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रायपुर से सांध्य दैनिक ‘जनदखल’ का प्रकाशन शुरू

: पहले ही अंक में छत्तीसगढ़ सरकार पर प्रहार : रायपुर। बिना किसी ताम झाम के आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सांध्य दैनिक जनदखल ने अपनी पारी शुरू की। आरकेएस इम्प्रैसिव मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले पहली बार दस्तक देते ही 'जनदखल' ने अपने नाम के मुताबिक जनता के दिलों को झकझोरने की कोशिश की। जिस राज्य में सारा मीडिया सत्ता के गुणगान करने में मस्त है वहां जनदखल ने पहले दिन दो खबरों को पेज एक पर तरजीह दी। लीड खबर रही- ''नेकी या बदी: रमन ने बेची महानदी''।

: पहले ही अंक में छत्तीसगढ़ सरकार पर प्रहार : रायपुर। बिना किसी ताम झाम के आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सांध्य दैनिक जनदखल ने अपनी पारी शुरू की। आरकेएस इम्प्रैसिव मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले पहली बार दस्तक देते ही 'जनदखल' ने अपने नाम के मुताबिक जनता के दिलों को झकझोरने की कोशिश की। जिस राज्य में सारा मीडिया सत्ता के गुणगान करने में मस्त है वहां जनदखल ने पहले दिन दो खबरों को पेज एक पर तरजीह दी। लीड खबर रही- ''नेकी या बदी: रमन ने बेची महानदी''।

छत्तीसगढ़ वो राज्य है जहां रमन सरकार ने इस राज्य के लिए प्राणदायिनी कही जाने वाली महानदी को कारोबारियों को बेच दिया है। 80 फीसदी पानी उनका और बाकी जनता का। वो भी कारोबारियों की मर्जी से। दूसरी खबर थी शराबियों की फौज और सस्ती दारू की मौज। कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां शराब माफियाओं ने अपनी फौज बनाई हो पर यहां ऐसा हो रहा है। इस फौज में कई लाख शराबी शामिल हो चुके हैं। जिन्हें कार्ड पर सस्ती दारू मिलती है साथ ही अगले चुनाव में भी इनके सहारे राजनीति में उतरने का इरादा है। इस फौज को बनाने के पीछे भी सत्ता का ही हाथ माना जा रहा है।
इसके अलावा जनदखल में हर पेज पर जनसरोकार की ही पत्रकारिता को जगह दी गई। पहले ही दिन सांध्य दैनिकों में सर्वाधिक प्रसार संख्या के साथ उतरने के बावजूद कापियों की कमी पड़ गई।

पाठकों ने अखबार को हाथों हाथ लिया। जनदखल हाल के बरसों में पहला अखबार है जिसकी लांचिंग किसी राजनेता के हाथों से नहीं हुई। इसके अलावा लांचिंग जैसे ताम झाम और परंपरागत ढर्रे पर भी अखबार नहीं चला। सीधे पाठकों के बीच। ऐसा नहीं है कि इस शहर और इस राज्य में अखबारों की कमी है पर एक बेहतर विकल्प की गुंजाइश को देखते हुए ही अखबार को शुरू किया गया है। ऐसा विकल्प जो सोचने को मजबूत करे। जो जन-जन से जुड़कर जनता का अखबार कहलाए। जब संत्री से मंत्री तक के कारण जनता आहत हो तो तब सिर्फ हक की बात तब ही हो सकती है जब जनता खुद दखल दे। इससे पहले आज जनदखल की टीम ने शानदार प्रदर्शन किया।

प्रवेशांक के अवसर पर संपादक देशपाल सिंह पंवार, प्रबंध संपादक रीतेश साहू लगातार साथियों का उत्साह बढ़ाते रहे। खेल संपादक कमलेश गोगिया, सह संपादक संजय खरे, फीचर संपादक मिस जुलेखा जबीं, फोटो एडिटर प्रदीप ढढ़सेना, चीफ रिपोर्टर संजय पांडेय समेत जनदखल का सारा परिवार मौजूद रहा।  जनदखल के पहले अंक में प्रकाशित विशेष संपादकीय इस प्रकार है-

