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लेखक-पत्रकार बिरादरी ने किया राजेंद्र यादव का लोक सम्‍मान (देखें तस्वीरें)

अगर वयोवृद्ध कथाकार कृष्‍णा सोबती के शब्‍दों में कहें तो हिंदी कबीला रविवार को कथाकार और 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव के 'हजूर में हाजिर' था. मौका था यादव के लोक सम्‍मान  का. सोबती और प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने शॉल ओढ़ाकर उन्‍हें सम्‍मानित किया. हिंदी के तमाम दूसरे सम्‍मानों से अलग यह किसी लेखक का अपनी तरह का सम्‍मान इसलिए था क्‍योंकि यह लेखकों और पत्रकारों की ओर से किया गया और शायद पहली बार ऐसा हुआ.

अगर वयोवृद्ध कथाकार कृष्‍णा सोबती के शब्‍दों में कहें तो हिंदी कबीला रविवार को कथाकार और 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव के 'हजूर में हाजिर' था. मौका था यादव के लोक सम्‍मान  का. सोबती और प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने शॉल ओढ़ाकर उन्‍हें सम्‍मानित किया. हिंदी के तमाम दूसरे सम्‍मानों से अलग यह किसी लेखक का अपनी तरह का सम्‍मान इसलिए था क्‍योंकि यह लेखकों और पत्रकारों की ओर से किया गया और शायद पहली बार ऐसा हुआ.

सम्‍मान स्‍वरूप लेखकों की ओर से एकत्र की गई एक लाख रुपये की राशि हंसाक्षर ट्रस्‍ट में जमा की जाएगी. राजेंद्र यादव के स्‍वास्‍थ्‍य को देखते हुए यह सम्‍मान उनके घर के बाहर खुले प्रांगण में किया गया. सोबती ने अपने संबोधन में कहा कि 'हंस' के जरिए राजेंद्र यादव ने बहुत बड़ी दुनिया बनाई है. वह अगले पचास सालों तक चलने वाली है. उन्‍होंने कहा कि राजेंद्र यादव ने हिंदी समाज के लिए जितना किया वह काबिले तारीफ है. वह एक जिंदगी के लिए इतना है कि आप और हम सब गुमान कर सकें. सोबती ने उम्‍मीद जताई कि हंस की विरासत देर तक लोकतंत्र में लोगों को आईना दिखाती रहेगी.

वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है और जिंदादिली राजेंद्र यादव का नाम है. यादव के साथ 1952 में कोलकाता में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्‍मेलन में पहली मुलाकात का उल्‍लेख करते हुए सिंह ने कहा कि उसके बाद उनसे मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा. उन्‍होंने कहा कि उन्‍हें इतना दिनों तक जिंदा रहने की ताकत राजेंद्र यादव से मिली है. ये बिजली का झटका सा देकर उत्‍साह का संचार करते रहते हैं.

हाल में हुए ऑपरेशन के बाद यादव काफी कमजोर लग रहे थे. अपने अभिनंदन जैसे इस समारोह में व्‍हील चेयर पर बैठकर आए यादव ने अपनी दबंग आवाज के उलट क्षीण स्‍वर में कहा कि मैं जीवन भर दो चीजों से बचता रहा- अभिनंदन और दूसरा यह कि मैं किसी पर आश्रित न रहूं. उन्‍होंने बताया कि वे किसी भी तरह की सरकारी सहायता और अनुदान से बचने की कोशिश की. हमेशा यही चाहा कि लेखक की तरह अपनी बात कहूं. जीवन में दोस्‍त भी बनाए और दुश्‍मन भी. कुछ लींके तोड़ी. उन्‍होंने अपने बंधन-विरोधी स्‍वाभाव का जिक्र करते हुए बताया कि बंधन आपको विकसित नहीं होने देते.

कार्यक्रम का संचालन कर रहे कथाकार संजीव ने बताया‍ कि लोक सम्‍मान की यह योजना छह-सात महीने पहले बनी थी. उन्‍होंने कहा कि सम्‍मान राशि लेखकों-पत्रकारों की ओर से एकत्र की गई है. यह एक तरह से मातृ ऋण, पितृ ऋण या गुरु ऋण की तरह है. सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज ने अपनी ओर से 31 हजार रुपये की राशि हंसाक्षर ट्रस्‍ट में जमा करने की घोषणा की. पत्रकार मुकेश कुमार ने सुझाव दिया कि इस परम्‍परा को आगे बढ़ाते हुए हर वर्ष अपने वरिष्‍ठ रचनाकारों का इसी तरह सम्‍मान किया जाना चाहिए. पत्रकार अजीत अंजुम ने युवा लोगों में हिंदी और खास तौर पर साहित्‍य के प्रति रूचि और संस्‍कार जमाने में यादव के योगदान की चर्चा की. साधना अग्रवाल और ज्‍योति कुमारी ने भी इस मौके पर अपने विचार रखे. और हिंदी कबीला तो वहां मौजूद ही था. (साभार – हिंदी दैनिक जनसत्ता)

