: संदर्भ- प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू का बिहार बयान : प्रेस काउंसिल के चेयरमैन न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू का पहला बयान आया कि बिहार में प्रेस स्वतंत्र नहीं है, फिर उन्होंने इस मसले पर जांच कमेटी बैठाने की घोषणा की, अब जांच कमेटी के आने का विज्ञापन अखबारों में छप चुका है, देश में शायद पहली बार किसी राज्य में इस तरह की जांच प्रेस काउंसिल करा रहा है, इस अवसर पर अखबारों का पक्ष भी सार्वजनिक होना चाहिए, क्योंकि यह बहस भी सार्वजनिक हो रही है : इस मसले पर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश का विश्लेषण… :
मैं महाराष्ट्र में था. न्यायमूर्ति काटजू साहब का बयान पढ़ा कि बिहार में प्रेस स्वतंत्र नहीं है. आश्चर्य हुआ. लौट कर उस दिन के पटना से छपनेवाले सभी अखबार, मंगवाये. प्रभात खबर में पेज दो पर खबर थी कि बिहार में प्रेस आजाद नहीं है. माननीय काटजू साहब द्वारा कही एक-एक बात का जस-का-तस वर्णन. इसी तरह हिंदुस्तान टाइम्स में पेज थ्री पर काटजू साहब की बातें छपी थीं. अन्य अखबारों में दैनिक जागरण की खबर के अंदर पूरे तथ्य थे. राष्ट्रीय सहारा में पेज वन पर खबर थी. क्या इन खबरों का इस तरह विस्तार से, प्रमुखता से अखबारों में छपना, इस बात का प्रमाण नहीं है कि बिहार के प्रेस स्वायत्त और स्वतंत्र हैं. यदि प्रेस परतंत्र होते, तो काटजू साहब के बयान का एक-एक शब्द छपता कैसे?
फिर दूसरे दिन काटजू साहब बोधगया गये. वहां भी उन्होंने अपनी वही बातें दोहरायीं. कहा, बिहार में मीडिया मैनेज्ड है. आजकल अखबारों के जिले-जिले संस्करण हो गये हैं, इसलिए कुछ पाठकों को शिकायत रहती है कि उनके जिले की खबरें वहीं तक रह जाती हैं. लोग बाहर नहीं जानते. अखबारों पर यह लोकलाइजेशन (स्थानीयकरण) का असर है. नहीं मालूम, काटजू साहब का बोधगया में दिया बयान अन्य अखबारों के जिलों के संस्करणों में छपा या नहीं, पर प्रभात खबर अकेला अखबार था, जिसने पूरे बिहार के संस्करणों में छापा. हालांकि काटजू साहब के बोधगया बयान में कोई नयी बात नहीं थी. पटना में कही बातों की ही दूसरे दिन पुनरावृत्ति थी. क्या यह दूसरा उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त नहीं है कि बिहार में प्रेस कैसे काम कर रहा है?
यह शुरू में ही स्पष्ट करना चाहूंगा कि बिहार में हो रहे बदलावों को प्रमुखता से प्रभात खबर छापता है. उसके पीछे एक सैद्धांतिक और नीतिगत कनविक्शन (बिहार के प्रति प्रतिबद्धता) है. जिस समाज में लंबे समय से सृजन या बदलाव का अभियान न चला हो, सामाजिक जड़ता या ठहराव हो, जो आधुनिकता की दौड़ में अन्य राज्यों से पिछड़ कर, बीमारू की श्रेणी में आ गया, वह बिहार, पूरे समाज को लेकर बीमारू राज्यों की श्रेणी से निकलने की मामूली कोशिश भी करे, करवट ले, तो क्या यह बड़ी खबर नहीं है? ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में. समाज की इस करवट पर, बदलाव के निशान देख कर, जो अखबार या मीडिया गौर या उल्लेख न करे, तब मीडिया की सामाजिक भूमिका पर सवाल उठना चाहिए? बहस होनी चाहिए?
प्रेस काउंसिल के चेयरमैन न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू के बिहार बयान को पढ़ते ही, भारतीय मीडिया पर पढ़ा गया काटजू साहब का लेख याद आया. कुछेक माह पहले, जो संभवतः हिंदू में छपा. फिर उसे अनुवाद कर प्रभात खबर ने छापा. अनुवाद भी किया, स्वर्गीय एच वाई शारदा प्रसाद जी (जो लंबे समय तक इंदिरा जी के प्रेस सलाहकार रहे, जाने-माने लेखक, चिंतक व पत्रकार) के छोटे भाई नारायण दत्त जी ने. नारायण दत्त जी नवनीत के संपादक रहे हैं. कई भाषाओं के जानकार. आजादी की लड़ाई के श्रेष्ठ मूल्यों कीप्रतिमूर्ति.
आज भी अकेले बंगलुरु में रहते हैं. काटजू साहब के विचार, भारतीय मीडिया के बारे में सटीक लगे. सही और यथार्थ के पास. इसलिए इसका कन्नड़भाषी नारायण दत्त जी ने हिंदी में अनुवाद किया, वह प्रभात खबर ने छापा.
…जारी…
लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.





