Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

काटजू के बयान पर हरिवंश ने लिखा- बिना सबूत-सुनवाई फैसला (तीन)

: बिहार, झारखंड में तो बात-बात में प्रेस परिषद में शिकायत जाती है : बिहार और झारखंड ऐसे राज्य हैं, जहां से बात-बात पर प्रेस काउंसिल को शिकायत जाती है. खास कर चोरी और सीनाजोरी करनेवाले तुरंत प्रेस काउंसिल के माध्यम से नोटिस देते हैं. पर प्रेस काउंसिल की हर नोटिस को हम अत्यंत तत्परता-गंभीरता से लेते हैं. यह गंभीर पत्रकारीय सरोकार, पुरानी संस्कृति और अनुशासन के तहत है. मेरे मन में प्रेस के लिए सर्वोपरि कानूनी संस्था के बारे में वैधानिक कारणों से सम्मान तो है ही, साथ ही अपनी पेशेगत जिम्मेवारी, अनुशासन, मूल्य और सम्मान के कारण यह आदर अधिक है.

: बिहार, झारखंड में तो बात-बात में प्रेस परिषद में शिकायत जाती है : बिहार और झारखंड ऐसे राज्य हैं, जहां से बात-बात पर प्रेस काउंसिल को शिकायत जाती है. खास कर चोरी और सीनाजोरी करनेवाले तुरंत प्रेस काउंसिल के माध्यम से नोटिस देते हैं. पर प्रेस काउंसिल की हर नोटिस को हम अत्यंत तत्परता-गंभीरता से लेते हैं. यह गंभीर पत्रकारीय सरोकार, पुरानी संस्कृति और अनुशासन के तहत है. मेरे मन में प्रेस के लिए सर्वोपरि कानूनी संस्था के बारे में वैधानिक कारणों से सम्मान तो है ही, साथ ही अपनी पेशेगत जिम्मेवारी, अनुशासन, मूल्य और सम्मान के कारण यह आदर अधिक है.

ब्रिटेन के अलिखित संविधान और कानून की तरह मन में सम्मान. पिछले 22 वर्षों में, शायद ही एकाध बार कुछेक खबरों पर प्रेस काउंसिल ने आवश्यक सुधार का निर्देश दिया हो. क्योंकि हम मानते हैं, प्रेस काउंसिल का स्टि­क्चर हमारे पेशेगत, कौशल, मूल्य और मर्यादा पर टिप्पणी है. यह इसलिए कह रहा हूं कि प्रेस काउंसिल के चेयरमैन श्री काटजू साहब के बयान से गंभीर असहमति जाहिर करते हुए भी यही भाव मन में है.

न्यायमूर्ति काटजू जैसे व्यक्ति को यह बयान देने के पहले खुद को आश्वस्त करना चाहिए था. उनकी टिप्पणी, उस राज्य के खिलाफ है, जो अपनी तकदीर बदलने की कोशिश में लगा है. क्या काटजू साहब के पास कोई लिखित शिकायत गयी है? वह सुप्रीम कोर्ट के जज रहे हैं. बिना दोनों पक्षों की शिकायत सुने उन्होंने आज तक कोई फैसला नहीं दिया होगा. पर बिहार के मामले में बिना पक्ष सुने या गहराई में गये बगैर काटजू साहब का मत है कि यहां मीडिया स्वतंत्र नहीं है. क्या यह निष्कर्ष सही है या पूर्वाग्रह से ग्रस्त है? या भावना के तहत व्यक्त विचार है? आप फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाने की बात कर रहे हैं. कम-से-कम उस कमेटी की रिपोर्ट तो आ जानी चाहिए थी. यह फैक्ट फाइंडिंग कमेटी भी किसकी शिकायत पर बनी है, वे शिकायतें क्या हैं, यह भी सार्वजनिक रूप से जानने का हमें हक है.

क्या बिहार के किसी अखबार ने यह लिखित शिकायत की है? किसी पत्रकार ने लिखित शिकायत की है? इंडिया टुडे के अमिताभ सिन्हा ने अपने ब्लॉग में यह सवाल उठाया भी है. बिहार के किस पत्रकार ने कौन-सी बड़ी स्टोरी ब्रेक करनी चाही है और वह खबर नहीं छप सकी? किन पत्रकारों को ऐसा करने के कारण नौकरी खोनी पड़ी है? अगर पूरा समाज या मीडिया ही खामोश है या मूकदर्शक, तो बीमारी और गहरी-गंभीर है. समाज के स्तर पर. क्या काटजू साहब मानते हैं कि बिहार की पूरी पत्रकारिता परतंत्र है? क्या इस परतंत्र समुदाय में एक भी साहस की आवाज नहीं बची? क्या आज के युग में यह मुमकिन है? बिहार में अगर सब चुप रह गये, तो बिहार से आगे देश की मीडिया है. विदेश की मीडिया है. इस ग्लोबल दुनिया की एक खासियत  है कि नेटवर्क-संपर्क की दृïि से दुनिया गांव में बदल गयी है. भला सूचना क्राति के दौर में कोई सूचना दब सकती है? बिहार की मीडिया खामोश है, तो इससे आगे भी संसार है. अरब देशों में तो तानाशाह थे. हर तरह की पाबंदी थी. पर आधुनिक मीडिया ने अपनी ताकत दिखा दी. क्या ब्लॉग, नेट, इंटरनेट सॉफ्ट न्यूज साइट जैसी जगहों पर कौन-सी बिहार की बड़ी खबर छपी, जो बिहार के अखबारों में नहीं छपी?

