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टीवी पत्रकारिता की नई पीढ़ी के लिए चेतावनी भरी शुभकामना

टीवी मीडिया में १२ बरस हो गए… बहुत उतार चढ़ाव देखे, आँखों देखी से एनडीटीवी तक का सफ़र इज्ज़त से बीता… ईश कृपा से संस्कारों से अपनी छवि को बनाये रखा… पर एक सवाल कई बार जेहन में आता है कि आने वाली नयी पीढ़ी के लिए, टीवी न्यूज़ चैनल एक बेहतर भविष्य है? जिस तरह से नयी पीढ़ी …जो कि तमाम नए पुराने विश्वविद्यालयों से मॉस कॉम  या पत्रकारिता करके, रातों रात बड़े-छोटे चैनलों में एंकरिंग का, रिपोर्टिंग का ख्वाब देख रहे हैं, उनके लिए सलाह है कि वो इस लाइन की बजाय, प्रिंट मीडिया पत्रकारिता या फिर किसी कम्पनी में पीआरओ जैसी नौकरी तलाश करें.

टीवी मीडिया में १२ बरस हो गए… बहुत उतार चढ़ाव देखे, आँखों देखी से एनडीटीवी तक का सफ़र इज्ज़त से बीता… ईश कृपा से संस्कारों से अपनी छवि को बनाये रखा… पर एक सवाल कई बार जेहन में आता है कि आने वाली नयी पीढ़ी के लिए, टीवी न्यूज़ चैनल एक बेहतर भविष्य है? जिस तरह से नयी पीढ़ी …जो कि तमाम नए पुराने विश्वविद्यालयों से मॉस कॉम  या पत्रकारिता करके, रातों रात बड़े-छोटे चैनलों में एंकरिंग का, रिपोर्टिंग का ख्वाब देख रहे हैं, उनके लिए सलाह है कि वो इस लाइन की बजाय, प्रिंट मीडिया पत्रकारिता या फिर किसी कम्पनी में पीआरओ जैसी नौकरी तलाश करें.

टीवी पत्रकारिता में पिछले कुछ महीनो में कई दिग्गज पत्रकार, एंकर पैदल हो चुके हैं और काम की तलाश में भटक रहे है… कुछ शख्सियत, जो कभी बड़े चैनल्स में बड़े नाम हुआ करते थे आज घर बैठे हैं… दर्ज़नों पत्रकार उनके लिए काम करते थे पर अब वो अपने काम को लेकर परेशान हैं… उनकी ईगो है वो कहते नहीं… और वो छोटे चैनल में काम करने से कतराते हैं… कहीं नाम न खत्‍म हो जाये… कुछ समझदारों ने अपने आप को इवेंट कंपनियों से जोड़ लिया… तो कुछ प्रिंट मीडिया की तरफ चले गए… ऐसा क्यूँ हुआ..?

दअरसल, बड़े मीडिया घरानों ने अपने मास मीडिया कोर्स संस्‍थान खोल लिएच…. उनकी हार साल नयी खेप तैयार हो रही है… इस खेप को कहीं काम नहीं मिला? तो इनके संस्‍थान में कौन भर्ती होगा..? लिहाजा साख बचाने के लिए ये संस्‍थान पुराने, महंगे मीडिया कर्मियों को बाहर करके नया सस्ता कर्मी अन्दर भर्ती करने में लगे हैं… परिवर्तन सुखद होता है… लिहाजा सभी मीडिया घराने इस तरफ बढ़ चले हैं. ये ही बड़ी वज़ह पत्रकारिता के गिरावट की भी है… कहना ठीक रहेगा कि सबसे असुरक्षित नौकरी टीवी मीडिया की ही है.

गोलबंदी ग्रुपबाज़ी ने भी टीवी मीडिया को नुकसान दिया है… टीआरपी के खेल ने कई एंकरों को पैदल किया है… जिन की टीआरपी गिर रही थी वो या तो हटा दिए गए या फिर रिपोर्टिंग में लगा दिए गए. खास तौर पर महिला रिपोर्टर और एंकर को ३५ बरस के बाद हटा ही दिया जा रहा है…  कोई एक दो अपवाद हो सकते हैं… यदि वो डेस्क का काम नहीं सीख पाई तो उनके लिए और भी वक्क्त ख़राब है… सच यही है.

टीवी चैनल की दुनिया बाहर से बेहद ख़ूबसूरत लगती है पर अंदर से खोखली है… बहुत से नए पास आउट दिल्ली चैनल्स रिपोर्टर को फ़ोन करके अपनी सिफारिश की उम्मीद करते होंगे.. हकीकत ये है कि आज की तारिख में ९० फीसदी पत्रकारों को अपनी जॉब का भरोसा नहीं की कब लात पड़ जाये… नए चैनल जो भी आ रहे है वहां काम जरूर मिल जाता है पर वो पैसों के लिए परेशान करते

हैं… ऐसे चैनल्स में महिला एंकर मात्र १२ हज़ार में कम कर रही हैं वो भी आज यहाँ तो कल वहां… क्यूंकि चैनल पैसा टाइम पर नहीं दे रहा… बरहाल नयी पौध हर साल तैयार हो रही है… उनके भविष्य के लिए चेतावनी भरी शुभकामना है.. मन में भड़ास थी सो लिख दी.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

 

 
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