कल यानी शुक्रवार की शाम मैं अपने ऑफिस में न्यूज़ फाइल करने की तैयारी कर रहा था कि अचानक मेरे सेल फ़ोन की घंटी बजती है.. देखा तो एक पुराने परचित का फ़ोन था… उन्होंने घबराहट भरे आवाज में मुझसे पूछा कि कुछ पता चला… मैं ने कहा- नहीं तो… तब उन्होंने बड़े ही दर्द भरे आवाज और अंदाज से कहा कि सुनील अब इस दुनिया में नहीं.. वह हमलोगों को छोड़कर चला गया… तो ऐसा लगा जैसे कानों में कोई पिघलता हुआ शीशा डाल दिया हो… दिमाग में बम जैसा फूटने लगा…क्योंकि अभी तीन दिन पहले ही सुनील से मेरी बात हुई थी.. सब कुछ ठीक था.
मैंने इस बातचीत के दौरान सुनील को चाय पर भी बुलाया था लेकिन वो नहीं आया… मैंने भी सोचा कि काम का दबाव ज्यादा हो.. इसलिए ज्यादा कोशिश नहीं किया.. क्योंकि अक्सर ऐसा होता था कि उसे शाम में समय बहुत कम मिल पाता था… सहसा मुझे इस खबर पर विश्वास नहीं हुआ… मैंने सच्चाई जानने के लिए उससे मोबाइल पर रिंग किया तो फोन उसके भाई ने उठाया और कहा कि सही बात है.. सुनील हमलोगों को छोड़कर चला गया… उसके भाई का रुदन मुझे अंदर तक झकझोर गया… ऐसा लगा जैसे मेरा होश ही कहीं खो गया… सुनील के साथ बिताया हर पल.. हर लम्हा… आंखों के सामने घूमने लगा.
बात साल 2001 की है… जब 20-21 साल का नौजवान दैनिक जिम्मेदार के ऑफिस में पत्रकार बनने की इच्छा लेकर आया था… उस दौरान मैं भी वहीं पर काम कर रहा था… उससे बातचीत किया तो पता चला कि उसने बीकॉम कर लिया है और एमकॉम की पढ़ाई कर रहा है… उसके बातचीत के अंदाज ने मुझे प्रभावित किया… धीरे-धीरे हम एक दूसरे के करीब आते चले गए… हम दोनों लोगों के बीच अच्छी समझ और दोस्ती हो गई… फिर क्या था समय का पहिला घूमता रहा… चीजें अपनी वेग से चलती रहीं.. इसी बीच न्यूज पेपर बंद हो गया… और यहां काम करने वाले हम सब लोग बेरोजगार हो गए.
मैंने एक नए अखबार में नौकरी शुरू कर दी… सुनील भी कई अखबारों के दफ्तरों का चक्कर लगाया पर बात नहीं बनी… फिर भी उसने हार नहीं मानी और अपने हार ना मानने वाले स्वभाव के अनुसार कोशिश लगातार जारी रखी… कई रोज जब वह तमाम अखबार के कार्यालयों से मिल जुलकर शाम को वापस आता तो निराश दिखता… पर हर बार हम उसका हौसला बढ़ाते और कहते कि सुनील कोशिश जारी रखो सफलता जरूर मिलेगी… वह फिर से चार्ज हो जाता… एक सप्ताह बाद उसने आकर खुद बताया कि भाई दैनिक जागरण में काम मिल गया है… पर मिलेगा कुछ नहीं.. फिर भी अभी वहीं काम करूंगा.. कभी न कभी तो कुछ जरूर मिलेगा.
इसके कुछ दिन बाद वो फिर एक बार मुझसे मिला और बताया कि भाई अब जागरण उसे 300 रुपये देने लगा है… फिर समय बीतता रहा… कुछ समय बाद उसने खबर दिया कि अब उसकी सेलरी बढ़कर 7000 रुपये हो गई है… हम सब बहुत खुश थे… कुछ दिनों के बाद उसके नाम से भी खबर छपने लगी थी… फिर क्या बस मेरे दोस्त ने इतनी महारत हासिल कर ली कि हर सप्ताह दो-चार खबरें सुनील पाठक के नाम से लगने लगीं..प्रशासनिक खबरों के मामले में तो कहना ही क्या… उसका कोई जोड़ नहीं था… अपनी धुन का इतना पक्का की खबर सूंघकर पता लगा लेता था… पूरे विकास भवन में सुनील की तूती बोलती थी… मैं जब भी उसके साथ जाता तो उसकी तेजी ही देखता रह जाता.
मैं सुनील को अपने छोटे भाई जैसा प्यार करता था… कोई भी खबर होती सुनील पाठक को फोन लगाता काम हो जाता था… अब सोचता हूं कि अब जब कि वो नहीं है… हम किससे इतने अधिकार से बात करेंगे… कोई भी मुसीबत होती और उसे कॉल करता तो बस एक बात ही कहता… ठाकुर साहब आपने जो फैसला ले लिया हम आपके साथ हैं… हमें आपकी दोस्ती प्यारी है… हम किसी की परवाह नहीं करते… अब सोचता हूं कौन मुझसे ये सब कहेगा… कौन मेरे फैसले के साथ खड़ा होगा… पर इन सब बातों के बीच मुझे एक बात अब भी कचोट रही है… कष्ट दे रही है कि वो सुनील जो इतना साहसी था… उसने फांसी क्यों लगाई?
ये सवाल अब भी मुझे खाए जा रहा है कि मेरा साहसी दोस्त ऐसा कैसे कर सकता है… जबकि उसकी पत्नी और दो मासूम बेटे भी हैं…. सुनील फैजाबाद के अश्वनीपुरम कालोनी में अपने बड़े भाई के साथ रहते थे…. सोचा जा रहा था कि बीएड कर लिए हैं… जल्द ही सरकारी नौकरी मिल जाएगी और पत्रकारिता भी अच्छे से चलती रहेगी….लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था… सुनील हम सब को छोड़कर चला गया… फिर भी उस दोस्त की यादें हम सभी दोस्तों के जेहन में हमेशा ताजा रहेंगी… हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्मा को शांति मिले.. और परिवारवालों को हिम्मत.. प्रिय भाई सुनील को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि.. जय हिंद!!!
कुंवर समीर साही
पत्रकार
अयोध्या, फैजाबाद





