भापजा का दामन थाम कर राजनीति तथा मंत्री पद का स्वाद चखने वाले स्वामी चिन्मयानंद अब यूपी के नए नवेले सीएम अखिलेश यादव के स्वमभू भक्त हो गए हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया है कि स्वामी को अखिलेश का गुणगान करना पड़ रहा है। विधानसभा चुनाव में उमा भारती के नाम की बांसुरी बजाने वाले चिन्मयानंद उत्तर प्रदेश में उनके अलावा कोई योग्य नेता नहीं दिख रहा था, पर अब ऐसा क्या हो गया कि उनके सुर-ताल-लय सब कुछ बदल गए हैं। और अखिलेश इनकी बांसुरी थामने वाले कृष्ण हो गए हैं।
अखिलेश के मुख्यमंत्री बनते ही स्वामी चिन्मयनन्द ने सपा की चापलूसी शुरू कर दी है। चुनाव परिणाम आने से पहले तक स्वामीजी को अखिलेश के गुण नजर नहीं आ रहे थे। परंतु सपा के शासन संभालते ही सब कुछ बदल गया है। स्वामी पर जब यौन उत्पीड़न के आरोप लगे तब इन्होंने कहा था कि भाजपा की छवि खराब करने की कोशिश हो रही है, पर अब स्वामी जी को शायद भाजपा का नाम भी याद नहीं आ रहा है। खुद को रामंदिर आंदोलन का पुरोधा बताने वाले स्वामी चिन्मयानंद शायद यह भी भूल गए हैं कि सपा के शासनकाल में ही कारसेवकों पर गोलियां तथा लाठियां चली थीं।
स्वामी जी ने अपने ब्लॉग पर अखिलेश का इस कदर गुणगान किया है कि उन्हें बुढ़ाते समाजवाद की तरुणाई घोषित कर दिया है। अगर बात सिर्फ अखिलेश को बधाई देने तक सीमित होती तो समझा जा सकता था कि यह राजनीतिक शिष्टाचार हो सकता है, परन्तु अखिलेश को उन्होंने कृष्ण, तेजस्वी युवक और ना जाने क्या क्या बता दिया है। इस दौरान उन्होंने भाजपा का एक बार भी नाम नहीं लिया, जिसके सहारे वे संसद की सीढि़या चढ़े तथा केंद्रीय मंत्री बने। उनके ब्लॉग पर आप भी देखिए माखन में लिपटी कृष्ण गाथा –
उत्तरप्रदेश : प्रकृति के साथ समाज में परिवर्तन
परिवर्तन प्रकृति का धर्म है जो निरंतर चलता रहता है लेकिन उसकी परिपक्वता वसंत में पूरी तरह परिलक्षित होती है जब वृक्षों में नई कोपलें पौधों में नये फूल और आम की अमराई ने मंजरियों की सुगंध सम्पूर्ण वायु मण्डल को एक अलोकिक मादकता से सराबोर कर देती है। सर्दी से शिस्की कोयल की आवाज भी इस मादकता से उन्मत्त हो उठती है और उसकी सुरली आवाज से ये वासंती सुषमा और भी मादक बन जाती है परिवर्तन की इसी प्रवृति को लक्ष्य करके ही विक्रमी आदि सम्बतों की शुरुआत काल गणना के क्रम में हमारे पूर्वाचार्यों ने की थी होली जैसा पर्व उसी का एक हिस्सा है, जहाँ हर कुछ अवांछित को समय की आग में जलाकर नूतन के सृजन का संकल्प उगता है। वह केवल आदमी में ही नहीं बल्कि पशु, पक्षी, पेड़ पौधों सब में दिखाई पड़ता है।
इस वर्ष इस परिवर्तन की यात्रा में केवल प्रकृति ही सक्रिय नहीं रही अपितु समाज की व्यवस्था में भी एक परिवर्तन का नव उन्मेष दिखाई पड़ा भ्रष्टाचार का वह अवांछित मायाजाल जिसे दुरूह समझा जा रहा था वक्त की आग में जल गया और उन जरठ वृक्षों के जिनसे अब कोई उम्मीद नहीं की जा सकती थी नये कोपलों की एक अभिनव शुरुआत हुई। बुढ़ियाते समाजवाद में एक बार पुनः प्रदेश की तरुणाई में नये सिरे से अंगडाई लेने की कोशिश की और प्रदेश की जनता ने तमाम दुनयावी तीन पांच से अलग एक अनुभवहीन ही सही परन्तु तेजश्वी युवक को अपना नेतृत्व सौप दिया, ऐसा लगा कंस और उग्रसेन के दिन बीत गए है और एक कृष्ण उन्हीं के बीज से वक्त की चुनौतियों का सामना करने के लिए आगे आया है।
यह कृष्ण इस भारत में एक महाभारत की संभावना को जन्म भी दे सकता है और यादवी उन्माद में कुल समेत अपना विनाश भी करा सकता है, शर्त केवल इतनी है कि प्रकृति की इस असीम उर्जा का विनियोग किस दिशा में होता है। अगर वह सृजन की ओर होगा तो निश्चित ही एक ऐसे युग का सूत्रपात हो सकता है, जिसमें जीवन की समग्रता प्रकट हो सकती है, लेकिन यदि अधिकार के अहम का उन्माद उसे संक्रमित करता है तो लोकतंत्र का यह वैभव उसी तरह सिमट जायेगा, जैसे कृष्ण के रहते हुए भी यादवों ने अपने विनाश की गाथा स्वयं लिख डाली थी। मैं तो शुभ का साधक और कृष्ण का भक्त रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ कि गीता का सन्देश गोपियों का गीत बनकर ग्वालों के मन में गोवर्धन उठाने का आत्मविश्वास पैदा करेगा।
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