आखिरकार मायावती को जाना पड़ा. यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी करारी हार हुई है. सौ सीट के आसपास मंडरा रही बसपा को डुबोने का काम सिर्फ और सिर्फ सत्ता के करीबी रहे आईएएस और आईपीएस अफसरों ने किया है. पूरे प्रदेश में पांच साल में जिस तरह का कुशासन चला, उसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार ये नौकरशाह ही हैं. नौकरशाहों के भरोसे रहीं मायावती को यह अंदाजा भी नहीं हुआ कि प्रदेश में गरीबों के साथ किस कदर अन्याय हो रहा है.
महिला, दलित, पत्रकार, किसान उत्पीड़न की घटनाएं और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा के कारण पूरे प्रदेश की जनता का बसपा और मायावती से मोहभंग हो गया. इसी का फायदा सपा को मिला है. सपा वाले जानते हैं कि करप्शन रोकना और ला एंड आर्डर मेनटेन करना उनकी पहली प्राथमिकता है. अगर वे ऐसा नहीं कर सके तो उन्हें भी जनता का कोपभाजन बनना पड़ सकता है. माया शासनकाल में भ्रष्ट और जनविरोधी अफसरों के खिलाफ सपा शासनकाल में कार्रवाई संभावित है. उत्तर प्रदेश की आगामी विधानसभा की तस्वीर एग्जिट पोल के दावों के मुताबिक ही सामने आती दिख रही है. यहां समाजवादी करीब 200 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी रही है. वह 202 के जादुई आंकड़े के पास है. मायावती की बीएसपी को झटका लगा है, लेकिन वह मजबूती से दूसरे नंबर पर है. बीजेपी और कांग्रेस तीसरे व चौथे नंबर के लिए संघर्ष कर रही हैं.





