Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

प्रिंट-टीवी...

समाप्‍त हो रहा है बिहार-झारखंड में प्रादेशिक चैनलों का प्रभुत्‍व?

क्या समाप्त हो रहा है बिहार-झारखण्ड से प्रादेशिक चैनलों का प्रभुत्व? सरसरी निगाह से देखा जाए तो बिहार-झारखण्ड के मीडिया के बुद्धिजीवी इस सच्चाई से इनकार करते नज़र आयेंगे, किन्तु आंकड़ों (टैम -2012) को ध्यान से देखने पर कुछ ऐसी ही हकीकत पर से पर्दा उठता नज़र आता है. सन-2012 में नौ सप्ताहों के टैम आंकड़े आ चुके हैं. इन नौ सप्ताह के आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो ऐसा मालूम होता है कि प्रादेशिक चैनलों ने राष्ट्रीय चैनलों के सामने सभी स्तरों पर घुटने टेक दिए हैं, वह REACH का मामला हो या फिर TSPV या फिर GRP/ TRP का.

क्या समाप्त हो रहा है बिहार-झारखण्ड से प्रादेशिक चैनलों का प्रभुत्व? सरसरी निगाह से देखा जाए तो बिहार-झारखण्ड के मीडिया के बुद्धिजीवी इस सच्चाई से इनकार करते नज़र आयेंगे, किन्तु आंकड़ों (टैम -2012) को ध्यान से देखने पर कुछ ऐसी ही हकीकत पर से पर्दा उठता नज़र आता है. सन-2012 में नौ सप्ताहों के टैम आंकड़े आ चुके हैं. इन नौ सप्ताह के आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो ऐसा मालूम होता है कि प्रादेशिक चैनलों ने राष्ट्रीय चैनलों के सामने सभी स्तरों पर घुटने टेक दिए हैं, वह REACH का मामला हो या फिर TSPV या फिर GRP/ TRP का.

पहले पांच पायदानों पर एक या उससे भी कम प्रादेशिक चैनलों का कब्जा रहा है. आम दर्शकों के लिए यह जानकारी शर्तिया किसी काम की नहीं होगी लेकिन मीडियावर्ग के लोगों, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े हैं, के लिए यह एक खतरे की घंटी से कम नहीं है. यहाँ बात ईटीवी की हो या फिर सहारा समय, साधना न्यूज़, कशिश न्यूज़, आर्यन न्यूज़ या न्यूज़11 की हो. पहले मीडिया हाउस एडिटोरियली ड्रीवेन हुआ करते थे, लेकिन परिस्थितियां बदली और मीडिया हाउस ऐडवरटीजमेंट ड्रीवेन हो गए. अगर ऐसा नहीं होता तो ई टीवी की कमान एक ब्यूरोक्रेट के हाथों में नहीं होता, सहारा समय के मीडिया प्रमुख हर साल नहीं बदले जाते, साधना न्यूज़ में रिपोर्टरों की गुणवत्ता उनके द्वारा लाये गए विज्ञापन से नहीं होती, आर्यन न्यूज़ से पहले दौर में नियुक्त किये गए लोग नहीं हटाये जाते, न्यूज़11 के प्रबंध निदेशक और पूर्व संपादक प्रमुख विज्ञापन के लिए दर-दर नहीं भटकते और एक चैनल हेड को उसके द्वारा लाये गए विज्ञापन से नहीं आँका जाता.

इसी खतरे की घंटी को बजाकर “365दिन” ने अपने चैनल में ताला लगाया और फिर एक और चैनल में ताला लगने की तैयारी हो रही है, जिसका प्रसारण नोएडा से किया जा रहा है. क्या बिहार-झारखण्ड के प्रादेशिक चैनल बीमार उद्योग की श्रेणी में आ चुके हैं? जरूरत है इसकी असली वज़ह तलाशने की. कहीं सभी प्रादेशिक चैनल अपने असली उद्देश्य से भटक तो नहीं गए है? जस्टिस काटजू का पटना में दिया गया बयान केवल प्रिंट मीडिया के सन्दर्भ में नहीं किया गया था, उस जद में इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी आता है. ऐसे में उनके द्वारा दिया गया बयान आने वाले खतरों से आगाह करता नज़र आता है तथा इस इलाके के एक प्रसिद्ध कहावत भी चरितार्थ करता है,  "बुढवा के मर ला के डर नइखे, जम के परिकला के डर बा".  

लेखक कुंदन कृतज्ञ बिहार-झारखंड में प्रसारित एक प्रादेशिक चैनल में एजीएम के पद पर कायर्रत हैं. 

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...