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बनारस में लखनऊ का आरएनआई नम्‍बर प्रकाशित कर रहा है जनसंदेश टाइम्‍स

क्या यह संभव है कि बनारस से प्रकाशित किसी अख़बार की प्रिंट लाइन में आरएनआई नंबर व डाक पंजीयन नंबर लखनऊ का डाला जाये और वह भी भूलवश किसी एक दिन नहीं बल्कि अपने प्रकाशन के पहले दिन से ही। जी हाँ, जनसंदेश टाइम्स बनारस की प्रिंट लाइन में लगभग डेढ़ महीने पहले से लगातार लखनऊ का आरएनआई नंबर यूपीएचआईएन/ 2010/32745 व डाक पंजीयन नंबर जीपीओएलडब्ल्यू/एनपी -78/2011-13 प्रकाशित किया जा रहा है।

क्या यह संभव है कि बनारस से प्रकाशित किसी अख़बार की प्रिंट लाइन में आरएनआई नंबर व डाक पंजीयन नंबर लखनऊ का डाला जाये और वह भी भूलवश किसी एक दिन नहीं बल्कि अपने प्रकाशन के पहले दिन से ही। जी हाँ, जनसंदेश टाइम्स बनारस की प्रिंट लाइन में लगभग डेढ़ महीने पहले से लगातार लखनऊ का आरएनआई नंबर यूपीएचआईएन/ 2010/32745 व डाक पंजीयन नंबर जीपीओएलडब्ल्यू/एनपी -78/2011-13 प्रकाशित किया जा रहा है।

जनसंदेश टाइम्स का प्रकाशन लखनऊ के अलावा कानपुर, गोरखपुर व बनारस से भी होता है तथा अभी तक केवल लखनऊ को आरएनआई नंबर मिल सका है। कानपुर, गोरखपुर व बनारस को अभी तक आरएनआई नंबर नहीं मिला है। इस अख़बार का यह हाल तब है जब इसी प्रिंट लाइन में प्रधान संपादक ज्ञानेंद्र शर्मा (पूर्व सूचना आयुक्त उ.प्र.) व स्थानीय संपादक में वरिष्ठ पत्रकार आशीष बागची का नाम प्रकाशित होता है। पता नहीं आज तक इन वरिष्ठों का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया?

इस सम्बन्ध में जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार से बात की तो उनका जवाब तो और भी मजेदार था। उनका कहना था कि ये तो कुछ नहीं है कभी-कभी तो एक संस्करण क़ी प्रिंट लाइन दूसरे संस्करण में प्रकाशित हो जाती है। विगत 23 मार्च को गोरखपुर में कानपुर क़ी प्रिंट लाइन प्रकाशित हुई थी। शुरुआती दौर में गोरखपुर संस्करण में भी लखनऊ का आरएनआई नंबर जाता था, जिसे बाद में सुधारा गया था और तो और 1 मार्च को कानपुर संस्करण में प्रकाशित होने वाला फार्म 4ए लखनऊ संस्करण का ही प्रकाशित हो गया था। 

इस ओर जब प्रबंधकों का ध्यान दिलाया गया तो गलती सुधारने क़ी बजाय उस तारीख के अख़बार को ही अपनी वेबसाइट से हटा दिया। बताया जाता है कि आजकल प्रबंधन का ध्यान एनआरएचएम घोटाले में फंसे पूर्व एमडी सौरभ जैन (जेल में बंद) व वर्तमान एमडी अनुज पोद्दार से सीबीआई द्वारा की जा रही पूछताछ पर लगा हुआ है, इसलिए इन गलतियों की ओर किसी का भी ध्यान नहीं है। पता नहीं किन कारणों से बीच अखबार के पन्‍ने भी कम कर दिए गए थे।  

राजेंद्र गुप्‍ता  

कानपुर 

 

 
 

 
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