: दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल को भंग करने की मांग : राजधानी दिल्ली में शनिवार को नागरिक समाज से जुड़े अलग-अलग समूहों ने इसराइली दूतावास की कार पर हुए हमले के मामले में पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की गिरफ्तारी के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की. 'हम लड़ेंगे साथ उदास मौसम के खिलाफ' के नारे के साथ नागरिक समाज के इन लोगों ने दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल को भंग करने की मांग की. उनका कहना था कि काजमी पर उसी तरह से ही झूठे आरोप लगाए गए है और गिरफ्तार किया गया है जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार इफ़्तिखार गिलानी के साथ वर्षों पहले किया गया था.
गौरतलब है कि वर्ष 2002 में जम्मू से प्रकाशित होने वाले अखबार 'कश्मीर टाइम्स' के उस समय दिल्ली के ब्यूरो चीफ रहे इफ़्तिखार गिलानी को सरकारी गोपनीयता कानून के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें सात महीनों तक जमानत नहीं मिली और आखिरकार जब पुलिस को कोई सबूत नहीं मिल सका तो इफ़्तिखार गिलानी जनवरी 2003 में रिहा हुए. शनिवार को सैयद मोहम्मद काजमी के समर्थन में जमा हुए लोगों का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय लॉबी को खुश करने के लिए काजमी को बलि का बकरा बनाया जा रहा है.
उधर दिल्ली पुलिस प्रवक्ता राजन भगत ने इस मामले में कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया. नागरिक समाज के समूह में पत्रकार, शिक्षक, समाजसेवी, लेखक और दूसरे कार्यकर्ता शामिल हैं. वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी का कहना था कि वो काजमी को साल 2003 से करीब से जानते हैं. नकवी ने कहा, ''काजमी ईरान के मामलों के जानकार है. उन्हें ऊर्दू, फारसी, पश्तो और अरबी भाषा आती है और इराक युद्ध के दौरान कवरेज के लिए उन्होंने पत्रकारों की काफी मदद भी की थी.''
इस मौके पर काजमी के छोटे बेटे तुराब अली काजमी भी मौजूद थे. उन्होंने पत्रकारों से उनके पिता और परिवार की मदद करने के लिए कहा. तुराब का कहना था, ''मेरे पिताजी बेकसूर है. वो 20-25 साल से मध्यपूर्व की रिपोर्टिंग करते रहे हैं और वो इराक युद्ध की कवरेज भी कर चुके हैं. उनके खिलाफ साजिश रची गई है. मेरी दो दिन पहले अपने पिता से मुलाकात हुई थी, उनका चेहरा उतरा हुआ था और उन्हें मानसिक यातना भी दी गई थी. मेरी उनसे ज्यादा बात नहीं हो पाई.'' तुराब ने ये भी कहा कि पुलिस उनके परिवार वालों को भी उनके पिता से नही मिलने दे रही है.
दिल्ली में गत 13 फरवरी को इसराइली दूतावास की गाड़ी पर हुए हमले के लिए पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की गिरफ़्तारी के बाद अदालत ने उन्हें 20 दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया है. काजमी की गिरफ्तारी पर दुख जताते हुए गैर सरकारी संगठन अनहद की शबनम हाशमी ने कहा, ''उत्तर प्रदेश में साल 2007 में सिलसिलेवार बम धमाके हुए, 2008 में जयपुर, बैंगलोर और दिल्ली में बम धमाके हुए और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया लेकिन चरमपंथ के मामलों के जानकार इंडियन मुजाहिद्दीन के बारे में कुछ बता नहीं पाए है कि वो है क्या. आज तक एक भी मामले में जुर्म साबित नहीं हुआ है. अगर जुर्म साबित हुआ है तो केवल समझौता धमाके में और इस बारे में हमारी गलती रही है कि हम चुप रहे हैं."
पत्रकार सीमा मुस्तफा ने पत्रकारों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि पत्रकार पुलिस सुत्रों या सरकारी एजेंसी से खबरें लेकर छाप रहे है. पत्रकार काजमी के परिवार या उनके परिवारवालों से मिलकर स्वतंत्र रिपोर्टिंग क्यों नहीं कर रहे हैं? सीमा मुस्तफा ने तो दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल को भंग करने की मांग की. उन्होंने कहा, ''दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के खिलाफ एनकाउंटर, बलात्कार और हत्या करने के कई मामले है जिसकी जांच होनी चाहिए. इसे भंग किया जाना चाहिए. अगर ये नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे पा रहा है बल्कि उसे छीन रहा है तो उसको खत्म कर देना चाहिए.''
स्पेशल सेल के खिलाफ आने वाले मामलों को अपने हाथ में लेने वाले वकील एनडी पांचौली का कहना था, ''स्पेशल सेल का तजुर्बा अच्छा नहीं रहा है. कई मामलों में हमने पाया कि उन्होंने बेगुनाह लोगों को पकड़ा और ज्यादातर मामलों में बनावटी सबूत दिए हैं. स्पेशल सेल और उसमें शामिल कई लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले भी पाए गए है और अदालत ने भी इन पर कई बार कड़ी टिप्पणी की है, तो ऐसे स्पेशल सेल को ये मामला देकर सरकार ने ठीक नहीं किया है.''
वरिष्ठ पत्रकार सईद नकवी का कहना था कि उन्होंने काजमी की रिहाई को लेकर शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मार्केडय काटजू, सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान के अलावा दूसरे कई लोगों से बात की थी. सईद नकवी के अनुसार सबों ने उन्हें इस बारे में कुछ करने का यकीन दिलाया है. उनका कहना था कि सरकार तो चुनाव के नतीजों के बाद से ही चुप है लेकिन सरकार को इस पर वक्तव्य देना चाहिए.
बीबीसी संवाददाता सुशीला सिंह की रिपोर्ट. साभार – बीबीसी






