मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूड़ी का कोटद्वार से चुनाव हार जाना किसी भी रूप से उत्तराखंड की राजनीति के लिए शुभ नहीं माना जा सकता. खंडूड़ी का फौजी होना जो उनके राजनीति का सबसे बड़ा गुण है वहीँ उनका फौजी अफसर होना उनके लिए नुकसानदायक सिद्ध हो रहा है. उनका आज भी जन प्रतिनिधियों से ज्यादा विश्वास नौकरशाहों पर है, जिस कारण आम आदमी से उनकी स्वाभाविक दूरी बन जाती है, जो उनको व्यक्तिगत रूप से नुकसान दे गया. राज्य व राज्य के बाहर फैले भू-माफियाओं व दलालों ने खंडूड़ी के हारने पर जश्न मनाया जो पहाड़ के लिए खतरे की घंटी है.
वैसे ..खंडूड़ी है.. जरूरी.. के नारे ने भाजपा के पक्ष में कितना काम किया यह शोध का विषय है, पर इस नारे से लैस पूरे पहाड़ में खंडूड़ी के बड़े-बड़े पोस्टर और उसमे कोश्यारी जैसे बड़े नेता का फोटो न लगाने में उनका अहंकार झलकता था, पर इसमें खंडूड़ी का कम, निशंक के जमाने में उत्तर प्रदेश से इम्पोर्ट किये गये एक आईएएस अधिकारी का ज्यादा दोष है, जो सरकार के प्रचार के साथ-साथ खंडूड़ी की चमचागिरी में भी मशगूल था और उसने ही खंडूड़ी के व्यक्तिगत प्रचार में ज्यादा रूचि ली. माल बनाने में माहिर का आरोपी यह अधिकारी, खंडूड़ी के आने पर राज्य में अहम किरदार की भूमिका निभाने की जुगत में थे?
खैर, वैसे खंडूड़ी ने अपनी हार के पीछे भितरघात की ओर इशारा किया लेकिन उन्हें आत्म विश्लेषण भी जरूर करना चाहिए कि उनमें क्या कमी रही है. वैसे भितरघात तब ही असर करता है जब अपने में कुछ कमजोरी होती है. पर यह बात बेहद जरूरी है उत्तराखंड को एक ईमानदार व मिलनसार मुखिया की जरूरत है. इधर, कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी, पार्टी से अपने अपमान का गिन-गिन कर बदला लेने से नहीं चूक रहे हैं, अपने भतीजे तथा आन्ध्र राजभवन में तिवारी की मिट्टी खराब करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले (उनके पीए) किरदार को कांग्रेस की बांह मरोड़कर टिकट दिलाकर पार्टी का नुकसान किया और पार्टी ये दोनों सीटें हार गई.
खैर, उत्तराखंड की महान जनता ने दोनों ही बड़े दलों को चेता दिया है कि वे दोनों ही उनके मापदंडों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं इसलिए उन्हें उत्तराखंड के विकास की सही रणनीति अपनानी होगी. नहीं तो देर सवेर उन्हें अन्य विकल्प तलाशने होंगे.
लेखक विजेंद्र रावत उत्ततराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.