एक दूसरा परिदृश्य है, जो शायद मुमकिन हो. पूरी मीडिया गलत करनेवालों का हमसफर बन गयी. मूकसाक्षी या मूक रह कर सहयोगी. दिल्ली में टूजी का बड़ा प्रकरण हुआ. यह सिर्फ एक अखबार में लगातार वर्षों छपता रहा. दिल्ली में ही. पर कुछ नहीं हुआ. जब तक सुप्रीम कोर्ट ने नहीं पकड़ा. सुप्रीम कोर्ट की पकड़ ने टूजी का वह विस्फोट किया, जिसमें मीडिया के बड़े घराने, अखबार, टीवी सब आ गये. याद रखिए, अगर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप नहीं होता, तो टूजी का मामला मीडिया के लिए मुद्दा नहीं बनता. हालांकि दिल्ली से प्रकाशित पायनियर में लगातार अकेले यह छपता रहा. क्या बिहार जैसे संवेदनशील राज्य में कोई टूजी जैसी बड़ी घटना होती, तो वहां के जागरूक लोग अदालत नहीं जाते? अदालत के माध्यम से चीजें नहीं आतीं? रूटीन मामलों में सरकारों के खिलाफ फैसलों का आना-जाना लगा रहता है. पर ऐसी कौन-सी बड़ी घटना या अदालत से गंभीर विस्फोटक मामला बिहार में उजागर हुआ, जिसे प्रेस ने कवर नहीं किया. या वह टूजी प्रकरण की तरह अदालत के माध्यम से सामने आया.

याद रखने की जरूरत है कि टूजी प्रकरण दिल्ली में ही संभव है, क्योंकि नीतिगत फैसले वहीं होते हैं. बिहार में न बड़े उद्योग हैं, न कॉरपोरेट पूंजी है, न बड़े नीतिगत फैसले यहां होते हैं. इसलिए यहां टूजी जैसे प्रकरण हो ही नहीं सकते? यहां बालू के घाटों की नीलामी जैसे कामों में कोई मामूली हेर-फेर कर सकता है. इसलिए बिहार बड़े घोटालों की धरती बन ही नहीं सकती. पशुपालन घोटाला ही 1000-2000 करोड़ के बीच होगा. एक टूजी में 1.76 लाख करोड़ की गड़बड़ी की चर्चा होती है. कोयला में महाघोटाला, कॉमनवेल्थ वगैरह जैसे प्रकरण छोड़ दें, तो देश लूट की स्तब्धकारी चीजें दिल्ली में ही सामने आयेंगी. क्योंकि ऐसी चीजों के मूल स्रोत दिल्ली में ही है. शायद ही किसी बिहारी नेता का स्विस बैंक में खाता हो.

आज सूचना के अधिकार का युग है. बिहार उन श्रेष्ठ राज्यों में गिना जाता है, जिसने सूचनाधिकार कानून को बेहतर तरीके से लागू किया है. इस दौर में '70, '80 या '90 के दशकों की तरह कोई खबर छुपी नहीं रह सकती. अगर बिहार के अखबार सामने नहीं लायेंगे, तो बिहार की राजनीति में अनगिनत-असंख्य लोग ऐसे मिलेंगे, जो संघर्ष की ही राजनीति करते हैं. बिहार की कौन-सी बड़ी खबर सूचनाधिकार से निकली, जो अखबारों में नहीं छपी?

