सपा से अलग होने के बाद अमर सिंह ने इस पार्टी को किसी भी तरह से कोसने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी थी. अमर सिंह का मुलायम से अलग होना और खुले तौर पर विरोध करना सपा के बड़े नुकसान से जोड़ा जा रहा था. पूर्वांचल राज्य के गठन के मुद्दे को लेकर अमर सिंह जनता के बीच पहुंच कर अपनी जमीन तैयार कर रहे थे. इसी बीच लोकमंच पार्टी बना कर विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी भी उतार दिये.
लोकमंच के प्रत्याशियों के प्रचार में पहुंचे अमर सिंह और जयप्रदा की सभाओं ने कई विधानसभा क्षेत्रों में दूसरे दलों के होश उड़ा दिए थे. उम्मीद की रही थी कि अमर सिंह की पार्टी की सीट भले न निकले लेकिन एक बड़ा तबका उनके साथ होगा खास कर राजपूत मतदाता. प्रत्याशियों के चयन में भी फूंक-फूंक कर कदम रखा गया था. अस्वस्थ होने के बाद भी अमर सिंह ने चुनाव प्रचार में काफी मेहनत की थी लेकिन अमर सिंह के गृह जनपद तक में लोगों ने उनको नकार दिया.
आजमगढ़ के दसों विधानसभा सीटों पर अमर सिंह ने लोक मंच के प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से चार सीटों पर तो एक हज़ार मत भी उनके प्रत्याशियों को नहीं मिला. राजपूत मतदाताओं के बाहुल्य वाले क्षेत्र से लोक मंच के सचिव बिजेंद्र सिंह को भी मात्र 2486 मतों से ही संतोष करना पड़ा. सबसे ज्यादा 2569 मत दीदारगंज सीट से अरविन्द को मिले. कुल मिलाकर किसी भी सीट पर जमानत नहीं बच पाई. अब तो समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनने जा रही हैं वह भी बिना अमर के. अमर सिंह का चुनाव के नतीजों के बाद कोई बयान नहीं आया और ना ही कोई नाम. अखिलेश ने जरुर कहा कि वो मेरे अंकल थे, हैं और रहेंगे. अब देखना यह हैं कि अमर और जया प्रदा आगे क्या करते हैं. कोई नई पार्टी ज्वाइन करते हैं या फिर पूर्वांचल गठन के लिए संघर्ष जारी रखते हैं.
दिग्विजय राठौर
आज़मगढ़





