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छोटे शहरों के पत्रकारों के लिए कोई एवार्ड नहीं

दिल्ली में आईटी अवार्ड समारोह हुआ. देख कर अच्छा लगा पर कई सवाल भी मन को कचोटने लगे. क्या छोटे शहरों के पत्रकारों के लिए कोई अवार्ड नहीं है, क्या स्ट्रिंगर, रीटेनेर या स्टाफ रिपोर्टर जो कि राज्यों, जिलो में, कस्बों में, रात दिन मेहनत करके मीडिया में धमाके करते हैं उनका कोई सम्मान नहीं है? इलेक्ट्रानिक मीडिया में कस्बों से बहुत सी ऐसी खबरें ब्रेक होती हैं उन पर बड़ी स्टोरीज बनती हैं. उनके नाम को, उनकी स्टोरी को, क्यूँ नहीं इंडियन टीवी अवार्ड, रामनाथ गोयनका, गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान के लिए भेजा जाता?

दिल्ली में आईटी अवार्ड समारोह हुआ. देख कर अच्छा लगा पर कई सवाल भी मन को कचोटने लगे. क्या छोटे शहरों के पत्रकारों के लिए कोई अवार्ड नहीं है, क्या स्ट्रिंगर, रीटेनेर या स्टाफ रिपोर्टर जो कि राज्यों, जिलो में, कस्बों में, रात दिन मेहनत करके मीडिया में धमाके करते हैं उनका कोई सम्मान नहीं है? इलेक्ट्रानिक मीडिया में कस्बों से बहुत सी ऐसी खबरें ब्रेक होती हैं उन पर बड़ी स्टोरीज बनती हैं. उनके नाम को, उनकी स्टोरी को, क्यूँ नहीं इंडियन टीवी अवार्ड, रामनाथ गोयनका, गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान के लिए भेजा जाता?

क्या दिल्ली में बैठ करके ही सम्मान पाया जा सकता है? क्या पदम् श्री, पदम् भूषण पाने का हक केवल दिल्‍ली के बड़े पत्रकारों को ही है? क्या दिल्ली मीडिया को घर बैठे ये मालूम चल जाता है कि देश के कोने-कोने में क्या खबर है? वो स्थानीय सूत्र का सहारा लिए बगैर खबर बना सकते हैं? क्या दिल्ली मीडिया अपने सूत्र को, पैसे के अलावा कोई और सम्मान दिलाता है? क्या वो प्रिंट मीडिया में अपने नाम के साथ अपने सहयोगी सूत्र का नाम प्रिंट लाइन में देता है या टीवी मीडिया में सहयोगी के नाम का उल्लेख किया जाता है? क्या दिल्ली डेस्क में बैठे संपादक महोदय लोग इस विषय की गंभीरता को समझते हैं?

हाल में कई कस्बाई पत्रकारों की इस तरह की पीड़ा सामने आई है. इलाहाबाद के एक पत्रकार ने खबर पर मेहनत की, खबर ब्रेक की, शाट्स भेजे, शाम को देखा अंग्रेजी चैनल की एक रिपोर्टर उस पर पीटूसी कर रही थी. जबलपुर के एक पत्रकार ने खबर ब्रेक की. वो शाट्स किसी और चैनल के रिपोर्टर ने ऍफ़टीपी से चुरा लिए और दिल्ली में पीटूसी कर दी. यूपी के एक पत्रकार ने तो स्टोरी आइडिया ही ऑफिस भेजना बंद कर दिया. क्यूँ कि दिल्ली से रिपोर्टर उसे उड़ा लेते हैं. थोड़ा वक्त बीत जाने के बाद वो उसे अपना प्रोजेक्ट बना लेते हैं.

ऐसे कई मिसालें हैं जो कि छोटे शहरों के मीडिया कर्मियों की पीड़ा बया करती है. हकीकत तो तब सामने आती है, जब दिल्ली रिपोर्टर्स के पास शाट्स नहीं होते और वो फिर लोकल रिपोर्टर की खुशामद करते हैं. बाद में काम निकल जाने के बाद उन्हें भूल

जाते हैं. यानी उन्हें उनका सम्मान भी नहीं देते. क्या ये विषय बहस का मुद्दा हो सकता है? ये विषय भड़ास का भी हो सकता है. बरहाल उन मीडिया कर्मियों को बधाई जिन्होंने आईटी अवार्ड जीते.. अपना नाम और चैनल का नाम रोशन किया.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

 

 
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