बसपा सुप्रीमो मायावती के सबसे करीबी रहे शशांक शेखर सिंह की राज्यसभा जाने की उम्मीदें लगभग टूट चुकी हैं. पार्टी के भीतर कड़े विरोध के कारण मायावती ने शशांक को प्रत्याशी बनाने की योजना से पीछे हट गई हैं. बसपा सरकार में सबसे ताकतवर नौकरशाह रहे कैबिनेट सचिव शशांक शेखर माया के बेहद करीबी थे. माया उन पर आंख मूंदकर विश्वास करती थीं. विधान सभा चुनाव में बसपा की पराजय के बाद शशांक के मायावती के साथ राज्य सभा जाने की अटकलें लगाई जा रही थीं.
इन अटकलों के बाद से ही बसपा के भीतर माहौल गर्म था. ज्यादातर बसपाई यूपी में पार्टी की करारी हार के लिए शशांक शेखर को ही जिम्मेदार मान रहे थे. माल एवेन्यू स्थित बसपा मुख्यालय में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तथा नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में सोमवार को मायावती ने सबका मन टटोला. पर ज्यादातर लोगों के विरोध को देखते हुए उन्हों ने कहा कि पार्टी किसी नौकरशाह को राज्यसभा प्रत्याशी नहीं बनाएगी. इसके साथ ही शशांक की राज्य सभा पहुंचने की उम्मीदों पर तुषारापात हो गया.
सूत्रों का कहना है कि बैठक में ज्यादातर विधायक और नेता शशांक शेखर सिंह के खिलाफ थे. उनके नाम पर ज्यादतर नेताओं ने आपत्ति जताई, जिसके बाद बसपा सुप्रीमो ने यह फैसला लिया. शशांक का पत्ता कटने के बाद अब इस बात को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि मायावती के साथ राज्यसभा में जाने वाला दूसरा सदस्य मुसलमान समुदाय से हो सकता है. इसके साथ ही पार्टी से जुड़े मुसलमान नेता राज्य सभा पहुंचने के लिए अपनी लांबिंग तेज कर दी है.
उल्लेखनीय है कि यूपी में राज्य सभा के लिए खाली हो रही 10 सीटों पर चुनाव होने वाले हैं और संख्या बल के लिहाज से बसपा दो नेताओं को राज्यसभा भेज सकती है. माया का राज्यसभा जाना तय है, क्योंकि पिछली बार भी बसपा के सत्ता से बाहर होने के बाद मायावती राज्यसभा की सदस्य बन गई थीं. उम्मीद जताई जा रही है कि अब यूपी में पार्टी की जिम्मेदारी नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्य को सौंप दी जाएगी. बसपा सुप्रीमो ने पहले ही विधानसभा में स्वामी प्रसाद मौर्य तथा विधान परिषद में नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी की जिम्मेदारी सौंप चुकी हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि बसपा के दोनों नेता लोकायुक्त जांच के दायरे में हैं.






