: यमराज से दो घंटे तक साक्षात्कार की कहानी, पीड़ित पत्रकार की जुबानी : कल होली के दिन यमराज से मेरा लगातार दो घंटे तक आमना-सामना हुआ. सोचा नहीं था, कभी साक्षात् यमराज से सामना होगा और लगातार दो घंटे की मुठभेड़ के बाद भी मैं जीवित रह सकूँगा. पर अनहोनी हुई और आज मैं आपके सामने हूं. होली के दिन सुबह ६ बजे के करीब हमेशा की तरह सैर पर निकला और कच्ची घाटी (शिमला) से नए बन रहे जिला कोर्ट की तरफ जा रही कच्ची सड़क पर चल पड़ा. सामने ऊँची पहाड़ी दिखी तो मन में विचार आया कि क्या मैं अब भी ऐसी खतरनाक ढांक पर चढ़ सकता हूँ. पहाड़ी गाँव में जन्मा बड़ा हुआ हूँ, इसलिए ऐसी घाटियों को अनेक बार फतह कर चुका हूँ.
पुराना वक्त याद करके मैंने अचानक ढांक पर चढने का निर्णय ले लिया. पाँव में चप्पल और हौसले आसमान पर! ढांक पर चढ़ तो गया, लेकिन जब पीछे मुड़कर देखा तो पाँव के नीचे से ज़मीन खिसकने लगी. तब अचानक याद आया कि अब १८-२० साल का जवान नहीं हूँ. १० फरवरी को ही तो ५५ का हुआ हूँ. उम्र याद आते ही खून सूख गया और कदम लड़खड़ाने लगे. पीछे मुड़ा तो 85 किलो शरीर जवाब दे गया. पांव के नीचे का पत्थर हिलने लगा तो प्राण गले में आकर अटक गए. अचानक पत्थर लुढ़क गया और साथ ही मैं भी.
कुछ नीचे चीड़ का पेड़ था. वहीँ अटक गया तो ऐसा लगा कि डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो. जेब से मोबाईल छिटककर दूर पड़ा था और घंटी भी बजने लगी थी. सोचा, पत्नी जानना चाहती होगी कि आज मार्निंग वाक में देरी क्यूँ? पर मोबाईल पहुँच से बाहर था. थोड़ा भी हिलता तो मौत निश्चित थी. मैं पांव से निकली हुई चप्पलों को एकटक देख रहा था जो बहुत नीचे सड़क तक जा पहुंची थी. लगा, इतनी दूर तक लुढकने से चप्पलें मर गयी होंगी. जहाँ मैं फंसा था वह एक सूनसान कच्ची सड़क है.
सुबह के वक्त तो शायद ही इस ओर कोई आता हो. मैं पत्थर हो गया, क्यूंकि जानता था कि थोड़ा सा हिलने पर चप्पलों की तरह मारा जाऊंगा. लगभग दो घंटे यमराज सामने बैठे मुस्कराते से दिखते रहे. अचानक तभी दूर मोड़ पर लाल बैग हाथ में उठाए एक व्यक्ति ऊपर की ओर आता हुआ दिखा. कुछ जान में जान आई. पास आने पर उसे पुकारा तो उसने चौंक कर ऊपर देखा. पूछने लगा कि मैं वहां पहुँच कैसे गया! मैंने कहा, पहले उतारो फिर सब बता दूंगा. कुल मिलाकर लम्बी रस्सी का इंतजाम कर एक गोरखा किसी तरह ऊपर पहुंचा, रस्सी उसी पेड़ से बांधी और उसके सहारे किसी तरह मैं नीचे उतरा.
चप्पलें जिन्दा थीं. पहनी और थके क़दमों से घर की ओर चल दिया. आज शुक्रवार, 9 मार्च की सुबह मैं फिर उसी सड़क पर निकला और देर तक उस ढांक को घूरता रहा. मुझे लगा कि ढांक भी मुझे घूर रही है. वह कल हार गयी थी और हार किसे पसंद है? हार मुझे भी पसंद नहीं है. मैंने भी तय कर लिया कि इस ढांक पर जल्दी ही पूरी तैयारी के साथ फिर हमला करूँगा और फतह भी हासिल करूँगा. आखिर मेरे मित्र यूँ ही मुझे अकडू और सनकी
पत्रकार नहीं कहते!
कृष्ण भानु हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय तक जनसत्ता अखबार में रहे. इन दिनों हिमाचल आजकल नामक न्यूज चैनल के हेड के रूप में कार्यरत हैं. ये भी पढ़ सकते हैं- सनकी और अकड़ू नहीं होता तो पंद्रह साल पहले इस पद पर पहुंच जाता





