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फोर्स लीव पर भेजे गए आलोक की भी वापसी, अनिल मिश्रा और रतन सिंह का वनवास जारी

हिंदुस्‍तान, बनारस में तूफान आने से पहले वाली शांति छाई हुई है. कर्मचारी कम और तनाव ज्‍यादा है. माफिया डॉन बृजेश सिंह की खबर के बाद फोर्स लीव पर भेजे गए दो लोगों की वापसी हो गई है, पर दो लोग अब भी फोर्स लीव पर है. अब तक इस खबर के लिए फोर्स लीव पर भेजे गए जेएनई अनिल मिश्रा और सिटी इंचार्ज रतन सिंह की वापसी नहीं हो पाई है. कई दूसरे पत्रकारों के जनसंदेश टाइम्‍स चले जाने से स्थिति और भी खराब हो गई है.

हिंदुस्‍तान, बनारस में तूफान आने से पहले वाली शांति छाई हुई है. कर्मचारी कम और तनाव ज्‍यादा है. माफिया डॉन बृजेश सिंह की खबर के बाद फोर्स लीव पर भेजे गए दो लोगों की वापसी हो गई है, पर दो लोग अब भी फोर्स लीव पर है. अब तक इस खबर के लिए फोर्स लीव पर भेजे गए जेएनई अनिल मिश्रा और सिटी इंचार्ज रतन सिंह की वापसी नहीं हो पाई है. कई दूसरे पत्रकारों के जनसंदेश टाइम्‍स चले जाने से स्थिति और भी खराब हो गई है.

उल्‍लेखनीय है कि चंदौली जिले के सैयदराजा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले माफिया डॉन बृजेश सिंह उर्फ अरुण कुमार सिंह की एक खबर को लेकर हिंदुस्‍तान में बवाल मच गया था. यह खबर कैसे प्‍लांट की गई या कराई गई अब तक इसकी जांच नहीं हो पाई है. कौन लोग इसमें शामिल थे अब तक प्रबंधन इसकी जांच नहीं कर पाया है. इस खबर के प्रकाशित होने के बाद चंदौली के ब्‍यूरोचीफ अनूप कर्णवाल एवं चंदौली पेज देखने वाले आलोक राय, ज्‍वाइंट न्‍यूज एडिटर अनिल मिश्रा तथा सिटी इंचार्ज रतन सिंह को फोर्स लीव पर भेजा गया था.

हालांकि इस मामले में रतन सिंह को फोर्स लीव पर भेजे जाने की बात को शुरू से गलत माना गया था क्‍योंकि उसमें उनकी किसी भी प्रकार की जिम्‍मेदारी नहीं बनती थी. वैसे भी प्रबंधन इस खबर की जड़ में जाने की बजाय शाखाओं को ही काटकर अपने काम को इतिश्री करने की जुगत में लगा हुआ है. प्रबंधन ने अब तक यह जानने की कोशिश नहीं की है कि आखिर स्‍थानीय स्‍तर पर किसने इस समाचार को लिखा और ब्‍यूरो कार्यालय भेजा था. किसके आदेश पर ऐसा किया गया था. अगर प्रबंधन इन बातों का पता लगाता तो शायद पूरी सच्‍चाई सामने आ जाती, पर किसी को बचाने के लिए सिर्फ शाखाओं को ही काटने की रणनीति अपना रहा है.

संपादक अनिल भास्‍कर ने इस खबर को लेकर फोर्स लीव पर भेजे गए अनूप कर्णवाल के बाद आलोक राय की भी वापसी करा दी है, पर रतन सिंह और अनिल मिश्रा अब भी फोर्स लीव पर हैं. इन दोनों के ऊपर अब भी तलवार लटक रहा है. पर कार्यालय के बीच से जो बातें छनकर आ रही हैं उससे यही लग रहा है कि चुनाव के दौरान खेल करने की तैयारी पहले ही कर ली गई थी. इसमें ज्‍वाइंट न्‍यूज एडिटर के साथ संपादक की भी सहमति होने की बात सामने आ रही है. बताया जा रहा है कि इस मामले में बुरी तरह फंस चुके अनिल मिश्रा को बचाने के लिए ही रतन सिंह को लटकाए रखा गया है ताकि आखिरी बलि उनकी ही चढ़े.

सूत्र बताते हैं कि पिछले कुछ समय से डाक एवं अन्‍य जिम्‍मेदारियों को देखने वाले न्‍यूज एडिटर रजनीश त्रिपाठी से संपादक अनिल भास्‍कर ने जिम्‍मेदारी लेकर 16 जनवरी को ही ज्‍वाइंट न्‍यूज एडिटर अनिल मिश्रा को सौंप दी थी. बताया जा रहा है कि अनिल मिश्रा इसके पहले भी विधान सभा तथा लोकसभा चुनावों में अपने संपादकों को खुश कर चुके थे. लिहाजा एक बार फिर यह जिम्‍मेदारी रजनीश त्रिपाठी जैसे ईमानदार व्‍यक्ति से लेकर अनिल मिश्रा को सौंप दी गई थी. इसके बाद से ही खेल शुरू हो गया. अंदरुनी तौर पर कई तरह से गुणा-गणित लगाकर छोटी-मोटी खबरें छापी गईं, पर बृजेश सिंह की खबर ने सब किए धरे पर पानी फेर दिया.

माफिया डॉन से जुड़ी इस खबर की गूंज दिल्‍ली तथा लखनऊ पहुंच जाने के चलते संपादक अनिल भास्‍कर को इन लोगों के खिलाफ फोर्स लीव पर भेजे जाने की कार्रवाई करनी पड़ी, पर इसमें लोचा त‍ब आ गया जब डाक एवं चंदौली पेज की जिम्‍मेदारी से दूर रतन सिंह को भी फांस लिया गया. पहले संभावना थी कि चंदौली पेज देखने वाले आलोक राय को बलि का बकरा बनाया जाएगा, पर पेज पर अनिल मिश्रा के हस्‍ताक्षर होने के चलते आलोक राय बच निकले. बताया जा रहा है कि जौनपुर पेज की जिम्‍मेदारी देखने वाले रतन को इसलिए फांस लिया गया ताकि एक तीर से दो शिकार किया जा सके.

अनिल मिश्रा और रतन सिंह के बीच कार्यालय में कहासुनी हो चुकी है. इसके बाद रतन सिंह को लखनऊ भेज दिया गया था, पर राजकुमार सिंह के कार्यकाल में रतन सिंह की वापसी हुई थी. इसके बाद से ही अनिल मिश्रा और उनकी शीतयुद्ध की चर्चा हिंदुस्‍तान कार्यालय में चलती रहती है. अनिल मिश्रा की खासियत है कि वे सभी संपादकों के चहेते बन जाते हैं. अब वे कौन सी घुट्टी पिलाते हैं वही जाने पर रिकार्ड यही कहता है. अब बताया जा रहा है कि स्‍थानीय संपादक अपने चहेते ज्‍वाइंट एनई को बचाने के लिए रतन सिंह का शिकार करने की तैयारी पूरी कर चुके हैं. अब देखना है कि अनिल मिश्रा और रतन सिंह कितने दिनों तक फोर्स लीव पर रहते हैं और इनके भविष्‍य का क्‍या निर्णय होता है.

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