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जस्टिस काटजू ने संपादकों की ली क्लास, मीडिया का मतलब बताया

जो लोग परसों इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कांफ्रेंस हॉल में शैलेश-ब्रजमोहन लिखित किताब 'स्मार्ट रिपोर्टर' के विमोचन समारोह में पहुंचे थे, वे एक ऐसे घटनाक्रम के गवाह बने जो ऐतिहासिक था. जस्टिस काटजू मीडिया के कई संपादकों एनके सिंह साधना, आशुतोष आईबीएन, शशिशेखर हिंदुस्तान, नकवी आजतक, उर्मिलेश राज्यसभा टीवी, राणा यशवंत महुआ आदि इत्यादि और दर्जनों वरिष्ठ कनिष्ठ पत्रकारों रिपोर्टरों को मीडिया का असल मतलब समझाते रहे, घंटे भर से ज्यादा वक्त तक वे बोलते रहे.

जो लोग परसों इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कांफ्रेंस हॉल में शैलेश-ब्रजमोहन लिखित किताब 'स्मार्ट रिपोर्टर' के विमोचन समारोह में पहुंचे थे, वे एक ऐसे घटनाक्रम के गवाह बने जो ऐतिहासिक था. जस्टिस काटजू मीडिया के कई संपादकों एनके सिंह साधना, आशुतोष आईबीएन, शशिशेखर हिंदुस्तान, नकवी आजतक, उर्मिलेश राज्यसभा टीवी, राणा यशवंत महुआ आदि इत्यादि और दर्जनों वरिष्ठ कनिष्ठ पत्रकारों रिपोर्टरों को मीडिया का असल मतलब समझाते रहे, घंटे भर से ज्यादा वक्त तक वे बोलते रहे.

काटजू ने कहा- बेरोजगारी, भुखमरी, सांप्रदायिकता, सामंतवाद, वैचारिक दरिद्रता, जड़ता के इस दौर में जब मीडिया को देश के अस्सी फीसदी लोगों को दिशा देने की जरूरत है तो ये लोग टीआरपी और प्रसार के चक्कर में देवानंद, सचिन तेंदुलकर, फार्मूला वन रेस, ज्योतिष, चांद सितारे, भूत प्रेत आदि को जोरशोर से दिखाने में लगे रहते हैं, यह बिलकुल गलत है. अपना देश न तो पूरी तरह औद्योगिक हो पाया है और न ही पूरी तरह सामंतवाद से मुक्त हो पाया है. जाति और धर्म जैसी बातों से लोग अब भी संचालित हो रहे हैं. बहुत बड़े बदलाव, ट्रांजीशन के फेज से गुजर रहा है यह देश. आगे तकलीफ, दिक्कत बढ़ने वाली है. सामंतवादी व्यवस्था में जाति को मान्यता है, प्रेम विवाह का विरोध है, पर औद्योगिक समाज में जाति को बुरा माना जाता है और प्रेम विवाह मान्य है. तो ये दो व्यवस्थाएं एक साथ देश में है. इनमें आपस में संघर्ष है. ऐसे ही हालात जब यूरोप में आए थे तो वहां बहुत उपद्रव हुआ. काफी लोग मारे गए. मीडिया का रोल इसी कारण महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वह जनता की चेतना को जाग्रृत कर लोगों को बदलाव का हाथ थामने के लिए प्रेरित कर सकता है. पर मीडिया अपना यह रोल नहीं निभा रहा. वह जनता की नकारात्मक सोच व भावनाओं को भड़काते हुए वह चीजें प्रमुखता से परोसता है जिससे अवैज्ञानिक सोच को ही बढ़ावा मिलता है.

जस्टिस काटजू ने कहा कि वह अब भी देखते हैं कि दो तीन चैनलों पर ज्योतिष व चांद सितारे आदि दिखाए जाते हैं. यह सब बिलकुल बकवास चीजें हैं. इन्हें हर हाल में बंद कर दिया जाना चाहिए. इस पर बात भी हुई लेकिन अब भी कई चैनल यह सब दिखा रहे हैं. जस्टिस काटजू ने कहा कि वे मीडिया की आजादी के पक्षधर हैं और इसके लिए जी जान लगाकर लड़ते हैं पर वे मीडिया में आंतरिक सुधार भी चाहते हैं ताकि मीडिया अपनी भूमिका को सार्थक तरीके से निभा सके. जस्टिस काटजू खूब बोले और देर तक बोलते रहे. मीडिया के लोगों को आइना दिखात रहे. संपादक लोग कसमसाते रहे. एक दूसरे को देखकर काटजू के लेक्चर पर मन ही मन मुस्कराते, खीझते रहे. आखिरकार एनके सिंह ने बीच में जस्टिस काटजू को टोक दिया. तब लोगों ने आपत्ति की कि काटजू साहब को वक्तव्य पूरा कर लेने दीजिए, उसके बाद एनके सिंह या कोई और बोले.

काटजू के बोलने के दौरान ही आशुतोष भी बोल पड़े. उन्होंने जस्टिस काटजू द्वारा कही गई कुछ चीजों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई. ज्यादातर लोग काटजू के साथ थे. फोटो खींच रहे एक साथी जोर से बोल पड़े- जस्टिस काटजू, इन संपादक लोगों की कच्ची नौकरी है, ये लोग नहीं सुधरेंगे, ऐसे ही विरोध करते रहेंगे क्योंकि इनकी नौकरी कच्ची है, बेचारे सच बोल नहीं सकते क्योंकि नौकरी चली जाएगी. लोग इस वक्तव्य पर हंस पड़े, तालियां बजाने लगे. देखते ही देखते माहौल गर्म हो गया. प्रबल प्रताप सिंह ने काटजू को घेरने के लिए न्यायपालिका में न्याय मिलने पर देरी से संबंधित सवाल उठाया. तब काटजू बोले कि ये अलग मुद्दा है, इस पर कभी अलग से बैठेंगे और बात करेंगे, फिलहाल मीडिया पर बात हो रही है और मीडिया पर ही बात करें. भड़ास के यशवंत सिंह ने टीवी संपादकों द्वारा खुद लाखों रुपये लेने और स्ट्रिंगरों को वेतन न दिए जाने का मुद्दा उठाया. जस्टिस काटजू ने इस मसले को गंभीर बताया और पहल करने की बात कही.

इस आयोजन की खास बात ये थी कि प्रोग्राम शुरू होने के घंटे भर पहले ही दारू का दौर शुरू हो गया था. चाय नाश्ते के साथ दारू आदि भी इंतजाम था. ज्यादातर लोगों ने कार्यक्रम शुरू होने के पहले दो तीन पैग लगा लिया था. शाम आठ बजे कार्यक्रम शुरू हुआ और दस बजे के लगभग खत्म हुआ तो फिर दारू व खाने का दौर शुरू हो गया. पूरा आयोजन इतना विचारोत्तोजक, रोमांचक, बहस से भरा था कि जो भी वहां पहुंचा था वह काफी कुछ सीख सुनकर वापस लौटा. ज्यादातर लोगों का यही कहना था कि जस्टिस काटजू ने वे बातें मीडिया के संपादकों को बताई समझाई जिसे ज्यादातर संपादक पत्रकार लोग भूल चुके हैं. अगर मीडिया सच में अपने असली रोल को निभाने लगे तो देश से बहुत सारी दिक्कतों के खत्म होने में देर न लगेगी.

यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क- [email protected]

 

 
 

 
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