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इंडिया न्‍यूज के बेचारे

हर तरफ अंधी सियासत है/ बताओं क्या करें/ रेहन में पूरी रियासत है/ बताओ क्या करें/ झुंड पागल हाथियों का/ रौंदता है शहर को/ और अंकुश में महावत है/ बताओ क्या करें। इन पक्तियों जैसे ही रवीन ठुकराल दुबारा जब से इंडिया न्यूज के हेड बन कर आये तो उनके चम्‍मचों और चम्‍मचियों के चेहरे पर चमक लौट आई और आये भी क्यों न, आखिर में ठुकराल और ज्यादा ताकतवर बन कर लौटे और वो उनके अंकुश में पहले से ही हैं।

हर तरफ अंधी सियासत है/ बताओं क्या करें/ रेहन में पूरी रियासत है/ बताओ क्या करें/ झुंड पागल हाथियों का/ रौंदता है शहर को/ और अंकुश में महावत है/ बताओ क्या करें। इन पक्तियों जैसे ही रवीन ठुकराल दुबारा जब से इंडिया न्यूज के हेड बन कर आये तो उनके चम्‍मचों और चम्‍मचियों के चेहरे पर चमक लौट आई और आये भी क्यों न, आखिर में ठुकराल और ज्यादा ताकतवर बन कर लौटे और वो उनके अंकुश में पहले से ही हैं।

ठुकराल ने आते ही आज समाज से राहुल देव और उनकी टीम को रुखसत किया। पहले ठुकराल गये तो थे कैप्टन को पंजाब का मुख्यमंत्री बनवाने, लेकिन पंजाब की हकीकत को देखते हुए पहले ही उधर से खिसक लिये। और एक बार फिर से विनोद शर्मा का दामन थामकर इंडिया न्यूज की कमान संभाल ली। ठुकराल के कमान संभालने की देर थी कि फिर से रीजनल चैनल नम्बर एक होने लगे, और पार्टियों का दौर शुरु। ये नम्बर वन कैसे होते हैं, पूरे मीडिया जगत को इसकी खबर है। परन्‍तु बेचारे रिपोर्टर, कैमरामैन, ओबी स्टाफ, को तो इन पार्टियों की भनक भी नहीं दी जाती। क्योंकि प्रबंधन की नजर में रीजलन चैनल को नम्बर 1 बनाने में ठुकराल के मानस पुत्र रोहित कुमार, रामकुमार, इसरार शेख, धर्मेन्द्र कुमार, चोटी मेहरा का ही हाथ होता है और किसी का नहीं। इसीलिये गिनती के इन लोगों की सेलरी साल में 2-2 बार बढ़ाई जाती है और फील्ड में काम करने वाले 80 प्रतिशत स्टाफ की सेलरी 4 साल से बढ़ाई ही नहीं जाती।

दुनिया जहान की संवेदनाओं की बात करने वाले ठुकराल और उनकी टीम ने कभी फील्ड में काम करने वाले स्टाफ से उनकी संवेदनाओं और उनकी समस्याओं के बारे में जानने का, उनको हल करने के लिये कोई पहल की? क्या एक ग्रुप के हेड के तौर पर उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या केवल कुछ लोगों की ही मेहनत होती है, जो केबिन में आकर मिजाजपुर्सी करते हैं, जिससे चैनल की टीआरपी बढ़ जाती है? क्या बिना किसी रिपोर्टर के, कैमरामैन, ओबी स्टाफ या फिर ड्राइवर की मेहनत के बगैर खबर न्यूज रूम में डम्प हो जाती है? क्या ठुकराल या उनके चाहने वाले कभी इंडिया न्यूज की पहचान बन गई साक्षात मौत रूपी मर्सीडीज में बैठे हैं?

और ऊपर से मजे की बात ये है कि केवल 100 रुपये उन मर्सीडीज की गैस के लिये दिये जाते हैं और कहा जाता है कि पूरे दिन इससे ही काम चलाओ। लेकिन एसी केबिन में बैठकर सबकी मां-बहन एक करने वाले इस दर्द को क्या जानें। उनको तो बस हर बेफिक्री को धुएं में उड़ाना आता है। आज जितने भी बड़े चैनल हैं, वो अपने फील्ड में काम करने वाले स्टाफ का सम्मान करते हैं। ऐसा नहीं है कि आउटपुट या दूसरे लोग काम नहीं करते लेकिन एक चैनल की पहचान उसके रिपोर्टर से ही होती है और इस बात को किसी भी प्रतिष्ठित चैनल की कार्यशैली से समझा जा सकता है। पता नहीं ये छोटी सी बात चैनल प्रबंधन को कब समझ में आयेगी।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 
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