एक क्षण के लिए मान भी लिया जाये कि बिहार की मीडिया परतंत्र है, तो दुनिया के अन्य अखबारों में कैसे बिहार के अच्छे कामों के बारे में लगातार छपा और छप रहा है? क्या वहां भी बिहार सरकार का सेंसरशिप लागू है? या बिहार सरकार इतनी बड़ी हो गयी है कि उसका प्रभाव दुनिया के सबसे असरदार और प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों पर हो गया है. फिर भारत के बारे में, कैसे दुनिया की इन्हीं मशहूर अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लगातार आलोचनात्मक रपटें छपतीं हंै? भारत सरकार तो बिहार सरकार से अधिक ताकतवर है, फिर वह क्यों नहीं बिहार जितना सम्मान विदेशी मीडिया में अर्जित कर लेती? इन पत्रिकाओं के अलावा, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के लोगों ने बिहार में हुए कामों की कैसे प्रशंसा की है? क्या वे भी सेंसरशिप के शिकार हैं?  या उन्हें बिहार के फेवर में बोलने के लिए बाध्य किया गया है?

यह मान भी लिया जाये कि बिहार में प्रेस परतंत्र है, तो बिहार में कहां भागलपुर अंखफोड़वा कांड, पशुपालन घोटाला या कोई नरसंहार हुआ है, जो स्थानीय अखबारों में नहीं छपे. अगर ऐसा होता, तो कम से कम देश के अन्य अखबारों या टीवी चैनलों में तो ये खबरें आयीं होतीं? आज गली-गली तक मीडिया की उपस्थिति है. दरअसल, अपनी पटना यात्रा के दौरान, जनवरी-फरवरी 2012 के बीच, सरकार के कामकाज की त्रुटियों से संबंधित पढ़ी नौ खबरें स्मृति के आधार पर याद हैं. कहें कि राज्य सरकार की आलोचनात्मक खबरें प्रभात खबर में पहले या दूसरे पेज पर प्रमुखता से छपीं. उसके पहले नवंबर-दिसंबर की छपी कुछ और आलोचनात्मक खबरें भी. अन्य अखबारों में भी ऐसी खबरें जरूर छपी होंगी.

व्यवस्था या सरकार की कमियों से जुड़ी ऐसी खबरों के प्रकाशन को क्या कहा जायेगा? या नरसंहार की खबरें, अपहरण की खबरें, चारा घोटाला जैसी खबरें बिहार में नहीं हो रही हैं, तो उन्हें कल्पना में गढ़ कर लिखा जाए, तब प्रेस आजाद माना जायेगा? तब और अब में क्या फर्क है? एक पत्रकार के तौर पर अपने पाठकों के साथ हम साझा करना चाहेंगे कि फर्क क्या और कैसा है? अगर अखबार में खबर छपती है कि बिहार में वित्तीय वर्ष 2011-12 के पूरे बजट की आधी से अधिक राशि भी दिसंबर तक खर्च नहीं हुई, तो वहां (बिहार में) तुरंत दूसरे दिन सरकार बैठ कर तय करती है कि खर्च कैसे बढ़ाया जाये?

किसानों की, सूखे की, फसल बीमारी की खबरें छपती हैं, तो उन पर व्यवस्था में हरकत दिखायी देती है. सकारात्मक. खबर छापनेवाले अखबारों के पीछे लोग नहीं लगते कि ऐसी खबरें बाहर क्यों आ रही हैं? या कै से छप रही हैं? कहीं कोई समस्या छपती है, तो उस पर व्यवस्था के अंदर सक्रियता दिखायी देती है. हल निकले या न निकले, पर छपने पर व्यवस्था में हरकत दिखायी देती है. सुगबुगाहट होती है. यह फर्क है, पुराने और आज के बिहार में. यह बिहार के लिए एक नयी चीज है. लगभग 33 वर्षों से (पत्रकारीय कैरियर शुरू करने के समय से धर्मयुग, रविवार वगैरह के माध्यम से) बिहार को करीब से देखना हुआ है. भावनात्मक स्तर पर भी. यह एक फर्क है, तब और अब में. यह हमें भी पता है कि कोई जादू की छड़ी नहीं है, इस व्यवस्था में चमत्कार संभव नहीं है, वह भी बिहार में, जिसे लोग खारिज कर चुके थे. पर नकारात्मक माहौल के बीच भी सकारात्मक विश्वास पैदा करना एक बड़ा काम है. क्या इस काम में रोज बेवजह छेद करना ही पत्रकारिता है?

