प्लेट में रखा बिस्कुट उसने हाथ में उठा लिया। बातचीत को जारी रखते बिस्कुट को उसने चाय में डुबाया और धीरे से देखा कि बैठे हुए लोगों के चेहरे पर क्या भाव आते हैं। सभी की आंखें एक दूसरे से टकराई। मोहतरमा ने हंसते हुए कहा कि मुझे चाय में डुबोकर बिस्कुट खाना अच्छा लगता है। मैं इस बहाने अपने बचपन की यादें ताजा कर लेती हूं। यूं ही चाय में बिस्कुट को डुबाकर खाने वाली कोई और नहीं, विश्व की सबसे युवा नोबल पुरुस्कार विजेता व यमन की लौह युवती तवाकुल अबदेल सलम कारमान है।
चाय के प्याले में तूफान खड़ा कर यमन के भ्रष्टाचारी और दमनकारी सत्ताधारियों से उनके पद से उखाड़ फेंकने का काम इस 33 साल की युवती, जिसे यमन की जनता ‘क्रांति की जननी' कहते हैं, ने किया है। तवाकुल ने कभी महात्मा गांधी को देखा तो नहीं, लेकिन सही मायने में उन्होंने महात्मा को समझा है। बंदूक का जवाब फूलों से दे कर उसने यमन की धरती पर ‘जास्मीन आंदोलन' को जन्म दिया, जो महात्मा गांधी के अहिंसा के मार्ग पर चला और तवाकुल ने यमन को दमनकारियों से चंगुल से मुक्ति दिलाई।
अवाम ए हिंद से विषेश बातचीत के दैरान तवाकुल ने भारत में पहली बार आने पर कहा ‘मैं अपने पिता के देश में पहली बार आई हू‘। भारत मेरे पिता की भूमि है, क्योंकि मोहनदास करमचंद गांधी जिसे पूरा भारत पिता कहता है, वह हमारे यमन के भी राष्ट्रपिता हैं। हमने यमन में जो भी हासिल किया है, वह बापू के अहिंसा के
मार्ग पर चलकर ही पाया है। हाल ही में यमन पर अमेरिकियों द्वारा किए गए ड्रोन हमले में कई लोग मारे गए। क्या अमेरिकियों का यमन पर बम बरसाना सही है? यह पूछने पर तवाकुल ने कहा कि मैं इस बात को मानती हूं कि बमों और हथियारों से आप अलकायदा को खत्म नहीं कर सकते। यमन की जमीं पर जो भी अलकायदा के लोग सक्रिय हैं, उन्हें यमन की जनता ही खत्म कर सकती है और वह उनका अधिकार भी है। लेकिन आतंकवादियों को मार गिराकर नहीं, उनकी सोच में बदलाव लाकर। आखिर वे भी इंसान हैं। अगर आज हमारे साथ जुडे़ यमन के युवा भ्रष्टाचार को मिटाने और मानव अधिकारों के संरक्षण की बात करते हैं तो वह अलकायदा की सोच को मिटाने का काम भी बड़ी आसानी से कर सकते हैं।
तवाकुल ने यमन के पूर्व राष्ट्राध्यक्ष अली अबदुल्ला सालेह को यमन की धरती को आतंकवादियों की शरण स्थली बनने के लिए जिम्मेदार ठहराया। तवाकुल ने आरोप लगाए कि सालेह ने आतंकियों से धन लेकर उन्हें यमन मे पनपने दिया तो उन्हीं आतंकियों को ढूंढनेवालों से पैसा ले कर आतंकियों का मार गिरा रहे थे। तवाकुल ने कहा कि अब सालेह की सत्ता खत्म हो गई है, लेकिन देश को सही मार्ग पर आने के लिए थोड़ा समय लगेगा।
इतने कम उम्र में तवाकुल ने क्रांति की मशाल उठाई? इस पर वह बोलीं कि बचपन से ही उन्होने अपने पिता को सच्चाई के लिए और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते देखा। उनके पिता अबदेल सलाम कारमान जाने-माने वकील थे। वह न्यायाधीश और देश के कानून मंत्री भी बने। लेकिन तवाकुल को याद है तो उनका गलत कामों के लिए मना करना और सत्ताधीशो के सामने झुकने की बजाय इस्तीफा दे देना। ऐसे माहौल में तो क्रांति की जननी ही आकार लेगी। वाणिज्य में स्नातक करने के बाद राजनीतिक विज्ञान में उन्होंने स्नातकोत्तर की पढाई पूरी की। राजनीतिक विषयों पर लेख लिखते-लिखते उन्होंने पत्रकारिता का चोला पहन लिया। और जब देखा कि प्रजातंत्र के इस चैथे खंभे को नष्ट करने के लिए सरकार नए-नए हथखंडे अपना रही है तो साल 2005 में तवाकुल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए महिला पत्रकारों का एक आंदोलन खड़ा किया ‘वुमेन जर्नालिस्ट विदाउट चेन‘। पहले लोगों ने इस आंदोलन का मजाक बनाया, लेकिन धीरे-धीरे लोग इससे जुड़ते चले गए और यह आंदोलन एक ज्वालामुखी बन गया। सरकार ने इसके दमन के लिए कई हथकंडे अपनाए। तवाकुल पर हमले किए गए, उन्हें धमकियां दी गईं, यहां तक कि सरकारी प्रसार माध्यमों से उनके चरित्र पर कीचड़ तक उछाला गया, उनके परिवार को अगुवा कर समाप्त करने की बातें होने लगीं, लेकिन तवाकुल अपने इरादों पर अटल रहीं।
