बात जयपुर के एक अंग्रज़ी अख़बार में कार्यरत एक संपादक की है… पिछले कुछ दिनों पहले वो अपने तीन चेलों के साथ जयपुर के मालवीय नगर इलाक़े में शराब पी रहे थे… कार के बोनट पर शराब की बोतलें… कार के चारों दरवाज़े खुले हुए… तेज़ कानफोडू म्यूज़िक… रात्रि गश्त पर रहने वाले पुलिस वालों ने दो बार टोका तो संपादक जी अकड़ गए… तेरी इतनी हिम्मत… तेरे कमिश्नर को फोन करूं क्या… तेरा डीसीपी क्या बेचता है…
गश्त दल में दो महिला कमांडो भी थीं… उनसे भी संपादक महोदय और उनके चेलों ने बदतमीज़ी करी. बात बढती देख गश्त दल ने थाने को इत्तला कर दी. थाने से कुछ लोग आए तो शराब और पत्रकारिता के नशे में टुल महाशय ने उनसे भी बदसलूकी करी. थाने वाले चारों को थाने ले आए. थाने में भी संपादक महोदय का वही रवैया था. पुलिस अफसरों के बारे में गलत टिप्पणियां वगैरह. जब संपादक जी बेकाबू होने लगे तो एक पुलिस वाला उठा और संपादक जी के गाल पर एक तमाचा रसीद कर दिया… सुनने में तो यहां तक आया कि फिर उनकी ठीकठाक ठुकाई हो गई. शर्ट फट गई और इज़्ज़त को जो फालूदा बना सो अलग.
बात सीनियर अफसरों तक पहुंची तो अधिकारी थाने पहुंचे. संपादकजी अड़ गए… तमाचा मारने वाले पुलिसकर्मी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करो… इस बात पर गश्त दल की महिलाएं भी मुकदमा दर्ज कराने की बात करने लगीं… अधिकारियों ने समझाया मुकदमेंबाज़ी हुई तो मेडिकल होगा… मेडिकल में शराब पीना भी सामने आएगा… शराब पीकर महिला पुलिसकर्मी से बदसलूकी, मामला बहुत संगीन हो जाएगा… इसलिए भलाई इसी में है कि मामले को रफादफा कर दिया जाए. शराबी संपादक को बात समझ में आ गई और मामला रफादफा हुआ. इस घटना को चुपचाप दबा दिया गया लेकिन बात छुपती थोड़े है…
जयपुर से एक पत्रकार द्वारा कानाफूसी कालम के लिए भेजा गया पत्र.





