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काटजू के बयान पर हरिवंश ने लिखा- बिना सबूत-सुनवाई फैसला (चार)

बिहार बदल रहा है. इस बार बदलते बिहार की पृष्भूमि, टीवी, ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण ने भी तैयार की है. पर बिहार के इस बदलाव के लिए तत्पर मानस को बिहार और इसके शासक दल की राजनीति ने पहचाना और उसे स्वर दिया. यह नब्ज कोई और दल पहचानता, तो सत्ता उसके पास होती. याद है, 2007 के अंतिम वर्ष, अपने सीमित साधनों में प्रभात खबर को बिहार में बदलने की तैयारी में हम साथी लगे थे. बिहार के कुछ इलाकों में यात्रा करने से लोगों का वह मानस समझ में आया, जो मीडिया में रिफ्लेक्ट नहीं हो रहा था. तब हम मीडिया के लोग पुरानी राह पर थे, हर घटना में नकारात्मक तत्व उछालना या उसे बेचने की दृष्टि से सेंसेशनल (सनसनीखेज) बनाना.

बिहार बदल रहा है. इस बार बदलते बिहार की पृष्भूमि, टीवी, ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण ने भी तैयार की है. पर बिहार के इस बदलाव के लिए तत्पर मानस को बिहार और इसके शासक दल की राजनीति ने पहचाना और उसे स्वर दिया. यह नब्ज कोई और दल पहचानता, तो सत्ता उसके पास होती. याद है, 2007 के अंतिम वर्ष, अपने सीमित साधनों में प्रभात खबर को बिहार में बदलने की तैयारी में हम साथी लगे थे. बिहार के कुछ इलाकों में यात्रा करने से लोगों का वह मानस समझ में आया, जो मीडिया में रिफ्लेक्ट नहीं हो रहा था. तब हम मीडिया के लोग पुरानी राह पर थे, हर घटना में नकारात्मक तत्व उछालना या उसे बेचने की दृष्टि से सेंसेशनल (सनसनीखेज) बनाना.

80 के दशक के अंतिम वर्षों में मीडिया में अपना प्रवेश हुआ. उसके पहले के पत्रकारों पर आजादी की लड़ाई के मूल्य, सरोकार और आत्मबंधन थे. आत्मनिमंत्रण और आत्म अनुशासन वगैरह भी. 80 के दशक से, हिंदी इलाकों में यह बंधन टूटा. हम पत्रकार, सिर्फ और सिर्फ नकारात्मक चीजों पर ही नजर रखने लगे. हिंदी राज्यों के (बिहार समेत) बीमारू बने रहने के पीछे यह एक मुख्य कारण यह भी रहा. पर 2007 के अंतिम दिनों में, बिहार घूमते हुए लोगों के मानस में आ रहे बदलाव की झलक मिली. तब प्रभात खबर बिहार का पहला अखबार था, जिसने बिहार में हो रहे सकारात्मक मुद्दों को स्वर देना शुरू किया. आज भी याद है, वे छह-सात बड़ी खबरें, जो सबसे पहले प्रभात खबर में छपीं. एक तरह से पूरी मीडिया में, बिहार में आ रहे सकारात्मक बदलावों की पहली झलक समाज को इन्हीं खबरों से मिली. इसके पहले तो मान्यता यही थी कि सेक्स, क्राइम और सेनसेशन (सनसनीखेज चीजें)  ही बिकते हैं.

नवंबर, 2005 में नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली थी. 2007 में बिहार में थोड़ा बदलाव दिखने लगा. इस बदलाव का सूत्र सबसे पहले प्रभात खबर ने पकड़ा. 2008-09 में सर्विस सेक्टर में ग्रोथ शुरू हुआ था. नये-नये आउटलेट खुल रहे थे. छोटे निवेशकों का आना शुरू हुआ था. पटना शहर में रातों में लोग घूमने लगे थे. यह खबर भी छपी कि अब रातों में महिलाएं कैसे रेस्टूरेंट या अन्य जगहों पर बेधड़क आती-जाती हैं. देर रात तक सड़कों पर चहल-पहल रहती है.

कुछ साथियों में आपसी बहस थी कि यह खबर कैसे है? किसी भी व्यवस्था में, यह सहज जीवन है. जब उन्हें बताया गया या पता चला कि इस सहजता की डोर या लय कैसे टूट गयी थी, रात का जीवन कैद हो गया था, ठहर गया था. पटना स्टेशन से सात बजे के बाद निकलने से लोग परहेज करने लगे थे, तब साथियों को लगा कि पटना शहर की सड़कों पर रात में जीवन लौटना कितनी महत्वपूर्ण खबर है. इस खबर के छपने के बाद अनगिनत पाठकों की मिली प्रतिक्रियाएं भी याद हैं.

प्रभात खबर में उन दिनों छपी कुछ रिपोर्ट की चर्चा करना यहां प्रासंगिक होगा.

22 दिसंबर, 2007 – प्रभात खबर की लीड खबर थी- पटना से तीन गुना बड़ा होगा ग्रेटर पटना, नक्शा तैयार. इसमें बताया गया कि ग्रेटर पटना के लिए मास्टर प्लान को अंतिम रूप दिया गया है. इससे पटना का क्षेत्रफल 114 वर्ग किमी से बढ़ कर 340 वर्ग किमी हो जायेगा. इसमें विस्तार से बताया गया कि नये पटना का स्वरूप क्या होगा.

