कथाकार एवं चार साल तक 'हंस' के कार्यकारी संपादक रहे संजीव आज राईटर्स इन रेज़ीडेन्स होकर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के लिए रवाना हो गए। इस बीच संजीव जी के साथ जो समय बीता बहुत अच्छा रहा, कई यादें मन में हमेशा रहेंगी। दिल्ली उन्हें बहुत रास नहीं आई। वे कहते हैं दिल्ली लेखन के लिए बहुत अच्छी जगह साबित नहीं हुई, उनके लिए, फिर भी यहाँ रहकर उन्होंने अपने दो उपन्यास- 'आकाश चम्पा' और 'रह गई दिशाएं इसी पार' लिखी। दिल्ली उन्हें याद करती रहेगी। शुभकामनाओं सहित- विवेक मिश्र
उम्मीदों और रचनात्मकता का दिया यूँ ही रोशन होता रहेगा. संजीव सर जैसा इंसान तो परमात्मा अब बनाना ही भूल गया है. वो इस युग के महानतम कथाकारों में से एक हैं. दिल्ली में उनका होना किसी वटवृक्ष जैसा था. उनकी ये छाँव अब वर्धा को मिलेगी.. हमारी भावभीनी शुभकामनाये.. -ध्यानेंद्र मणि त्रिपाठी
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