एचआरएचएम घोटाले के आरोपी पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के वरदहस्त व सौरभ जैन (फ़िलहाल दोनों जेल में) के स्वामित्व से उत्पन्न जनसंदेश टाइम्स हिंदी दैनिक का खर्च आज भी अज्ञात स्रोतों से प्राप्त धन से ही चल रहा है. जनसंदेश टाइम्स के वर्तमान एमड़ी अनुज पोद्दार तो केवल बाबू सिंह कुशवाहा के प्यादे मात्र हैं. इसीलिए आज भी अख़बार का खर्च अज्ञात स्रोतों (बाबू सिंह कुशवाहा से प्राप्त धन) से चल रहा है. इस स्रोत को लीगल जामा पहनाने के लिए लखनऊ में तीस हजार कापी की एक फर्जी एजेंसी चलाई जा रही है. इस फर्जी प्रसार एजेंसी से प्राप्त धन से अख़बार के खर्चे चलाए जा रहे हैं जबकि इस एजेंसी का कहीं कोई वजूद नहीं है.
लखनऊ की वास्तविक सेल दो हजार से भी कम है जो शुक्ला न्यूज़ एजेंसी (महेश शुक्ला) द्वारा संचालित होती है. इसका पूरा लेखा-जोखा महेश शुक्ला से प्राप्त किया जा सकता है परन्तु तीस हजार कापी की इस फर्जी एजेंसी का कोई भी रिकार्ड कहीं भी उपलब्ध नहीं है. वैसे इस एजेंसी का नाम भी शुक्ला न्यूज़ एजेंसी (U.P.C.) है. इन्ही सब घालमेल के कारण लखनऊ शहर की एजेंसी भी बदली गई थी. पुराने एजेंट राकेश सिंह की जमानत धनराशि भी केवल इसलिए वापस नहीं की जा रही है जिससे उसकी पूंछ दबी होने से वह कोई राज न उजागर कर दे.
जनसंदेश टाइम्स लखनऊ की शुरुआत 8 फरवरी 2011 को हुई थी. तब इसके संपादक सुभाष राय व एमड़ी सौरभ जैन हुआ करते थे परन्तु CBI के फंदे में फंसने पर सौरभ जैन के स्थान पर अनुज पोद्दार को एम.ड़ी. बना दिया गया जिसने फरवरी से दिसम्बर 2011 तक का सारा हिसाब-किताब आफिस के कम्प्यूटरों से हटवा दिया है. यहाँ तक कि किसी भी प्रसार एजेंसी का कोई भी रिकार्ड उपलब्ध नहीं है. एजेंटो द्वारा जमा की गई जमानत राशि का भी कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है. जमानत राशि वापस मांगने वाले एजेंटों को लगातार टरकाया जा रहा है.
जब बाबू सिंह कुशवाहा बसपा में थे तब यह अख़बार मायावती व उनकी सरकार का भोंपू हुआ करता था परन्तु कुशवाहा के बसपा से हटते ही इसका टार्गेट नसीमुद्दीन सिद्दीकी हो गए क्योंकि कुशवाहा गुट का मानना है कि मायावती और बाबू सिंह कुशवाहा के बीच जो कुछ भी हुआ उसका कारण केवल नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही थे. चुनाव से ऐन पहले प्रिंट लाइन में संपादक सुभाष राय के स्थान पर पूर्व सूचना आयुक्त ज्ञानेंद्र शर्मा व प्रिंटर / पब्लिशर सौरभ जैन के स्थान पर अनुज पोद्दार का नाम जाना भी एक रणनीति का हिस्सा था. क्योंकि चुनाव बाद समाजवादी पार्टी की सरकार बनने की आहट के कारण ही ज्ञानेंद्र शर्मा को संपादक बनाने के लिए सुभाष राय को हटने के लिए मजबूर किया गया था. अपने सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने वाले सुभाष राय ने एम. ड़ी. अनुज पोद्दार के हाथ की कठपुतली बनने से इंकार कर दिया था, जबकि ज्ञानेंद्र शर्मा और समाजवादी पार्टी के मुखिया के सम्बन्ध जगजाहिर हैं.
पिछले एक वर्ष तक समाजवादी पार्टी को पानी पी-पीकर कोसने वाला जनसंदेश टाइम्स अब गिरगिट की तरह अपना रंग बदलता हुआ समाजवादी पार्टी का गुणगान करने में जुट गया है. एक चालाक व्यापारी की तरह अनुज पोद्दार भी अपनी एक उंगली कटा कर शहीदों में अपना नाम लिखाना चाहते हैं. इसीलिए समाजवादी पार्टी को साधने के लिए संपादक ज्ञानेंद्र शर्मा से लेकर सहायक विज्ञापन प्रबंधक सुश्री प्रज्ञा सिंह को लगा दिया है. गोरखपुर के स्थानीय संपादक शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी को भी इस मुहिम में जोड़ा गया है. यह भी निश्चित है कि यदि समाजवादी पार्टी की सरकार को साधने में ये लोग विफल रहते हैं तो जल्द ही इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जायगा.
समाजवादी पार्टी की सरकार को साधने का प्रमुख कारण सरकारी विज्ञापन दरों को बढवाने के साथ अनुज पोद्दार को अपने व्यक्तिगत व्यवसाय के लिए अन्य सुविधाएँ प्राप्त करना है. घोटालों की कोख से उत्पन्न जनसंदेश टाइम्स का भविष्य बाबू सिंह कुशवाहा के साथ-साथ प्रदेश सरकार के रुख से भी जुडा हुआ है. बाबू सिंह कुशवाहा के प्यादे एम. ड़ी. अनुज पोद्दार क्या गुल खिला पाते हैं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा परन्तु पत्रकारिता के आड़ में चल रहा जनसंदेश टाइम्स का यह खेल चौथे स्तम्भ की गरिमा को कितना नीचे गिरा रहा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है.
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