग पैटर्न को इस तरह निष्क्रिय किया जा सकेगा। बढ़े हुए वोट बसपा को मिल जायेंगे और विरोधियों की तरफ खिसकने वाले वोटों को उन वोटों से निष्प्रभावी  किया जा सकेगा, जो सूचियों से निकाल दिये गये हैं। यह सोची-समझी चाल थी कि अगर बसपा विरोधी राजनीतिक दल को 10 हजार नये वोट मिलते हैं और उसके 10 हजार वोटर सूची में नाम न होने की वजह से वोट नहीं दे पाते हैं, तो उसे बसपा विरोधी हवा के बावजूद कोई लाभ नहीं होगा। जनवरी में वोटर सूची में संशोधन के जो प्रारंभिक सरकारी आंकड़े जारी किये गये थे, वे बसपा की इस योजना का खुलासा करते हैं। उनमें यह बात साफ थी कि 41 लाख नये वोटर बढ़े हैं लेकिन चौंकाने वाला एक तथ्य और था कि पिछले आँकड़ों केमुकाबले कुल मतदाताओं की संख्या 49 लाख कम हो गयी है।

योजना तो बहुत सधी हुई और सटीक थी लेकिन चुनाव आयोग ने जब सारा काम अपने हाथ में संभाला और हर संभव माध्यम से जागरूकता अभियान  चलाकर नये वोटर जोडऩे की कोशिश की तो नये बढ़े हुए मतदाताओं की संख्या 1.54 करोड़ तक पहुंच गयी। जाहिर है नये मतदाताओं की इस बड़ी ताकत ने बसपा की इस योजना को लगभग नाकाम कर दिया। बसपा ने जो नये अपने वोटर सूची में शामिल कराये थे, उसके कई गुना और नये वोटरों का झुकाव निश्चय भी भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों यानी बसपा के खिलाफ होगा।

सूत्र मानते हैं कि ऐसे में अब बसपाई रणनीतिकारों को यह लगने लगा है कि सीटें उतनी नहीं आ रही हैं, जितनी वे अनुमान लगाकर चल रहे थे। सूत्र कहते हैं कि दूसरे जिस विकल्प को सत्ता नेतृत्व ने चुना, वह है ऐसे गठबंधन को ठोस रूप देना, जो सपा और कांग्रेस को प्रदेश की सत्ता में आने से रोक सके। इस दिशा में भी कोई कामयाबी अभी तक नहीं मिली है पर प्रयास चल रहे हैं। बसपा समर्थक कुछ बड़े अफसरों को इस काम में लगाया गया है। सूत्र कहते हैं कि फरवरी के पहले हफ्ते में ऐसे तीन अफसर भाजपा के मुखिया नितिन गडकरी और वरिष्ठï नेता लाल कृष्ण आडवाणी से इस पहल केसंदर्भ में पहली बार मिले थे।

बसपा चाहती है कि चुनाव के बाद भाजपा उसकी मदद करे। उसकी प्राथमिकता यह है कि भाजपा, बसपा नेतृत्व की सरकार में शामिल हो या समर्थन करे। अगर इस पर भाजपा राजी नहीं होती है तो बहुत हताशा की स्थिति में वह भाजपा नेता उमा भारती के नेतृत्व में किसी सरकार का साथ देने को भी तैयार है। बताया जाता है कि कुछ स्थानीय भाजपा नेता इसके पक्ष में भी हैं लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यह भय है कि इससे पार्टी को आगे 2014 के लोकसभा चुनाव में नुकसान हो सकता है। अतीत का अनुभव भाजपा को इस मामले में कोई फैसला लेने से रोक रहा है कि बसपा से सहयोग करने का खामियाजा हर बार भाजपा को ही उठाना पड़ा है।

इधर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों के आकलनों और जनता के मूड को देखकर बसपा की बेचैनी और बढ़ गयी है। बसपा को भारी नुकसान के कारण कांग्रेस और भाजपा के वोट बढ़े जरूर हैं लेकिन सबसे ज्यादा लाभ समाजवादी पार्टी को मिलता दिख रहा है। बसपा की हताशा इसलिए बढ़ती जा रही है कि कहीं सपा आ गयी तो भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं, अफसरों के तंत्र की अच्छी-खासी रगड़ाई हो सकती है। 

यह विश्लेषण लखनऊ और इलाहाबाद से निकलने वाले हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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