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छजलानी जी, मेहताओं और अरोड़ाओं ने लूट ली आपकी नईदुनिया

: अखबार को बढ़ाने में नहीं राज्‍यसभा के जुगाड़ में लगे हैं आलोक मेहता : यशवंतजी, पिछले हफ्ते से एक तरफ मीडिया जगत में मुख्य धारा के पत्रकार आपके पोर्टल भड़ास4मीडिया पर नईदुनिया की लिखी गयी पटकथाएं पढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ नईदुनिया से दिल्ली और इंदौर में पत्रकारों से इस्तीफा लिए जाने का सिलसिला जारी है। नईदुनिया के इतिहास को पढ़कर मुझे भी सैकड़ों वर्ष पुराने कथाकारों द्वारा लिखा गया इतिहास याद आया।

: अखबार को बढ़ाने में नहीं राज्‍यसभा के जुगाड़ में लगे हैं आलोक मेहता : यशवंतजी, पिछले हफ्ते से एक तरफ मीडिया जगत में मुख्य धारा के पत्रकार आपके पोर्टल भड़ास4मीडिया पर नईदुनिया की लिखी गयी पटकथाएं पढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ नईदुनिया से दिल्ली और इंदौर में पत्रकारों से इस्तीफा लिए जाने का सिलसिला जारी है। नईदुनिया के इतिहास को पढ़कर मुझे भी सैकड़ों वर्ष पुराने कथाकारों द्वारा लिखा गया इतिहास याद आया।

एक बार बीरबल ने अकबर को महाभारत की एक प्रति भेंट की। महाभारत को पढ़कर अकबर ने बीरबल को बुलाया और कहा कि महाभारत कथा बहुत अच्छी लगी। ऐसा ही महाकाव्य हमारा भी लिखवाया जाए जिसमें मुझे एक आदर्श हीरो के तौर पर दुनिया और मुल्क याद करता रहे। आलमपनाह की इच्छा पर सभी दरबारियों ने हां में हां मिलाई। उस काल के राजाओं के यहां भी चापलूसों की कमी नहीं हुआ करती थी। बीरबल शांत थे और सोचकर बोले कि हुजूर मुझे महारानी जोधाबाई से मिलने की इजाजत दी जाए, ताकि मैं इस प्रसिद्ध रचना को आगे बढ़ा सकूं। अकबर खुश हुए और कहा इजाजत है। बीरबल ने कहा, ’’महारानी जी, आप क्या आप प्रसिद्ध महाकाव्य की रचना की द्रोपदी (पांचाली) बनना चाहेंगी जिनके पांच पति थे, क्या आप बताएंगी, कि आपके चार पति कौन-कौन हैं?’’ अकबर और उनकी रानी जोधाबाई झेंप गयीं। सम्राट अकबर ने महाभारत जैसी कथा की रचना का उद्देश्य त्याग दिया। इस तरह अकबर तो चापलूसों के बेवकूफी से बच गये क्योंकि उनके पास वाद-प्रतिवाद और बहस करने के लिए बीरबल जैसा बुद्धिमान व्यक्ति था।

नई दुनिया के संस्थापक स्व. लाभचंद छजलानी और उनके वारिस अभय छजलानी को अपनी आत्माओं को सकून देने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना चाहिए। इतिहास ऐसे हुक्‍मरानों से भरा पड़ा है, जिनका चापलूसों के कारण पतन हुआ। किंग लीयर की त्रासदी उनकी चापलूस बेटियों के कारण हुई। हिटलर चापलूस दरबारियों के चक्कर में पड़कर मास्को में जा घुसे और वहीं से उनका अंत शुरू हुआ। नेपोलियन यदि दरबारियों के बहकावे में न आते तो वाटरलू एक मुहावरा नहीं बनता। इंदिरा गांधी दुर्गा तो कहलाईं मगर इंडिया बनने का बोझ तो नहीं उठा सकीं। अभय छजलानी के बेटे का आलोक मेहता और उनके चापलूसों द्वारा नई दुनिया को विस्तार देने की योजना अब लोगों को समझ में आई कि किस तरह साठ वर्ष पूर्व एक आइडियल मीडिया संस्थान को अपनी शान और शौकत और धन पाने का रास्ता बनाया।

