: प्रदेश में पहली बार देखी जा रही है इस तरह की होड़ : लखनऊ। प्रदेश के एक दर्जन वरिष्ठ पत्रकार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जीवनी पर किताब लिखने को आतुर हैं। इसके लिए कई उनसे मुलाकात भी कर चुके हैं। इसमें एक महिला पत्रकार भी हैं। वैसे मुख्यमंत्री ने इनमें से किसी को अभी तक हरी झंडी नहीं दी है। इसलिए इस होड़ में और लोगों के भी शामिल होने की उम्मीद है।
वैसे पुस्तक वर्तमान मुख्यमंत्री के पिता मुलायम सिंह यादव पर लिखी गई है। एक नहीं, चार पुस्तकें। एक वरिष्ठ पत्रकार की पुस्तक को छोड़ दिया जाए तो उन पर पुस्तक लिखने वाले रहे हैं, सर्वश्री रजनीकांत वर्मा, राम सिंह और अंशुमान यादव। इन सभी की पहचान पत्रकार के रूप में नहीं, समाजवादी रचनाकार व समाजवादी योद्धा की रही है। सपा और सायकिल के पक्ष में एक दो नहीं, कई-कई गीत लिखने वाले सांसद और वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रताप की भी पहचान राजनीतिज्ञ और साहित्यकार के रूप में ही रही है।
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी पर भी पुस्तक लिखने वाली महिला की पहचान भी किसी पत्रकार के रूप में नहीं थी। उत्तर प्रदेश में पत्रकार की पहचान रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह की जीवनी पर पुस्तक लिखने का बीड़ा उठाया। अफसोस यह पुस्तक अधूरी रह गई। वैसे मध्यप्रदेश में कई पत्रकारों ने मुख्यमंत्री पर किताबें लिखी हैं। इससे हुए लाभ भी वहां सार्वजनिक हैं। इसलिए वहां इस तरह की होड़ लगी रहती है। उत्तर प्रदेश में इस तरह की होड़ ….।
इसकी चर्चा करने पर एक सज्जन लाल हो गए। उन्होंने उत्तर के रूप में दनादन प्रश्नों की बौछार कर दी कि बता दूं कि मुख्यमंत्री के सिफारिश पर किसने-किसने नियुक्ति पायी है। किसने-किसने क्या लाभ पाए हैं? किस-किस पत्रकार ने स्कूल कालेज खोल रखे हैं? और कौन क्या क्या करता है? अदृश्य प्रश्नों और उत्तरों को छोड़िए। आइए चर्चा करें कि मुख्यमंत्री पर पुस्तक लिखने के लाभ क्या हैं? नंबर एक में संदेश जाता है कि मुख्यमंत्री के करीबी हैं। इससे वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त
के दिखाए रास्ते पर चलने का रास्ता खुलने लगता है। प्रदेश के अधिकारियों में दबदबा बढ़ता है जिससे आर्थिक समाजसेवा के नजरिए से किए जाने वाले छोटे-मोटे काम आसानी से हो जाते हैं। सामान्य तौर पर इस तरह की किताबे सरकारी पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाती हैं। इनका प्रकाशन और वितरण सरकारी देख रेख में होता है।
हो सकता है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर पुस्तक लिखने को बेताब पत्रकार ऐसे न हों। उनका इरादा भी पवित्र हो और वे अपने खर्च से पुस्तक प्रकाशित कराने की नीयत भी रखते हों पर किसी की जीवनी लिखनी के लिए उसके साथ लगातार रहने का कुछ बरस का अनुभव तो होना ही चाहिए जो इनमें से किसी का नहीं है। आमतौर पर वर्तमान मुख्यमंत्री अभी भी शालीनता नहीं भूले हैं। इस बड़े पद पर होने के बाद भी वह विनयी मुद्रा में दिखते हैं। वह राग दरबारियों से दूर रहते हैं। एक तथाकथित प्रवक्ता इसके लिए निष्कासन भी झेल चुके हैं। वे भले न जानते हों, उनके पिता तो इन मुख्यमंत्री विशेषज्ञों को जानते ही हैं। इसलिए जीवनी लिखने की अनुमति पाना भी आसान नहीं है। वैसे इसे एकदम से नकारा भी नहीं जा सकता क्योंकि प्रभुता पाय काहि मद नाही।
वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र श्रीवास्तव की रिपोर्ट.





