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बदला लेने के लिए निकाला अखबार, अब वेतन के लिए चिल्‍ला रहे पत्रकार

: कानाफूसी : यशवंतजी, पूर्व में रांची सन्मार्ग के संबंध में भड़ास पर कई तथ्यात्मक ख़बरें आ चुकी हैं जिससे कर्मियों को काफी राहत मिली है. लेकिन व्यवस्था में अभी भी गड़बड़ियाँ हैं. इसका मूल कारण है अखबार के मालिक की मीडियाकर्मी विरोधी प्रवृति. अखबार के मालिक का असली नाम है प्रेमशंकर तिवारी वल्द केदारनाथ तिवारी. बिहार के बक्सर जिले के एक साधारण परिवार से आते हैं. इन्होंने मधुकोड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में दलाली में करोड़ों की कमाई की. उस ज़माने में इन्होंने अपना नाम दक्षिण भारतीय तर्ज़ पर प्रेम शंकरन रख लिया.

: कानाफूसी : यशवंतजी, पूर्व में रांची सन्मार्ग के संबंध में भड़ास पर कई तथ्यात्मक ख़बरें आ चुकी हैं जिससे कर्मियों को काफी राहत मिली है. लेकिन व्यवस्था में अभी भी गड़बड़ियाँ हैं. इसका मूल कारण है अखबार के मालिक की मीडियाकर्मी विरोधी प्रवृति. अखबार के मालिक का असली नाम है प्रेमशंकर तिवारी वल्द केदारनाथ तिवारी. बिहार के बक्सर जिले के एक साधारण परिवार से आते हैं. इन्होंने मधुकोड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में दलाली में करोड़ों की कमाई की. उस ज़माने में इन्होंने अपना नाम दक्षिण भारतीय तर्ज़ पर प्रेम शंकरन रख लिया.

एक अखबार ने इनके कुकृत्यों का भंडाफोड़ किया तो इन्होंने सन्मार्ग अखबार की फ्रेंचाइजी ली और अखबार निकलना शुरू किया. आयकर विभाग ने इनके विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया है. इसके बाद इन्होंने अपने नाम का पुछल्ला शंकरन हटा दिया और सिर्फ प्रेम लिखने लगे. कहते हैं कि इनके अखबार में मधु कोड़ा और विनोद सिन्हा का भी धन पिछले दरवाज़े से लगा है. हिंदी के बाद इन्होंने एक उर्दू अखबार का प्रकाशन भी शुरू किया और अब अंग्रेजी अखबार निकलने की तैयारी में हैं. महज़ तीन साल के अन्दर इस अखबार में छह संपादक बदल चुके हैं. सभी संपादक बेइज्जत करके निकाले गए हैं. उनके करीबी लोगों का कहना है कि वे बड़े पत्रकारों को मुलाजिम रखकर उन्हें ज़लील कर बाहर निकालने के जरिये अपने अपमान का बदला चुकाते हैं. इससे उन्हें संतोष मिलता है.

अखबार की शुरुआत में तो कुछ छोटे-मोटे लोगों को रखकर पटना संस्करण के सम्पादकीय कौशल का लाभ उठाते थे लेकिन बाद में ज्ञानवर्धन मिश्र को संपादक बनाकर ले आये. ज्ञान जी ने अखबार को एक स्वरुप देना शुरू ही किया था कि हिंदुस्तान के रांची संस्करण के पूर्व संपादक हरि नारायण सिंह आने-जाने लगे. ज्ञानवर्धन जी ने स्थिति को देखते हुए अखबार से विदाई मांगी तो उन्हें बिना किसी हिल्ले-हवाले के विदा कर दिया गया. इस बीच हरि नारायण जी न्यूज़ इलेवन में चले गए. प्रेम बाबू ने तुरंत रजत गुप्ता को बुला लिया. रजत गुप्ता एक साल तक रहे आंचलिक नेटवर्क को मजबूत कर राजस्व बढ़ाने का काम किया. दूसरी तरफ कर्मियों के पीएफ के लिए पहल की. यह बात प्रेम बाबू को रास नहीं आई और उन्हें किनारे करने के लिए प्रभात खबर के पूर्व संपादक बैजनाथ मिश्र को बिठाना शुरू किया. रजत जी ने स्थिति को भांप लिया लेकिन इससे पहले कि वे विदा मांगते प्रेम बाबू ने उन्हें ज़लील कर बाहर कर दिया.

बैजनाथ मिश्र ने कुछ महीने मोर्चा संभाला फिर हरि नारायण सिंह आफिस में आकर बैठने लगे. बैजनाथ जी ने मामला समझा और ऑफिस आना बंद कर दिया. अभी हरि नारायण जी ने मोर्चा संभाल रखा है लेकिन वे कितने दिनों तक टिक पाएंगे कहना कठिन है. अभी हरि नारायण जी ने रिपोर्टरों और डेस्क के लोगों से उनकी क्षमता के अनुरूप काम तो ले रहे हैं, लेकिन उन्हें उनका हक नहीं दिलवा पा रहे हैं. सुविधाएं तो दूर वेतन भी समय पर नहीं मिल पा रहा है. हरि नारायण जी की छवि कर्मियों के प्रति सहयोगात्मक रवैये वाले संपादक की रही है. झारखण्ड के अधिकांश पत्रकार उन्हें हरि भैया कहकर पुकारते हैं. लेकिन उनकी बात भी सन्मार्ग में नहीं सुनी जा रही है. कर्मियों को दिए गए उनके आश्वासन निष्फल हो रहे हैं. इसलिए सन्मार्ग में उनके भावी कार्यकाल को लेकर तरह-तरह की शंकाएं व्यक्त की जा रही हैं. पत्रकारों से बदला लेने का यह प्रबंधकीय सिलसिला कहाँ जाकर थमेगा कहना कठिन है. फिलहाल स्थिति यह है की इस मीडिया हॉउस का तो विस्तार हो रहा है लेकिन इसके करीब 100 कर्मी वेतन तक के लिए गुहार लगाते फिर रहे हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 
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