दिल्ली और आसपास के शहरों में पत्रकार आलोक मेहता जैसे स्तर के लोग सत्ता के इर्द गिर्द मंडराते रहे हैं, इनको छजलानियों की तलाश रहती है, जिनके जरिये केन्द्रीय और राज्यों की सत्ता में किसी तरह भागीदारी पाने की तमन्ना रहती है। खासकर हिंदी पत्रकारों के बारे में कहा जाता है कि जागरण के मालिक नरेन्द्र मोहन अखबार की बदौलत राज्यसभा में पहुंचे तो उनकी दूसरी पीढ़ी को भी राज्यसभा की सदस्यता सपनों में दिखाई देने लगी है। दीपक अजीम आप निर्भीक और हिम्मत वाले पत्रकार हैं आपने ठीक लिखा कि आलोक मेहता गलत फैसला थे। हम तो डरते हैं, आलोक मेहता के संगठित बेलगाम गिरोह से जो केन्द्रीय सत्ता से जुड़ा है। कभी-कभी सत्ता और ताकत का नशा हम जैसे छोटे कर्मचारियों का जाने-अनजाने में बुरा कर देता है।

अचंभा तो होना ही कि नई दुनिया के छजलानी और संपादक आलोक मेहता दिल्ली में पूंजी लगाकर इस संस्था को आगे बढ़ाने का कार्य नहीं कर रहे थे, बल्कि आलोक मेहता राहुल, सोनिया गांधी के दरबार में उनकी पार्टी के प्रवक्ता बनकर पिछले तीन वर्ष से राज्यसभा सदस्यता की जुगाड़ में लगे हुए हैं। उधर विनय छजलानी अपने गैर पत्रकारिता के उद्योग-धंधों को बढ़ाने के लिए अखबार के नाम पर अंबानी बंधुओं और काले धन के कुबेरों से अरबों रुपये बटोरते रहे हैं। एसपी सिंह कहा करते थे कि हिंदी पत्रकारिता को डुबोने की शुरुआत युवा नही, बड़े-बुजुर्ग पत्रकार ही करेंगे। जागरण के मालिक नरेन्द्र मोहन और आलोक मेहताओं से भी पूर्व यानी 1952 से नईदुनिया अखबार जैसी घटनाएं हो रही हैं। सरकारी सुविधाएं और पैसे लेकर निकलने वाले अखबारों से ही छजलानियों और मेहताओं ने प्रेरणा ली है, जो पत्रकार वास्तव में एक मिशन के तहत पत्रकारिता कर रहे हैं, उनके लिए जानकारी जरूरी है कि आलोक मेहता ने अपना व्यावसायिक कारोबार का भी रजिस्ट्रेशन तभी करा लिया था, जब नई दुनिया एनसीआर संस्करण का पंजीकरण हुआ था।

मेहता ने करीब डेढ़ दशक पूर्व रवि अरोडा नामक ट्रांसपोर्टर को हिंदुस्तान हिंदी समाचार पत्र में आठ सौ रुपये की नौकरी देकर दत्तक पुत्र के तौर पर संबंध बनाया। रवि अरोड़ा ने भी इन दोनों रिश्तों का भरपूर ख्याल रखा। आलोक मेहता ने आज्ञाकारी दत्तक पुत्र की सलाह पर नईदुनिया, दिल्ली संस्करण का पंजीकरण रवि अरोड़ा के घर राजनगर गाजियाबाद के पते पर कराया। कानूनन नईदुनिया का पंजीकरण दिल्ली से नहीं हो सकता था क्योंकि नईदुनिया उर्दू दिल्ली से प्रकाशित है। इसलिए आलोक मेहता ने पूर्व नियोजित व्यापारिक लाभ उठाने के लिए गाजियाबाद जिले से नईदुनिया का पंजीकरण कराया।

पत्रकारों को जानना जरूरी है कि तत्कालीन समय में ही आलोक मेहता के मुंह बोले दत्तक पुत्र रवि अरोड़ा ने ट्रांसपोर्ट का व्यापार छोड़कर उच्च शिक्षा संस्थान की योजना बनाई और सरस्वती इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी मैनेजमेंट के नाम से लगभग सात एकड़ में गाजियाबाद जिले के पिलखुआ कस्बे के पास कालेज बनाया। इस कालेज के निर्माण कार्य के समय में आलोक मेहता भी शिरकत करते रहे हैं। इस कालेज की विशेषता यह है कि न तो कभी धन का अभाव रहा और न कभी उत्तर प्रदेश सरकार के प्रशासन और स्थानीय प्रशासन का संकट आया। क्योंकि राजनगर गाजियाबाद से प्रकाशित नईदुनिया को आलोक मेहता और उनके बिजनेस भागीदार रवि अरोड़ा ने नई ढाल की तरह उपयोग किया। हो सकता है छजलानियों को उनके संपादक और क्षेत्रीय संपादक के द्वारा खडे़ किये गये शिक्षण कारोबार की जानकारी न हो।

