: नौ साल बाद शर्माते हुए लिखा- जिसे रिश्वतखोर कहा, वो रिश्वतखोर नहीं था : राष्ट्रीय सहारा के दिल्ली एडिशन में कल भीतर के पन्ने पर छोटे अक्षरों में पेज के एक कोने में खेद प्रकाश छपा. इस खेद प्रकाश को पढ़कर आपके सिर के बाल खड़े हो सकते हैं. और, आप कह सकते हैं कि काटजू भाई बिलकुल ठीक करंट छुवा रहे हैं इन मीडियावालों को. क्योंकि इन मीडियावालों की गैरजिम्मेदारी की कोई हद ही नहीं है.
किसी की निजी व सामाजिक प्रतिष्ठा को तारतार कर दिया और नौ साल बाद चुपचाप अकेले में कह रहे हैं सॉरी. राष्ट्रीय सहारा वालों में थोड़ी भी संवेदनशीलता होती तो इस खेद प्रकाश को पहले पन्ने पर प्रमुखता से प्रकाशित करते ताकि पीड़ित के मन में यह भरोसा पैदा हो जाता कि मीडिया वाले गलती करते हैं तो उसे उतनी ही विनम्रत व सहजता से स्वीकार करके माफी भी मांग लेते हैं.
राष्ट्रीय सहारा प्रबंधन ने इस खेद प्रकाश को जिस तरह बिलकुल अंदर और टेंडरनुमा विज्ञापनों के बीच में छापा है, उससे यह लगता है कि प्रबंधन ने यह खेद प्रकाश किसी मजबूरी में प्रकाशित किया है, मानवीयता या सामाजिकता या सरोकारी पत्रकारिता के नाते नहीं. आप भी पढ़िए खेद प्रकाश और राष्ट्रीय सहारा के प्रबंधक व संपादक को थू बोलिए…..
खेद प्रकाश
29 अक्टूबर, 2002 दिन मंगलवार को राष्ट्रीय सहारा के दिल्ली संस्करण में पेज पांच पर 'रिश्वतखोर खाद्य निरीक्षक बर्खास्त' शीर्षक से प्रकाशित समाचार गलत, भ्रामक और पूरी तरह तथ्यहीन है. संवाददाता ने जांच-पड़ताल और पूरी वस्तुस्थिति की जानकारी लिए बगैर यह खबर प्रकाशन को भेज दी. इस खबर के प्रकाशन से बलजीत सिंह की प्रतिष्ठा को जो आघात लगा, उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं. खबर के मुताबिक पंचतारा होटलों से खाद्य नमूनों की रिपोर्ट देने के लिए रिश्वत लेने के आरोप में खाद्य निरीक्षक बलजीत सिंह को बर्खास्त कर दिया गया, जबकि असलियत यह है कि श्री सिंह ने न तो काई रिश्वत ली थी और न उन्हें रिश्वत लेते पकड़ा गया था.
स्थानीय संपादक





