: पॉवर के आगे फेल हो गया कथित चौथा खंभा की हेकड़ी : कोई पत्रकार संगठन नहीं जुटा सका विरोध करने का हिम्मत : यशवंतजी, पुलिस की जितनी भी गलती हो आप उससे जीत नहीं सकते. ऐसा मेरे तथा अन्य पत्रकारों के मामले में हुआ है. प्रतापगढ़ में विधानसभा चुनाव के मतगणना के दिया यानी 6 मार्च को पट्टी विधानसभा सीट के लिए मतगणना चल रही थी, जिसमें भाजपा के पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह मोती दस्यु सरगना ददुआ का भतीजा तथा सपा सांसद बाल कुमार पटेल का बेटा राम सिंह पटेल 156 मत से चुनाव जीत गया था.
मामला नजदीकी होने के चलते राजेंद्र सिंह मोती के एजेंट पोस्टल बैलट की गिनती की मांग को लेकर शोर-शराबा करने लगे. मेरे समेत कई पत्रकार मामला जानने के लिए शोर शराबा वाले इलाके की तरफ जाने लगे. वहां पर तैनात दारोगा जलोधर यादव और वीरेंद्र मिश्रा ने सभी को रोक दिया. जलोधर ने दैनिक जागरण के पत्रकार दिनेश सिंह से अभद्रता की. पत्रकारों ने जब अपना परिचय दिया तब भी दोनों दारोगा अपनी हरकतों से बाज नहीं आए. जब हमने विरोध किया तथा अपना पास दिखाया तो दोनों दारोगा वहां से भागने को कहा.
पत्रकारों ने जब इस तरह के व्यवहार और रवैये का विरोध किया तो वे और उत्तेजित हो गए. इसी बीच डीएम एम देवराज भी वहां पहुंच गए. पत्रकारों ने उन्हें दोनों दारोगा के दुर्व्यवहार की जानकारी दी, जिसके बाद वहां मौजूद सीओ खालीकुज्जमा को यह नागवार गुजरा. उन्होंने पत्रकारों को गाली देते हुए दोनों दारोगा तथा पुलिसकर्मियों से पत्रकारों को पीटने को कहा. फिर क्या था सारे रंगरूट निहत्थे पत्रकारों पर पिल पड़े तथा जमकर लाठियां भाजने लगे. डीएम खड़े होकर तमाशा देखते रहे तथा पुलिसकर्मी लाठी बरसाते रहे. एएसपी दिनेशचंद्र ने पुलिसकर्मियों को आधे-अधूरे मन से रोकने का प्रयास किया परन्तु वे नहीं माने. लगातार लाठी चलाते रहे.
पुलिस के लाठीचार्ज में पत्रकार दिनेश सिंह का सिर फट गया, वहीं मुझे पुलिसवालों ने घेर कर मारा. छायाकार विनय पाठक, राजन शुक्ला, अमितेंद्र श्रीवास्तव, नईम सिद्दीकी, धर्मेंद्र सिंह, सुनील यादव, प्रकाश मिश्रा, ओम सिंह, शिव मोहन, सर्वेश शर्मा, गिरीश त्रिपाठी, बृजेश, हरिकेश मिश्रा, वैभव श्रीवास्तव एवं विक्कू को गंभीर चोटें आईं. इनमें से कई पत्रकारों का कैमरा टूट गया, कई के मोबाइल गायब हो गए. एसपी दीपक कुमार के पहुंचने के बाद दोनों दारोगाओं को पटकार लगाते हुए परिसर से हटने का निर्देश तथा मामले की जांच का आदेश दिया. इसके बाद मुझे हालत गंभीर होने पर इलाहाबाद रेफर कर दिया गया. मुझे गंभीर चोटें आई थीं. यह तो रही घटना की कहानी अब आपको बताता हूं असली खेल.
पुलिस विभाग के दबाव में स्वास्थ्य विभाग वालों ने अपना खेल शुरू कर दिया. स्वास्थ्य विभाग ने इलाज में तो मुस्तैदी बरती लेकिन जो घायल बेहोशी की हालत में आए थे, उन्हें भी चिकित्सकों ने कागज में सही दिखा दिया यानी सभी पत्रकार खुद चलकर इलाज के लिए आए थे. किसी भी पत्रकार को गंभीर चोट नहीं लगी थी, जबकि इन्हीं लोगों ने मेरी हालत खराब होने पर इलाहाबाद के लिए रेफर कर दिया था. मेरे कई और साथी इलाहाबाद रेफर किए गए थे. पुलिस विभाग के मुखिया दीपक कुमार भी घायल पत्रकारों को देखने जिला अस्पताल गए थे और उन्होंने दोषी पुलिसकर्मियों के मुकदमा लिखकर कार्रवाई की बात भी कही थी. साथ ही लाठीचार्ज को भी गलत बताया था.
इस मामले में हमलोगों से तहरीर ली गई तथा कोतवाली में दारोगा और पुलिसकर्मियों के विरुद्ध मुकदमा लिखा गया, लेकिन पुलिस ने दो पेज छोड़कर मुकदमा लिखा. इसके बाद पुलिस ने जलोधर यादव की तहरीर पर मेरे द्वारा दी गई तहरीर के अनुसार ही छोड़े गए पेज पर बाद में अपना मुकदमा लिख लिया तथा एक दर्जन पत्रकारों के ऊपर नामजद भी कर दिया गया, जिसमें आईपीसी की धारा 147/323/504/506/308/332/353/394/ और 7 क्रिमिनल एक्ट शामिल था. पुलिस ने अपना मुकदमा अपराध संख्या 131 पर दर्ज किया जबकि हमलोगों का मुकदमा 132 नम्बर पर दर्ज किया गया.
फिर यहीं से शुरू हुआ पत्रकारों पर पुलिस का दबाव बनाने का खेल. पुलिस दबाव डालकर पत्रकारों को समझौता करने के लिए बाध्य कर रही थी. पुलिस पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा भी इसी वहज से लिखाया था. और वही हुआ जो पुलिस चाह रही थी. दबाव के चलते दोनों तरफ से लिखित समझौता हुआ लेकिन घायल हुए पत्रकार आज भी अपना इलाज करा रहे हैं. जिनका कैमरा टूट, जिनको शारीरिक चोटें आईं, उनको पूछने वाला कोई नहीं है. इस घटना में ना तो पत्रकार संगठन लड़ाई के लिए आगे आए और ना ही कोई जनप्रतिनिधि पत्रकारों के साथ खड़ा हुआ, जिसके चलते पत्रकार परेशानी में फंसने की बजाय समझौता करना ही बेहतर समझा.
धीरेंद्र द्विवेदी
पत्रकार
प्रतापगढ़