राजेंद्र यादव के लोक सम्मान में वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती का वक्तव्य

जनाब राजेंद्र साहिब, हिंदी कबीला आप के हजूर में हाजिर है। यह सिर्फ मुंह मुलाहिजा ही नहीं हिंदी वालों का, हम इकट्ठा हैं आपकी जिंदाबादियां बुलाने को, पूछिये भला क्यों। वह यूं कि आज की तारीख में जितने भी यादव बाहुबली सियासत के मैदान में हैं- आप उन्हें मात देकर सबसे आगे हैं। हमारी लेखक बिरादरी में आप न सिर्फ लेखक हैं- पहुंचे हुए प्रकांड एडिटर भी हैं। इसीलिए ये जिंदाबादियां- आपकी कारस्तानियां, अदबी बदमाशियां (यह शब्द प्यार से इस्तेमाल किया जा रहा है) तिकड़में और दूरंदेशियां। समझ रहे हैं न आप हमारा मतलब। यादव साहिब हंस के जरिए आपने एक बहुत बड़ी दुनिया बनाई है। वह अगले पचास साल तक चलने वाली है।
आपके शागिर्दों की मंडली उसे और पचास साल तक चलाएगी। राजेंद्र साहिब हिंदी समाज के लिए जितना आपने किया लेखक और पाठकों को दिया वह कम नहीं काबिले तारीफ है। एक जिंदगी के लिए इतना है कि आप और हम सब गुमान कर सकें। हंस की विरासत देर तक लोकतंत्र में लोगों को आईना दिखाती रहेगी। यादव साहिब जम्हूरियत में भी जातिवाद पनप रहा है। हम भी इसका सहारा लेकर आप तक पहुंचना चाहते हैं कि आप और आप ही हमारी लेखक जाति की नुमाइंदगी राज्यसभा में करेंगे। आप वहां अकेले नहीं होंगे। आपके साथ होंगे हमारे प्रिय नामवर जी।

राजेंद्र यादव को लेकर फेसबुक पर चर्चा

Yashwant Singh : हर तरफ कड़ी निगरानी रखे जाने के बावजूद राजेंद्र यादव जाने कैसे सिगरेट ले आए और सबके सामने कश खींचकर बताया कि बंदिशों को तोड़ने का आनंद ही कुछ और है… बगल में हंसते नामवर सिंह… इस आदि विद्रोही राजेंद्र यादव को सलाम.

        Durga Pandey : yaswant ji kuchh vidro achcha hote hai lekin yah nahi

        Haresh Kumar : पीने वालों को कोई रोक नहीं सकता। शायद राजेंद्र यादव यही कहना चाहते हैं।।

        Yashwant Singh : दुर्गा भाई, ये सिंबोलिक है. ऐसा नहीं कि राजेंद्र यादव नहीं जानते कि उन्हें डाक्टरों ने सिगरेट पीने से क्यों रोका है. पर घर परिवार व चाहने वालों की पीने न देने की कड़ी निगरान के कारण उनका मन इस निगरानी सिस्टम को तोड़ने का कर गया तो उन्होंने कर दिखाया यह काम, सबके सामने…. उनका यह प्रतीकात्मक विद्रोह यह बताने के लिए था कि लीक से हटकर चलने करने जीने में ही आनंद है..

        Manish Chandra Mishra : जीने का नाम राजेंद्र यादव है

        Murar Kandari : ha janab baat to sach hai

        Kunvar Sameer : Sahi rajendr yadav ji jinhe kbhi ek mhila lekhika ne wah sab kaha tha jo ham nhi kah sakte hai yadav ji ne jis sahjta se use hans me parkasit kar uska zbab diya tha wah isi zazbe ka natiza hai

        Rajneesh Kumar Chaturvedi : राजेन्द्र यादव सार्वजनिक तौर पर जूता भी खा चुके हैं,सिगरेट पीना कौन सी बड़ी बात है।

        Yashwant Singh : रजनीश कुमार चतुर्वेदी जी, महान लोगों को छोटी मोटी घटनाएं प्रतिक्रियाएं झेलनी पड़ती हैं, क्योंकि जब आप कुछ लीक से हटकर करेंगे तो ढेर सारे लोग आपके सपोर्टर होंगे और कुछ लोग भयंकर विरोधी बनेंगे. विरोध सिर्फ उनका नहीं होता जो कुछ नहीं करते…

        सौरभ सिंह : सलाम

        Ramhit Nandan : rajendra ji ke chehra dekho…kitne bimar lag rahe hain…..ye koi bagawat karna ya bandish todna nahin….apni sehat kharab karna hai……ye sirf yahi dikhata hai ki rajendra ji ko khud par control nahin raha…..talab lagi hai to lagi hai

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