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श्रवण गर्ग का जाना दैनिक भास्कर को महंगा पड़ेगा

दैनिक भास्कर के लिए ब्रांड अंबेसडर बन चुके थे श्रवण गर्ग. न्यूज चैनलों पर, सेमिनारों में, छात्रों के बीच श्रवण गर्ग जब होते हैं तो वे दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर के रूप में जाने जाते हैं. और, इस पहचान के कारण दैनिक भास्कर की अरबों-खरबों की ब्रांडिंग फ्री में होती थी. वे दैनिक भास्कर के समूह संपादक बने रहते या संपादकीय निदेशक बना दिए जाते और केवल यही काम करते (चैनलों, सभाओं, सेमिनारों आदि में शिरकत करना) तो दैनिक भास्कर के लिए काफी फायदेमंद रहता.

दैनिक भास्कर के लिए ब्रांड अंबेसडर बन चुके थे श्रवण गर्ग. न्यूज चैनलों पर, सेमिनारों में, छात्रों के बीच श्रवण गर्ग जब होते हैं तो वे दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर के रूप में जाने जाते हैं. और, इस पहचान के कारण दैनिक भास्कर की अरबों-खरबों की ब्रांडिंग फ्री में होती थी. वे दैनिक भास्कर के समूह संपादक बने रहते या संपादकीय निदेशक बना दिए जाते और केवल यही काम करते (चैनलों, सभाओं, सेमिनारों आदि में शिरकत करना) तो दैनिक भास्कर के लिए काफी फायदेमंद रहता.

पर अपने हिंदी पट्टी के मीडिया हाउसों के मालिकों की मेंटलटी बनियागिरी से उपर नहीं उठ सकी है, भले वे कारपोरेट होने की बात करने लगे हों. इसी कारण वे एक एक आदमी के दाम काम की गिनती करते रहते हैं. कई बार कोई आदमी आपको सीधे सीधे कंप्यूटर पर बैठकर भले काम करता न दिखे लेकिन वह आपके लिए कई वजहों से काफी फायदेमंद होता है. वह आपका चेहरा बन चुका होता है, वह आपके कंटेंट को रिप्रजेंट करता है, वह आपके ब्रांड का प्रतिनिधित्व करने लगता है. ऐसे लोग खोजे नहीं मिलते. पर हिंदी पट्टी के मीडिया हाउस यह सब नहीं देखते. उन्हें तो बस ज्यादा से ज्यादा मुनाफा के चक्कर में पड़ना है और मुनाफा दिलाओ अभियान में जो डायरेक्ट सहभागी बनता हुआ दिखता है, उसे ही प्रमोट करना है और उसे ही लाना है. बाकी लोग चाहे जितने काम के हों, अगर वे मुनाफा न दिला रहे हों तो उन्हें कमतर करते हुए एक दिन जाने के लिए मजबूर कर देना है.

श्रवण गर्ग ने खुद इस्तीफा दिया या मालिकों के कहने पर दिया या मालिकों से उनकी सहमति बनी व दोनों पक्षों की सहमति से ये हुआ, यह तो नहीं पता लेकिन इतना पता है कि दैनिक भास्कर के मालिकों ने श्रवण गर्ग के इस्तीफा देने को स्वीकार कर लिया है तो यह उनके लिए महंगा सौदा है. ये सच है कि श्रवण गर्ग आज जहां हैं, वहां पहुंचाने में भास्कर समूह की बड़ी भूमिका है. लेकिन यह भी सच है कि दैनिक भास्कर आज जहां है, वहां तक उसे पहुंचाने में श्रवण गर्ग की काफी बड़ी भूमिका है. वे चट्टान की तरह दैनिक भास्कर के साथ खड़े रहे और सारी बुराइयों, मुश्किलों, चुनौतियों को खुद पर लेते हुए इसे झेलते बढ़ाते रहे. ऐसे कर्मठ और त्यागी संपादक कम होते हैं.

हर शख्स एक समय बाद रिटायर या विदा होता है लेकिन प्रभाष जोशी, हरिवंश, श्रवण गर्ग जैसे लोग इसके अपवाद होते हैं. प्रभाष जोशी को जनसत्ता ने उनके जीते जी जोड़े रखा, भले ही सलाहकार के रूप में. उसी तरह भास्कर को करना चाहिए था. उसे श्रवण गर्ग को संपादकीय निदेशक या समूह संपादकीय सलाहकार बनाकर अपने पास रखे रखना चाहिए था. दैनिक भास्कर से श्रवण गर्ग के जाने का नुकसान श्रवण गर्ग को नहीं होगा. उनके लिए तो अच्छा हुआ. वे आजाद पंछी हो गए. उनके पास करने के लिए पूरा जहां भर का काम होगा. नुकसान हुआ है दैनिक भास्कर का. उसने अपना एक फेस, ब्रांड अंबेसडर, वरिष्ठतम थिंक टैंक खो दिया है.

आज भले भास्कर के मालिकों को न समझ में आए, बाद में उन्हें महसूस होगा कि श्रवण गर्ग के इस्तीफा देने को स्वीकार करना उनके लिए अच्छा नहीं था. पावर गेम में तेजी से सक्रिय भास्कर के लिए पुराने लोग त्याज्य नहीं होने चाहिए. उनका बेहतरीन इस्तेमाल करने की कला आनी चाहिए. दैनिक जागरण ने अपनी तरफ से आज तक कोई बड़ा नामी संपादक नहीं पैदा किया क्योंकि वहां किसी एक को इतना राइट दिया ही नहीं जाता, वहां मालिक ही महान संपादक और महान मार्केटियर बनने की रेस में रहते हैं. पर दैनिक भास्कर ने श्रवण गर्ग जैसा संपादक हिंदी पत्रकारिता को दिया, यह कहा जा सकता है. देर से ही सही, भास्कर को महसूस होगा कि उनसे गलती हो गई है. फिलहाल हम सभी श्रवण गर्ग को जीवन व करियर की नई पारी के लिए शुभकामनाएं व बधाइयां देते हैं.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया ([email protected])


मूल खबर ये है- दैनिक भास्कर से समूह संपादक श्रवण गर्ग का इस्तीफा

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