22 फरवरी, 2009 के अंक में  प्रभात खबर ने लीड खबर छापी. शीर्षक था – मोबाइल पर बात @ 300 करोड़ प्रति/ माह. इसमें बताया गया कि जिस समय दुनिया भर में आर्थिक मंदी के नाम पर खर्च में कटौती हो रही है, बिहार व झारखंड सर्किल में उपभोक्ता मोबाइल पर खूब बातें कर रहे हैं. दोनों राज्यों को मिला कर दस मोबाइल कंपनियां कारोबार कर रही हैं. उपभोक्ताओं की संख्या 1.59 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है. उपभोक्ता तब एक दिन में करीब दस करोड़ रुपये बतियाने में खर्च करते थे. यह बदलते बिहार की कहानी थी.

1 जून, 2009 – के अंक में लीड खबर थी – पटना में जोर पकड़ रहा पानी का कारोबार, पीते हैं 3.5 करोड़ का पानी.  इसमें बताया गया कि पटना में एक माह में बोतलबंद पानी का कारोबार करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये का है. कई कंपनियों ने बिहार में बोतलबंद पानी का प्लांट बैठाया है.

14 दिसंबर, 2009 – के अंक में लीड खबर छपी – पटना में 5500 एकड़ जमीन अधिगृहीत, उद्योगों का जाल. इसमें बताया गया कि साढ़े पांच हजार एकड़ जमीन में उद्योग, अस्पताल, पावर प्लांट या शैक्षणिक संस्थान खोले जा रहे हैं.

नवंबर, 2009 में एक दिन प्रभात खबर की लीड खबर – एजुकेशन हब बनता बिहार. इसमें बताया गया कि बिहार में कौन-कौन से नये शैक्षणिक संस्थान खुल रहे हैं. उसी समय चंद्रगुá प्रबंधन संस्थान, चाणक्य विधि विश्वविद्यालय, निफ्ट का सेंटर आदि खुला था. उनमें पढ़ने के लिए दूसरे राज्यों से छात्र-छात्राएं आने लगे थे. यह बदलते बिहार का आगाज था, क्योंकि इसके पहले तो बिहार के छात्र दूसरे राज्यों में पढ़ाई के लिए जाते थे.

तब मीडिया में बड़े पैमाने पर आलोचना हुई कि क्या ये खबर के विषय हैं. पर प्रभात खबर की दृष्टि साफ थी. अपने कनविक्शन के तहत. जहां भी सकारात्मक बदलाव हो, उसका एहसास भी लोगों को कराना जरूरी है, ताकि उनमें आत्मविश्वास पैदा हो. समाज का आत्मविश्वास लौटे. किसी सरकार या सरकारी अफसर ने नहीं कहा कि बिहार को प्रोत्साहित करना है. उसका अभिनंदन करना है. बिहारियों का हौसला बढ़ाना है. बिहार को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना है. हिंदी इलाकों के मानस की तरह बात-बात पर टांग नहीं खींचना, यह हमारे सोच में है. एक कनविक्शन के तहत. इस तरह प्रभात खबर  ने सबसे पहले बदलते बिहार की खबरों को प्रमुख हेडलाइन बनाना शुरू किया. पाठकों के बीच सर्वे कराया. पाठक जिन खबरों को नकारात्मक, सनसनीखेज, अपराध से जुड़ी मानते थे, उन्हें हमने कम महत्व देकर, बदलाव की खबरों को सुर्खियों में डाला, क्योंकि पाठकों के सुझाव आये कि अपराध की खबरों की जगह बदलाव की खबरों को महत्व या प्राथमिकता दें. क्या सनसनीखेज, आधारहीन और अपुष्ट खबरों को सुर्खियों में छापते रहना ही प्रेस की आजादी है? इस पर समाज में बहस होनी चाहिए.

प्रेस काउंसिल के चेयरमैन ने बिहार में मीडिया को न बोलने देने का आरोप लगाया. इन्होंने माना कि उनका बयान उन्हें मिली सूचनाओं पर आधारित है. वह इस सुझाव से भी सहमत थे कि बिहार में कोई सरकार या सरकारी अधिकारियों के खिलाफ लिख और बोल नहीं सकता. फिर उन्होंने कहा, मुझे यह बताया गया है कि मीडिया को चुप कराने के कई रास्ते हैं. विज्ञापन एक खास समूह को मिल सकता है या किसी मीडिया घराने के मालिक पर यह दबाव बनाया जा सकता है कि जो सरकार के खिलाफ रहे हैं, उनसे मुक्ति मिले.

श्री काटजू उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश रहे हैं. क्या इतने गंभीर आरोप बगैर जांच या संबंधित पक्षों को जाने लगाया जाना चाहिए? किसी राजनीतिक दल की तरह बिना आधार के आरोप लगाये जाने चाहिए? पर्याप्त जांच या सबूत के फैसला हो जाना

चाहिए? बिहार सरकार या बिहार के  अफसरों के खिलाफ न लिखने से क्या तात्पर्य है? क्या बिहार सरकार या इसके बड़े अधिकारी बड़ी-बड़ी गलतियां कर रहे हैं और वे खबरें मीडिया में नहीं आ रही हैं. अगर ऐसा है, तो एक भी ऐसी बड़ी घटना को सार्वजनिक कर बताना चाहिए.

…जारी….

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.

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