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मीडिया पर निगाह रखने के लिए स्‍वंतत्र संस्‍था बने : प्रशांत भूषण

नई दिल्ली। मीडिया शोध जर्नल ‘जन मीडिया’ और ‘मास मीडिया’ का नवान्न (लोकार्पण) करते हुए वरिष्‍ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि मीडिया सभी पर निगाह रखती है, लेकिन अब जरूरत है कि मीडिया पर निगाह रखने के लिए नागरिकों की स्वतंत्र संस्था बने, जो पूरी तरह से स्वतंत्र रहे। उन्होंने कहा कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्थाएं पूरी तरह से नकारा साबित हो गई हैं। जरूरत है कि नागरिक समाज की तरफ से ऐसी संस्था बने जो मीडिया के कामकाज और उसकी खबरों पर नजर रख सके। इस संस्था को कड़े कदम उठाने के अधिकार भी होने चाहिए।

नई दिल्ली। मीडिया शोध जर्नल ‘जन मीडिया’ और ‘मास मीडिया’ का नवान्न (लोकार्पण) करते हुए वरिष्‍ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि मीडिया सभी पर निगाह रखती है, लेकिन अब जरूरत है कि मीडिया पर निगाह रखने के लिए नागरिकों की स्वतंत्र संस्था बने, जो पूरी तरह से स्वतंत्र रहे। उन्होंने कहा कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्थाएं पूरी तरह से नकारा साबित हो गई हैं। जरूरत है कि नागरिक समाज की तरफ से ऐसी संस्था बने जो मीडिया के कामकाज और उसकी खबरों पर नजर रख सके। इस संस्था को कड़े कदम उठाने के अधिकार भी होने चाहिए।

उन्होंने कहा कि मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन कई बार वहां छपने वाली खबरें पूरी तरह से गलत और मनगढंत होती हैं। आतंकवाद के मामले में ऐसा कई बार हुआ है जब पुलिस के वर्जन को ही खबर बनाकर पेश किया जाता है। मीडिया में आतंकवादी करार दिये जाने के बाद कई ऐसे मुस्लिम युवाओं को अदालतों ने निर्दोष करार दिया। प्रशांत भूषण ने मीडिया में और मीडिया पर शोध की जरूरत बताई।

मीडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा प्रकाशित शोध जर्नल ‘जन मीडिया’ और ‘मास मीडिया’ के नवान्न (लोकार्पण) के मौके पर संस्करणों का प्रचलन और प्रभाव के संदर्भ में मीडिया पर शोध की आवश्‍यकता पर आयोजित परिचर्चा में पत्रकार सन्मय प्रकाश ने आगरा के अखबारों के संदर्भों कहा कि संस्करणों के प्रचलन के चलते कई सारी खबरें शहर तक ही दब जाती हैं और उस पर कोई असर नहीं हो पाता है। खबरों का असर अमूमन राजधानियों के संस्करणों से तय होता है। मासिक पत्रिका ‘जनपक्ष’ के संपादक चारू तिवारी ने उत्तराखंड के आंदोलनों का हवाला देते हुए कहा कि संस्करणों के प्रचलन से पहले उत्तराखंड में छोटे अखबार आंदोलनों की आवाज हुआ करते थे। पहाड़ों में चले शराबबंदी और पेड़ बचाओ आंदोलनों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उस समय अबखारों ने लोगों को जोड़ने का काम किया।

चारू तिवारी ने आज के अखबारों की चर्चा करते हुए कहा कि अबके अखबारों ने लोगों को बांटा है। अलग-अलग संस्करणों के होने से एक जगह की खबर दूसरे जगह नहीं पहुंच पाती। भारतीय जन संचार संस्थान में एसोसिएट प्रोफेसर आनंद प्रधान ने कहा कि अभी तक मीडिया में शोध का जो प्रचलन रहा है वो बाजार केंद्रित रहा है। टैम और रीडरशिप सर्वे अखबारों के लिए बाजार पैदा करने की जरूरत के चलते होते हैं। उन्होंने गैस, परमाणु उर्जा के लिए मीडिया लॉबिंग का हवाला देते हुए कहा कि इन सब को उजागर करने के लिए मीडिया पर शोध की सख्त जरूरत है। दैनिक भास्कर के समूह संपादक रहे श्रवण गर्ग ने मीडिया पर दलाली और बाजारू होने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पत्रकारों के पास खबर की पुष्ठि करने के लिए इतना समय नहीं होता। उन्होंने संस्करणों का बचाव करते हुए कहा कि अगर हर जगह की खबरों को एक ही अखबार में शामिल करेंगे तो 200 पेजों का अखबार निकालना होगा। उन्होंने कहा कि अखबार पूंजीपति या सरकार ही निकाल सकते हैं, सिविल सोसायटी अखबार नहीं चला सकती।

इससे पहले शोध जर्नल का परिचय कराते हुए इसके संपादक अनिल चमड़िया ने कहा कि हमने भारतीय भाषाओं शोध को उभारने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि संस्करणों का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ रहा है जिस पर गंभीर शोध की आवश्‍यकता है। परिचर्चा का संचालन वरिष्‍ठ पत्रकार जसपाल सिंह सिद्धू ने किया। इस परिचर्चा में कई सारे पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और छात्रों ने हिस्सा लिया। प्रेस रिलीज

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