इस राज्य में राजनीतिक जागरूकता के साथ-साथ एक समानांतर बड़ी नकारात्मक ऊर्जा भी सक्रिय रही है. परनिंदा, परचर्चा. दिन भर बतरस और गप. अपनों से अधिक दूसरों में दिलचस्पी. यह हिंदी समाज या बीमारू राज्यों का मानस रहा है. जातीय शत्रुता और सांप्रदायिक द्वेष की पृष्भूमि रही है. रविवार (कोलकाता) में काम करते समय अनेक नरसंहार देखने का दुखद अवसर आया. घटना के तुरंत बाद पहुंच कर देखे गये वे दृश्य, स्मृति उभरने पर अब भी बेचैन करते हैं. राजनीति पोषित. अपराधियों के आतंक की सांस में जीने का अनुभव इस राज्य ने किया है. दबंग लोगों की ताकत के आगे, जहां कंठ के स्वर जुबान तक नहीं आते थे. वह राज्य करवट ले रहा है. क्या इस करवट लेते राज्य के इस सकारात्मक परिवर्तन को देखना मीडिया का काम नहीं है? हां, यह सवाल जरूर उठता है कि क्या बिहार में रोज या रोजमर्रा के जीवन में होनेवाली हत्याएं, डकैती, लूटपाट, भ्रष्टाचार, अराजकता जैसी व्यवस्थागत बुराइयां खत्म हो गयी हैं? नहीं, यह सब बंद हो जाना असंभव जैसा है. यह सब पूरे देश के समाज के जीवन का हिस्सा हो गया है. इसके मूल में सांस्कृतिक कारण भी हैं. विकास का मौजूदा देशव्यापी माडल है ? क्या पूरे देश में अकेले यह सब बिहार राज्य खत्म कर सकता है?

पर एक राज्य अपने बूते क्या कर सकता है? जिस बिहार में, नरसंहार के दौर चलते थे. वहां लोग-जातियां मिल कर रह रहीं हैं. यह मामूली बदलाव है? क्या इस बदलाव को नकार कर हम लिखें कि बिहार में नरसंहार हो रहा है, जातीय तनाव है, सांप्रदायिक विद्वेष की आग सुलग रही है, तब प्रेस आजाद माना जायेगा? क्या प्रेस की कोई एकाउंटबिलिटी है या नहीं? बात प्रेस से ऊपर की हो रही है. समाज और देश की. इसलिए प्रेस से जुड़ी बातों पर भी, सही-सही चर्चा जरूरी है. प्रेस के दायरे या सीमा से निकल कर राष्ट्रीय सोच-मानस के तहत. प्रेस में काम करनेवालों की क्या एकाउंटबिलिटी है? हम कुछ भी लिखने को स्वतंत्र हैं? भाषाई प्रेस या चैनलों से जुड़े लोगों को बैठा कर, उनकी लिखित परीक्षा करा दें, उनका साक्षात्कार करा दें, हमारी योग्यता परख लें. हमारी योग्यता सार्वजनिक हो जायेगी?

दरअसल, समस्या यह है कि प्रेस में हम अयोग्य-अशिक्षित लोग भी भरे हैं. पता यह करना चाहिए कि हम कितने पत्रकार शुद्ध लिख पाते हैं? कितने लोगों को खबर लिखने आती है? माफ कीजिएगा, इसके लिए दोषी हम प्रेस के लोग नहीं हैं. यह सवाल सिर्र्फ प्रेस का नहीं है. यह समाज, देश और शिक्षा से जुड़ा प्रसंग है. हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षण संस्थाओं ने हमें पंगु और अयोग्य बना दिया है. 40-50 वर्षों में बिहार की शिक्षण संस्थाएं कहां पहुंच गयीं? उनसे निकली उपज कैसी है. हां, पत्रकारों को सिर्फ आप यही कह सकते हैं कि अगर बाइ डिफॉल्ट ही पत्रकारिता के पेशे में आ गये, तो क्या रास्ता है? कौशल, हुनर, योग्यता को मांजना-संवारना, प्रशिक्षण देना. पत्रकारों के इस कौशल को बढ़ाने का सही प्रशिक्षण, आज कितनी जगहों पर चल रहा है?

सच्चाई तो यह है कि व्यवस्था की जटिलता को परखे बगैर, हम पत्रकार व्यवस्था की आलोचना करते हैं. कई बार आधारहीन बातें करते हैं. व्यवस्था चलानेवाले लोग ऐसी रपटों को पढ़ कर उपहास उड़ाते हैं. मानते हैं कि अंगरेजी की पत्रकारिता आज भी अधिक समझदार और टू द प्वाइंट है. जरूरत है कि आज सरकारें या प्रेस परिषद मिल कर क्षेत्रीय पत्रकारिता के लिए प्रशिक्षण का अभियान चलायें. प्रेस इंस्टीट्यूट आफ इंडिया के निदेशक रहे हैं अजीत भट्टाचार्य जी. मशहूर पत्रकार. उनके साथ मिल कर प्रभात

खबर ने झारखंड (तब अविभाजित बिहार) में यह अभियान चलाया था. गांव-देहात और जिले के पत्रकारों को बुलाकर प्रशिक्षित करना. अखबार के डेस्क पर काम करनेवाले या रिपोर्टिंग में लगे लोगों को प्रशिक्षित करना. पत्रकारों में योग्यता और कौशल हों, तो वे और बेहतर काम कर सकेंगे.

….जारी….

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...