गाजियाबाद जिले में राष्ट्रीय समाचार पत्रों के पत्रकार बताते हैं कि इस जिले की लाचार पत्रकारिता दोयम दर्जे के लोगों के हाथों धनाढ्य बनने के लिए उपयोग होती रही है। आलोक मेहता के अघोषित दत्तक पुत्र रवि अरोड़ा ने जिले की पत्रकारिता के लिए हैवानियत की हदें पार करते हुए कथित और संवादहीन पत्रकारों का गिरोह भर्ती कर इस महान और पवित्र पेशे को खाक में मिला दिया। अमीर बनने के लिए रवि अरोड़ा ने जिले के सरकारी ठेकों में अपनी भागीदारी लेकर भारी मुनाफा कमाया है। रवि के मुताबिक यदि जीडीए, गाजियाबाद नगर निगम जैसी विकासशील संस्थाओं के अफसरों ने कार्य नहीं किया तो नईदुनिया गाजियाबाद संस्करण में इश्तहार की भांति खबरें प्रकाशित कीं। यह सिलसिला बीते तीन वर्ष से निरंतर जारी रहा है। मेहता की टीम के मुख्य सदस्य रवि ने सबसे ज्यादा नईदुनिया दिल्ली संस्करण के प्रभाव का बेजा इस्तेमाल और दोहन कर रिश्तेदार व्यापारियों के द्वारा अधिक से अधिक व्यापारिक लाभ उठाया है। कहते हैं कि सिक्कों की खनक इंसान के जमीर को हिला देती है। लालच इंसान की बुराई को ढंक देता है नईदुनिया की दुर्दशा के बावजूद भी संपादक महोदय आलोक मेहता अपनी दुदारू गायों के झुंड के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा सकते।

माफ कीजिएगा ‘‘रवि’’ गाजियाबाद के पत्रकारों ने कभी आपको पत्रकार नहीं माना। मीडिया से जुडे लोग आपको शिक्षा माफिया कहते हैं। परंतु आप जैसे रवियों को क्या फर्क पड़ता है। फर्क तो उन पत्रकारों पर पड़ता है जो दो जून की रोटी और समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए दिनभर देर रात तक कलम और उंगलियों को कंप्यूटर पर घिसते हैं। पिछले डेढ़ दशक में रवियों और मेहताओं को किसी लोकप्रिय समाचार संस्था में निजी उपस्थित की तलाश रही है। ऐसे धंधेबाज पिता-पुत्र और भाइयों को पता है कि उन्हें मीडिया घराने के बडे़ समाचार पत्र अपने यहां जगह नहीं देंगे। नईदुनिया के मुख्य संपादक आलोक मेहता और क्षेत्रीय संपादक रवि अरोड़ा का बीमेल व्यापारिक गहरा रिश्‍ता है। मेहता नईदुनिया को छोड़ सकते हैं रवि को नहीं? बाबू अभय छजलानी जी हम तो आपकी नईदुनिया छोड़ रहे हैं। फरीदाबाद, गाजियाबाद, दिल्ली संस्करण में प्रकाशित तीन साल की खबरों का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि आपके संपादक ने और उनके दरबारियों ने नईदुनिया की आत्मा बेचकर करोड़ों रुपये के धन का कारोबार खड़ा किया है। फिर महसूस करेंगे कि ऐसे लूटे नईदुनिया के आसमान को।