छत्तीसगढ़ की जनता को 'जनदखल' का सलाम

हम पहले दिन विशेष संपादकीय में शब्दों की ऐसी कोई लफ्फाजी नहीं करने जा रहे हैं जो अमूमन कथित बड़े संपादक करते हैं। उन जितना ना तो हमें ज्ञान है और ना ही इतनी अक्ल की हम उनकी नकल कर सकें। अगर हम ऐसे हैं ही नहीं तो फिर उस राह पर जाने का क्या मतलब? हम सबसे छोटे हैं और जनता के लिए सबसे छोटे ही रहेंगे। छोटे होने के नाते सबसे अच्छी बातें सीखने की कोशिश भी करेंगे। पर इससे ज्यादा कोशिश हमेशा इस बात की होगी कि जनसरोकार की जो पत्रकारिता आजकल गुमशुदा की तलाश सरीखा एहसास हर तबके को कराती है उसे जनता फिर अपने आसपास महसूस करे। कहने को सब लोकतंत्र पर गर्व करते हैं, हम भी करते हैं पर आखिर क्या सही लोकतंत्र यही है कि तंत्र में लोक को ही हाशिए पर अछूत की तरह धकेल दिया जाए? इस तंत्र का कोई भी पाया ले लीजिए सब जगह लोक के चेहरे पर शोक की ही सत्ता काबिज नजर क्यों आती है? बाकी को छोड़ दीजिए लाख टके का सवाल यही है कि क्या चौथा खंभा अपनी जगह पर है? अपना दायित्व सौ फीसदी ईमानदारी के साथ निभा रहा है?  ना तो ये दौर मुंशी प्रेमचंद का है और ना ही इस बात की किसी को उम्मीद है कि उस दौर की पत्रकारिता फिर कभी होगी। पर इन सवालों के उठने को कौन रोक सकता है कि पत्रकारिता की बीम किस थीम किस टिकी थी? सच और सिर्फ सच पर -पहली निष्ठा जनता के प्रति, पुख्ता जांच-पड़ताल के बाद ही खबर बनाना, किसी की आजादी में खलल ना डालना, सत्ता की निष्पक्षता से समीक्षा और आलोचना करना, जनता को सही प्लेटफार्म उपलब्ध कराना, निजी हित को दरकिनार रख सही सूचनाएं सामने लाना, जनता और सरकार के बीच सही पुल का काम करना और भी ना जानें किस-किस तरह की थ्योरी से पत्रकारिता के ग्रंथ अटे पड़े हैं। पर सच बताइए कहां नजर आती हैं ये सारी बातें? कहां है असली  जनसरोकार की पत्रकारिता? ये चौथा पिलर बाकी तीन पिलर पर तो लगातार तीर दागता रहता है पर खुद पर चुप्पी साध लेता है। ऐसा क्यों? क्या माना जाए -बातों व लेखनी  की कमाई खाने वाले सारे वीर आज मीर हो गए हैं या अंदरखाने की घुटन से अधीर हैं? किससे छिपा है कि मीडिया को बाजार चला रहा है। बाजार को मीडिया चमका रहा है। मीडिया को विदेशी पैसा बहका रहा है। आखिर इस देश के सारे बड़े मीडिया हाउसों में पैसा लगाने वाली विदेशी ताकतों के इसमें फायदे क्या हैं? ये सोचने-जानने-बोलने और लिखने की जहमत कौन उठाए? देशी मीडिया अगर विदेशी ताकतें चलाएंगी तो फिर उसमें गरीब जनता के लिए जगह ही कहीं बचती है? धंधों के लिए मीडिया और मीडिया के बाद धंधों की चाह ने जनसरोकार की पत्रकारिता की राह को संकरा कर दिया है। इसी कमजोरी का फायदा उठाने का खून राजनीतिक सिस्टम के मुंह लग चुका है।

प्राचीन इतिहास इस बात का गवाह है कि इस धरा पर हमेशा ही कल्चर विकसित हुई है। नई और बेमिसाल परिपाटियां दूसरों ने यहां से सीखी हैं। सीखने और मुद्दों पर आधारित पत्रकारिता के उद्देश्य से ही हम आज से आपके बीच आ रहे हैं। विश्वास है कि आप सबका साथ, प्यार,तकरार और मार्ग दर्शन हमें हमेशा मिलता रहेगा। आपके साथ के बिना ये कारवां अधूरा है। जनदखल की ओर से आप सबका शुक्रिया।

रीतेश कुमार साहू

देशपाल सिंह पंवार

 

 
 

 
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