05 मार्च 2012 को कुंवर फ़तेह बहादुर, प्रमुख सचिव, नियुक्ति द्वारा एक शासनादेश पारित किया गया था, जिसमें उत्तर प्रदेश के सभी अवकाश प्राप्त कैबिनेट सचिव और मुख्य सचिव को यूपी अथवा दिल्ली में रहने पर जीवनपर्यंत एक चपरासी और एक ड्राइवर दिये जाने की व्यवस्था की गयी थी. इस सम्बन्ध में नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वेनर डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में एक जनहित याचिका संख्या 1999/2012 दायर की गयी थी.
उन्होंने याचिका में कहा था कि यह आदेश समानता के आदेश के विपरीत है और ऐसा आदेश पूर्व से ही रीढ़विहीन हो चुकी नौकरशाही को और अधिक कमजोर बना देगा. उन्होंने यह भी कहा कि यह आदेश उस समय जारी किया गया जब प्रदेश में “आदर्श आचार संहिता” लागू था. अतः उन्होंने यह निवेदन किया था कि इस गलत आदेश को रद्द किया जाए. साथ ही यह भी प्रार्थना की थी कि आदर्श आचार संहिता के समय ऐसे विधि विरुद्ध आदेश को पारित करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए.
डॉ. ठाकुर ने कहा कि प्रदेश में कई सारे ऐसे पद हैं जो प्रतिष्ठा और वेतन-भत्तों में मुख्य सचिव के पद के समान हैं. 80000 (नियत) के वेतन पर मुख्य सचिव के अलावा चेयरमैन, बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, चेयरमैन, विजिलेंस कमीशन, डीजी, ट्रेनिंग जैसे कई अन्य आईएएस अधिकारियों के पद हैं. इसके अलावा आईपीएस अधिकारियों में डीजीपी, यूपी और आईएफएस अधिकारियों में प्रमुख वन संरक्षक के पद भी अस्सी हज़ार (नियत) के हैं. कैबिनेट सचिव का पद उत्तर प्रदेश में अलग से परिभाषित तक नहीं है. ऐसे में मुख्य सचिव और कैबिनेट सचिव को अलग से ये सुविधाएँ देना स्पष्टतया विधि के विरुद्ध है. जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस एसवीएस राठौड के समक्ष इस केस की सुनवाई हुई. सुनवाई की अगली तिथि 26 मार्च नियत की गयी है.






