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सियासत में उलझकर रह गई अदम गोंडवी को पद्म विभूषण देने की संस्‍तुति

गोण्डा। हिन्दुस्तान के कोने-कोने में समाज के दबे, कुचले एवं कमजोर वर्ग की आवाज को ताजिंदगी बुलंद करते रहने वाले जनकवि राम नाथ सिंह ‘अदम गोण्डवी’ को पद्म विभूषण दिए जाने की तत्कालीन जिलाधिकारी राम बहादुर की सिफारिश सियासत में उलझकर रह गई है। बसपा शासनकाल में यह पत्रावली आगे इसलिए नहीं बढ़ सकी क्योंकि तत्कालीन सरकार ने उन्हें सपाई माना। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद अदम गोण्डवी को मरणोपरान्त पद्म विभूषण मिलने की उम्मीद बलवती हुई है।

गोण्डा। हिन्दुस्तान के कोने-कोने में समाज के दबे, कुचले एवं कमजोर वर्ग की आवाज को ताजिंदगी बुलंद करते रहने वाले जनकवि राम नाथ सिंह ‘अदम गोण्डवी’ को पद्म विभूषण दिए जाने की तत्कालीन जिलाधिकारी राम बहादुर की सिफारिश सियासत में उलझकर रह गई है। बसपा शासनकाल में यह पत्रावली आगे इसलिए नहीं बढ़ सकी क्योंकि तत्कालीन सरकार ने उन्हें सपाई माना। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद अदम गोण्डवी को मरणोपरान्त पद्म विभूषण मिलने की उम्मीद बलवती हुई है।

गांव, गरीब और समाजवाद की बात करने वाले अदम गोण्डवी को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दुष्यन्त पुरस्कार से सम्मानित किया गया, किन्तु उत्तर प्रदेश में सरकारी स्तर पर कभी उनकी कोई खोज खबर नहीं ली गई। उनकी आर्थिक स्थिति काफी दयनीय हो चुकी थी। उनके परिवार पर करीब साढ़े तीन लाख का

कर्ज था और उनका खेत भी गिरवी रखा हुआ था। अगस्त 2011 में उनके गंभीर रूप से बीमार होने पर उन्हें एक स्थानीय नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया। उनके बीमारी की खबर जब मीडिया में आई तो तत्कालीन जिलाधिकारी राम बहादुर न केवल उन्हें देखने गए, अपितु उनके इलाज पर आने पर पूरा खर्च स्वयं वहन करने की घोषणा की। गोण्डा में उन्होंने उनका विधिवत इलाज करवाया किन्तु जब स्थिति बिगड़ने लगी तो उन्हें पीजीआई भेज दिया गया। उन्हें लखनऊ ले जाने पर पीजीआई प्रशासन द्वारा भर्ती नहीं किया जा रहा था। बाद में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के हस्तक्षेप पर उन्हें भर्ती किया गया और इलाज शुरू हुआ। जिलाधिकारी ने मनकापुर के उपजिलाधिकारी सुरेश चन्द्र तिवारी को पीजीआई भेजकर उनके परिजनों को पैसा भेजवाया। इलाज हुआ किन्तु उन्हें बचाया न जा सका। दिसम्बर 2011 में उनका निधन हो गया।

इस बीच जिलाधिकारी राम बहादुर ने न केवल उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किए जाने की संस्तुति प्रदेश सरकार को भेजी अपितु अदम जी के गांव आटा को गोद लेकर वहां करीब 65 लाख रुपए की विकास योजनाओं की शुरुआत करा दी। इसमें से कुछ कार्य जिला पंचायत तथा कुछ क्षेत्र पंचायत से कराए जाने थे। जिला पंचायत द्वारा किया जाने वाला काम तो पूरा हो गया किन्तु डीएम के तबादले के बाद स्थानीय राजनीति के चलते क्षेत्र पंचायत द्वारा स्वीकृत करीब 34 लाख रुपए का विकास कार्य रोक दिया गया। बताया जाता है कि अदम जी ने अपनी एक बहुचर्चित रचना में जिस परिवार के विरुद्ध लेखनी चलाई थी, वर्तमान में उसी परिवार के संरक्षण में रहने वाला व्‍यक्ति ब्लाक प्रमुख है। इसलिए अदम जी के गांव के विकास के लिए शुरू की गई योजनाओं ने पूरा होने से पहले ही दम तोड़ दिया।

दूसरी तरफ उनकी बीमारी के दौरान ही तत्कालीन जिलाधिकारी राम बहादुर ने उन्हें पद्म विभूषण दिए जाने की संस्तुति प्रदेश सरकार से की थी। इसी बीच उनका निधन हो गया। जिलाधिकारी उनके गांव पहुंचकर न केवल शव यात्रा में शामिल हुए, अपितु पूर्व मंत्री व वरिष्ठ सपा नेता योगेश प्रताप सिंह के साथ कंधा भी दिया। इन सब घटनाओं से शासन में राष्ट्रीय स्तर के एक जनकवि को सपा समर्थक माना गया और जिलाधिकारी की संस्तुति को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। बताया जाता है कि भारत सरकार को भेजी जाने वाली डीएम की वह संस्तुति फिलहाल उत्तर प्रदेश शासन के गोपन विभाग में धूल फांक रही है। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद अब यह उम्मीद जगी है कि अदम जी को पद्म विभूषण दिए जाने से सम्बंधित संस्तुति भारत सरकार को भेजी जा सकेगी।

लेखक जानकी शरण द्विवेदी गोण्‍डा में पत्रकार हैं.

 

 
 

 
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