हैदराबाद से प्रकाशित दक्षिण भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय हिंदी दैनिक 'स्वतत्र वार्ता' का प्रकाशन शुक्रवार से बंद हो गया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक प्रकाशन के बंद होने का कारण प्रबंधन मंडल एवं सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों के बीच तालमेल का न होना है। बताया जाता है कि कर्मचारियों को पिछले दो माह से वेतन नहीं दिया गया था, जिसकी मांग को लेकर सम्पादकीय टीम ने प्रबंधन मंडल से अनुरोध भी किया था, लेकिन मैनेजमेंट ने उनकी बात को अनसुनी करते हुए वेतन देने में आना-कानी कर रहा था।
इसके बाद शुक्रवार क़ी शाम सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों ने अखबार के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल से कहा कि वे इस मामले में मैनेजमेंट से बात करें। बताया जाता है कि जब डॉ. शुक्ल ने इस बारे में एजीए पब्लिकेशन (जो तेलगू दैनिक वार्ता एवं हिंदी दैनिक स्वतंत्र वार्ता का प्रकाशन करती है) के प्रबंध निदेशक व पूर्व राज्यसभा सांसद एवं उद्योगपति गिरीश संघी (संघी कम्पनी के संचालकों में से एक) तथा कार्यकारी निदेशक गौरव संघी (उनके पुत्र) से संपर्क किया तो उन्होंने कोई जवाब न देते हुए अखबार परिसर (९६, लोअर टैंक बंद, हैदराबाद) से निकल कर घर चले गए।
इस बीच हड़ताली कर्मचारी देर रात एक बजे तक कार्यालय परिसर में इस आस में बैठे रहे कि प्रबंधन मंडल का कोई निर्णय आयेगा, लेकिन जब कोई जवाब नहीं आया तो वो चले गए। इस दौरान दूसरे दिन शनिवार को अखबार के ईडी गौरव संघी ने वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्यूरो प्रमुख चेतनसिंह तथा मुख्य शहर संवाददाता कुमार को बुलाकर कह दिया कि आप क़ी सेवाएं समाप्त क़ी जाती हैं। वहीं अन्य सहयोगियों से कहा गया कि जिनको काम करना है वे कार्यालय परिसर में रहें, जिन्हें नहीं करना वे चले जाएं। इस पर कर्मचारियों ने मैनेजमेंट को स्पष्ट कह दिया कि जब तक हमारा हिसाब नहीं किया जाता है, हम कार्यालय परिसर से बाहर नहीं जाएंगे? क्यों न हमें दो-तीन दिन यहाँ पर रुकना पड़े।
उधर, मैनेजमेंट के कुछ लोग कर्मचारियों को समझाने-बुझाने का भी प्रयास करते रहे, लेकिन वे अपनी बात से टस से मस नहीं हुए। परिणाम स्वरुप मैनेजमेंट को झुकते हुए सभी चालीस कर्मचारियों का पूरा भुगतान देर रात में करना पड़ा। इसी दौरान प्रबंधन ने अखबार के समूह सम्पादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल का भी बिना उनकी जानकारी में हिसाब कर दिया, जिस बात से उनके सहयोगियों में और आक्रोश फैल गया। उन्होंने न वापस आने का निर्णय ले लिया है।
उलेखनीय है कि संपादक को विदाई देने न तो स्वयं प्रबंध निदेशक डॉ. गिरीश संघी और न ही उनके पुत्र व कार्यकारी निदेशक गौरव संघी आए। उधर आनन-फानन में निज़ामाबाद के स्थानीय सम्पादक प्रदीप श्रीवास्तव को हैदराबाद तलब कर निर्देश दिया गया है कि अ़ब वे अख़बार निकाले, लेकिन स्टाफ न होने के चलते श्रीवास्तव ने प्रबंधन मंडल से जब असमर्थता जाहिर क़ी तो उन्हें जवाब दिया गया कि किसी भी तरह से निकालो, यह आप का काम है? रही स्टाफ क़ी बात तो मैं बिहार, झारखण्ड व उत्तर प्रदेश से सैकड़ों पत्रकार ला देता हूँ। इसी तरह स्वतंत्र वार्ता के विशाखापत्तनम के प्रभारी को हैदराबाद तलब किया गया है।
मजे क़ी बात यह है कि गत छह माह से निज़ामाबाद संस्करण का प्रकाशन (हिंदी व तेलगु दैनिक का) पहले से ही बंद है, वहीँ विशाखापत्तनम में कर्मचारयों के न होने से हैदराबाद संस्करण ही छप रहा है, जब कि निज़ामाबाद संस्करण हैदराबाद से छप कर बंट रहा है। कुल मिलकर हिंदी समाज में प्रबंधन मंडल के नाक क़ी अस्मिता बना हिंदी दैनिक स्वतंत्र वार्ता के प्रकाशन बंद होने से समाज में छिछालेदर हो रही है। उधर खबर है कि श्री संघी ने अपना व्यवसाय फैलाते हुए बिहार क़ी राजधानी में गौरव ट्रेवल्स के नाम से एक कंपनी चला रहें हैं, जिसके बेड़े में सुपर वोल्वो क़ी नौ बसे शामिल हैं, जिनकी कीमत (एक क़ी) अस्सी से नब्बे लाख के आस-पास है। दूसरी तरफ गिरीश संघी ने बिहार में ही नेशनल हाई वे का भी ठेका भी ले रखा है।