पत्रकारिता के स्वर्ण युग में इन्हें लफ्फाजी बहस करना, सूत्रों के हवाले से खबरें बनाना, विनोद अग्निहोत्री जैसे वास्तविक पत्रकारों का भी इनकी संगत में पथ भ्रष्ट कर दिया है। आलोक मेहता पत्रकारिता में मेल मिलाप की संस्कृति का वैसा ही उदाहरण हैं, जैसा कि बिना कोई चुनाव जीते राजनीति में अमर सिंह होते हैं। अमर सिंह की अमरवाणी कुछ समय के लिए प्रसिद्ध होकर लुप्त हो गयी। वैसे ही आलोक मेहता ने भी छजलानी बंधुओं की नईदुनिया की दुनिया को भी लुप्त करने के लिए देश की राजधानी दिल्ली के चौराहों पर खड़ा कर दिया। पत्रकारिता को लाचार और बेबस बनाने वाले ऐसे मेहताओं के साथ काम करने वाले पत्रकारों को एकजुट होकर हल्ला बोलना चाहिए कि सत्ता के मुखबिर और दलाल यदि आप कांग्रेसी प्रवक्ता न बनते तो, कम से कम दिल्ली संस्करण नईदुनिया में काम करने वाले कर्मचारी अब्‍बू छजलानी से सीना तानकर कह सकते थे कि अमुख संस्करण अपने पैरों पर खड़ा है।

प्रसिद्ध समाचार पत्र दैनिक जागरण, भास्कर, पत्रिका, हरिभूमि, अमर उजाला में लगातार विज्ञापन मुनाफा बढ़ रहा है। इन समाचार पत्रों ने नईदुनिया को चारों तरफ से घेर लिया है और रह-रहकर खबरें पिछले दिनों से आ रही हैं कि जागरण नईदुनिया को खरीद रहा है। अब्बू, अभय छजलानी यदि आपकी विरासत नईदुनिया जागरण ने खरीद ली तो आप इतिहास तो बन ही जाएंगे। अगली पीढ़ी दर्द से आहत होकर कहेगी कि ‘‘हां थे’’। बाबू लाभचंद, अभय छजलानी जिनकी अपनी अलग ही नईदुनिया थी। पत्रिकारिता में कौशल, हासिल और मशहूर पत्रकारों को चिंतित होकर ऐसे मेहताओं और उनके बिजनेस कारोबारी कथित पत्रकार रवि अरोड़ाओं के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए क्योंकि साहित्य और सृष्टि उत्तम विद्या है। मान लीजिये जैसे चित्रकला, अभिनय, गायन, नृत्य आदि और बहुत बडे़ डॉक्टर इंजीनियर, राजनैतिक कानूनविद् अपने पेशे में अभ्यस्त और संपूर्ण हो सकते हैं। यदि ये प्रसिद्ध पेशेवर लोग पत्रकारिता की भाषा बोलने लगें तो इन्हें किसी अखबार का संपादक नहीं बनाया जा सकता।

नईदुनिया के मालिक छजलानियों को जान लेना चाहिए कि आपके संपादक आलोक मेहता से जुडे़ कथित पत्रकार रवि अरोड़ाओं ने अकूत संपत्ति बना ली है। ऐसे रवियों को मेहता जैसे लोगों की हमेशा जरूरत रही है और मेहताओं को भी विनय छजलानी जैसे स्थापित मीडिया घरानों की? नईदुनिया के राजनैतिक संपादक विनोद अग्निहोत्री, जिन्हें आलोक मेहता का उत्तराधिकारी कांग्रेसी प्रवक्ता कहा जाता है। विनोद को सत्ताधारी कांग्रेस के पक्ष में भाषा बोलने और लिखते समय कभी राजेन्द्र माथुर, गणेश शंकर विद्यार्थी और जाने-माने लेखक कथाकारों की याद नहीं आई। विनोद राजनेताओं के लिए समय की मांग हो सकते है, कई दशकों से सत्ता संगठित पत्रकारों का समूह बनाती आयी। विनोद और मेहताओं का सरकारें उपयोग करती रही हैं, बदले में विनय छजलानी बंधु भी अपने धंधे के साम्राज्य को आगे बढ़ाने के लिए मेहताओं रवियों से उम्मीद करते रहे हैं। सत्ता में बैठे शीर्ष और अधिकार संपन्न अभ्यस्त कहते हैं कि जब सत्ता और आलोक मेहता जैसों की मीडिया एक भाषा और एक साथ हो जाएं तो जरूरी सुविधाओं के लिए मोहताज जनता का अहित होना निश्चित तय है।

नीचे नईदुनिया में प्रकाशित खबर को स्‍पष्‍ट रूप से पढ़ने के लिए इन पर क्लिक करें.

प्रेमनाथ

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