"हाथों की मेहंदी उतरने से पहले जनाजा हमारा निकाला गया" ये पंक्तियाँ कम से कम हाल ही में बहुत जोश जुनून से शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी की अगुवायी में लांच किये गए दैनिक अखबार जन्संदेश टाइम्स के लिए तो सटीक ही बैठती हैं. अभी चंद दिनों पहले जागरण से बाहर होकर शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने जन्संदेश के बूते जागरण की बुनियाद हिलाने के लिए पत्रकार वर्ग की एक बड़ी लॉबी तैयार की थी, जिसमें सबसे ज्यादा पत्रकार जागरण छोड़कर श्री त्रिपाठी के साथ हो लिए थे.
आलम ये था कि जन्संदेश ज्वाइन किया हर पत्रकार "जन्संदेश जिंदाबाद" से ज्यादा बुलंद स्वर में "दैनिक जागरण मुर्दाबाद" का नारा लगा रहा था. ऐसा होना भी स्वाभाविक था क्योंकि मैन पावर को मैनेज करने के लिए प्रबंधन द्वारा अतिलुभावाने वादे उन पत्रकारों से किये गए होंगे एवं आसमानी ख्वाब भी दिखाए गए होंगे. जोशो जुनून में अखबार तो लांच हो गया लेकिन धीरे-धीरे बुनियादी दिक्कतें समाने आने लगी और नारा लगाने वालों को लगने लगा कि राह बहुत आसान नहीं है और वो जिस मुगालते में हैं वैसा कुछ भी नहीं है. जन्संदेश ने अभी ढंग से अपना विहान भी नहीं देखा कि उसे अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है.
सूत्रों की माने तो जन्संदेश ने सेलरी के नाम पर लोगों को ठगा है और अभी तक सभी लोगों को नियुक्ति पत्र तक नहीं दिया गया है, जो वेतन नियुक्ति के समय बताया गया वो वेतन दिया नहीं जा रहा और साप्ताहिक छुट्टी करने पर सेलरी में कटौती की जा रही है. अत: पत्रकारों की स्थिति देहाड़ी मजदूरों जैसी बन चुकी है. जन्संदेश से जुड़े़ पत्रकारों में इस अव्यवस्था को लेकर भारी असंतोष व्याप्त है एवं इसी के चलते जन्संदेश कार्यालय में मार-पीट की घटनाएँ भी सामने आई हैं. नाम ना बताने की शर्त पर किसी मित्र ने बताया कि अखबार शुरू होने से लेकर अब तक क्षेत्रीय एवं जिला कार्यालय के खर्च के नाम पर एक आलपिन का भी पैसा अखबार प्रबंधन द्वारा नहीं खर्च किया गया है एवं अखबार के मालिक ने स्पष्ट कर दिया है कि मेरे पास अखबार चलाने के लिए पैसा नहीं है, आप अखबार चलाइये और इसी की कमाई से खर्च चलाइये.
इस हालत में सम्पादक जी भी लोगों को संतुष्ट करने के लिए झूठ आदि का सहारा ले रहे हैं. मगर ये झूठ फरेब ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता और भविष्य में किसी भी बुरी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि असंतोष अपने चरम पर पहुंच रहा है. कुशीनगर के किसी पत्रकार से किसी एकाउंटेंट की हाथापाई तक हो गयी एवं लोग सम्पादक कार्यालय जाना शुरू कर दिए हैं, जिनकी मांग है कि वेतन व्यस्था सही करो नहीं तो कोई काम नहीं. हालात अब यहाँ तक जा पहुंचे हैं कि अंदरूनी तौर पर जन्संदेश पत्रकार अब दूसरे विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिए हैं.
हालांकि इन सारे मामलों में लोग राजनीतिक भूमिका को भी नहीं नकार रहे हैं. कई लोगों का कहना है कि अपने शुरुआती दौर में ही अखबार चापलूसों की फौज बन कर रह गया है एवं मेहनती लोग हाशिये पर धकेले जा रहे है. इन सबके बीच जल्द ही जन्संदेश टाइम्स में बगावत को सिरे से नहीं नकारा जा सकता है. आगामी दिनों में भी मार-पीट, मुकदमे आदि की स्थिति भी देखने को मिल सकती है. संभावनाएं यहाँ तक हैं कि लोग सबसे ज्यादा सम्पादक एवं मालिक को ही घेरने का प्रयास करेंगे. खैर मैं ये तो नहीं जनता कि इसमे कितनी सच्चाई है मगर धुंआ उठा है तो आग तो जरुर होगी. अगर ये अखबार नहीं चला तो असंतोष के बुरे परिणाम देखने को जरुर मिलेंगे क्योंकि इस अखबार ने लोगों को एक जगह से तोड़कर निहत्था कर दिया है.
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"
पत्रकार





