साथियों, वरिष्ठ पत्रकार एम. ए. काज़मी की अवैध गिरफ्तारी से साबित हो गया है कि आतंकवाद और नक्सलवाद के नाम पर गिरफ्तारियों का शिकंजा अब बड़ा होता जा रहा है। माओवाद के नाम पर पहले पत्रकार प्रशांत राही, फिर सीमा आजाद पकड़ी गई। हेमचंद्र पांडे को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया गया। इससे पहले इफ्तेखार गिलानी को भी आतंकवाद के नाम पर कई महीने गैर कानूनी हिरासत में रखा गया। अब आतंकवाद के नाम पर वरिष्ठ पत्रकार काजमी की गिरफ्तारी से हमें सबक लेने की जरूरत है।
वरिष्ठ पत्रकार काजमी के बारे में हम सभी जानते हैं। वे मध्यपूर्व मामलों के जानकार हैं और ऐसे में उनके पास से संबंधित जानकारियां मिलना लाजमी है। उनके पास से जो जानकारियां मिली हैं वे किसी ऐसी खुफिया महत्व की नहीं हैं जिनसे किसी देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। काजमी को गिरफ्तार करने के लिए भी पुलिस ने ऐसे ही घिसे-पिटे तर्कों का सहारा लिया है। ऐसे सबूतों के रूप में आमतौर पर पुलिस किसी साहित्य को आधार बनाती है और ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है।
पिछले 4 मार्च को भिलाई से सामाजिक कार्यकर्ता और वकील रेखा परगानिया को पुलिस ने उठा लिया था। दुर्ग के आईजी आर के विज का कहना था कि रेखा के पास से ’नक्सली साहित्य’ बरामद हुआ है। पुलिस की कब्जेदारी वाले साहित्य में बर्टोल्ट ब्रेख्त, भगत सिंह, फ्रेडरिक एंगल्स और कार्ल मार्क्स की रचनाएं शामिल थीं।
ऐसे ही बिनायक सेन की जब छत्तीसगढ़ कोर्ट में सुनवाई चल रही थी तो सरकारी वकील ने ‘दास कैपिटल’ लहराते हुए जज से कहा था कि, जज साहब देखिए ये दुनिया के सबसे ख़तरनाक किताबों में से एक है ! दो साल पहले सीमा आजाद को गिरफ्तार करते वक्त भी पुलिस ने उनके पास से ऐसे ही नक्सली साहित्य को आधार बनाया था। इफ्तेखार गिलानी के पास से भी पुलिस ने ऐसे संवेदनशील दस्तावेज बरामद किया था जो इंटरनेट पर पहले से ही मौजूद था। इसी तरह आतंकवाद के मामलों में होने वाली अधिकांश गिरफ्तारियों में धार्मिक इस्लामिक साहित्य की बरामदगी को आधार बनाया जाता रहा है।
काजमी इंडिया इस्लामिक सेंटर में जनसंपर्क अधिकारी के रूप में काम कर चुके हैं। वे सरकारी संस्था पीआईबी की ओर से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं और पिछले 25 साल से काम कर रहे हैं। सवाल यह है कि सरकारी सुरक्षा एजेंसियों ने उन्हें मान्यता देने से पहले क्या कोई जांच नहीं की थी। यदि की थी तो उस जांच को जनता के सामने लाया जाए और यह बताया जाए कि क्या अब तक भारत की सुरक्षा एजेंसियां गलत जांच कर रही थीं। काजमी संसद सत्र में रिपोर्टिंग करते रहे हैं। प्रधानमंत्री के साथ विदेश दौरों पर भी जाते रहे हैं। उससे पहले सुरक्षा जांच होती है। तब क्यों कहीं कोई कमी नहीं पकड़ी गई।
इस पूरे मामले को देख कर हमें लगता है कि काजमी को महज इसलिए इजराइल के इशारे पर निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे अपने लेखों में ईरान का समर्थन करते रहे हैं और कई बार ईरान की यात्राएँ कर चुके हैं। उनकी रिपोर्टों से अमेरिकी पूंजीवादी नीतियों और ईरान के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिशों को झटका लग रहा है। अमेरिका की ये नीति रही है कि वो जिस भी देश पर हमला करना चाहता है उसके पहले वो उन देशों के खिलाफ मीडिया वार छेड़ता है। जिससे युद्ध के समर्थन में माहौल बनाया जा सके। वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमलों से ये साबित हो चुका है। इसी अमेरिकी एजेंडे को अब केंद्र सरकार अमली जामा पहनाने में लगी हुई है, ताकि ईरान के खिलाफ एक वैश्विक माहौल बनाया जा सके।
हम जानना चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ काण्ड पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आंसुओं का सैलाब बहाने वाले केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह आजकल कहां हैं, क्या उन्हें काज़मी की गिरफ्तारी का अभी तक पता नहीं चला है। काजमी की गिरफ्तारी मीडिया व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधे-सीधे हमला है।
हम मांग करते हैं कि –
*वरिष्ठ पत्रकार काजमी को तत्काल रिहा किया जाए…
*इस मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए…
*आतंकवाद और माओवाद के नाम पर जेलों में बंद पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा आम नागरिकों को रिहा किया जाए…
*आतंकवाद और माओवाद के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बंद किया जाए…
-Journalist's Union for Civil Society (JUCS) की तरफ से जारी प्रेस रिलीज. संपर्क: [email protected]