जब तवाकुल से पुछा कि एक महिला होने बावजूद वह इतने संकटों से कैसे जूझ र्पाइं तो तपाक से जवाब आया महिला होने के वजह से ही। उनका महीला होना ही उनकी ताकद था। वह कहती हैं कि महिला को कभी भी अपने आप को समस्या नहीं समझना चाहिए। उसे अपने आप को समस्या का निदान समझाना चाहिए। वह एक पुत्री हैं, पत्नी हैं, मां हैं। तवाकुल ने कहा कि वह इन सभी पात्रों को जब जीती हैं तो अपने आप को अधिक उर्जावान महसूस करती हैं। वह पूरे यमन की बेटी हैं, मा हैं, बहन हैं। जब पूरा देश ही आपका अपना है तो उसके लिए काम करते हुए मौत भी आए तो क्या गम।
जब उनके संघर्ष मे आए कुछ रुकावटों या संकटों पर बात करनी चाही तो उनका जवाब था-‘सही मे मुझे संकटों के बारे मे कुछ भी याद नहीं। मैं हमेशा अपने लक्ष्य को देखती हूं। मूझे कुछ और नजर ही नहीं आता। जब आप की नजर किसी लक्ष्य पर होती है तो आपको भी महसूस होगा कि रुकावटें या संकट तो होते ही नहीं। अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने परिवार को देते हुए तवाकुल ने कहा कि मेरे पिता ने तो मुझे पूरी आजादी दी थी, लेकिन जब मेरी शादी तय हुई तो पति के सामने उन्होंने यह शर्त रखी थी कि मैं सार्वजनिक जीवन में अपना काम जारी रखूंगी और मुझे इस बात पर गर्व है कि मेरे पति मोहम्मद अल महमी, जो गणित के शिक्षक व मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, ने मुझे पूरा साथ दिया। आप नहीं समझ सकते कि यमन जैसे देश में जब एक मुसलमान प्रेस के सामने यह कहता है कि उसके पत्नी का अपहरण हो गया है तो उस पर क्या बीतती है। लेकिन उन्होंने बड़े धैर्य के साथ यह सब किया, मुझे उन पर गर्व है।
तवाकुल खुद नकाब नहीं पहनतीं, लेकिन वह हिजाब पहनती हैं। जब इस पर उनसे सवाल किया गया तो उनका जवाब था कि नकाब के खिलाफ नहीं हैं। हां, लेकिन वह इस बात को भी नहीं मानतीं नकाब या हिजाब ने पहनने से इस्लाम की तौहीन होती है। तवाकुल की राय है कि यह धर्म की नहीं, व्यक्तिगत पसंद की बात है। अगर किसी को नकाब पहनना अच्छा लगता है तो उसे गलत कहने का किसी को अधिकार नहीं और अगर कोई न पहनना चाहता हो तो उसपर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। हजारों साल पहले जब मानव गुफा में रह रहा था, तब तो वह कपड़े ही नहीं पहनता था। समय के साथ मानव ने प्रगति की और कपड़ो का प्रयोग होने लगा। तवाकुल के अनुसार हिजाब पहनना यह उनके लिए प्रगतिशीलता का परिचय है।
धर्म पर बात करते हुए तवाकुल ने कहा कि दुनिया में ऐसा कोइ धर्म नहीं जो हिंसो, मानव अधिकारों के हनन और हैवानियत को बढ़ावा देता हो। सभी धर्म भाईचारा और प्रेम की ही बात करते हैं। लेकिन हर धर्म में कुछ लोग होते हैं, जो धर्म को गलत परिभाषित कर कट्टरता को बढ़ावा देते है। हमें उनकी मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत है। और इसी बात चीज के लिए आज पूरी दुनिया बड़े आदर के साथ भारत की ओर देखता है, क्योंकि इतनी सारी भिन्नता के बावजूद देश एक है। इतने सारे धर्म, भाषाएं और संस्कृतियों के साथ भी भारत की एकता और अखंडता विश्व के लिए रोल माडल है।
33 साल की उम्र में सफल क्रांति कर यमन को पुर्नजीवित किया। शांति के लिए नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। विश्व के कई बडे़ पुरस्कार उनके कार्यालय की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसके बाद क्या ? क्या वह यमन का नेतृत्व करना चाहेंगी ? तवाकुल ने बडे सादगी से कहा कि यमन के इतिहास में दो रानियों ने जबरदस्त योगदान का जिक्र है, एक थी रानी बिल्कीस और दूसरी अर्वा। यमन की जनता मुझे इन्हीं रूपों मे देखती है। यमन की जनता तो मुझे इस बार ही सत्ता सौपने को तैयार थी। पूरा यमन चाहता है कि मैं सरकार का हिस्सा बनूं, लेकिन मेरी अपनी व्यक्तिगत राय यह है कि मुझे सरकार के बाहर रह कर ही काम करना है। मेरी लड़ाई यमन तक ही
सीमित नहीं है। यमन अब इस वैश्विक गांव का छोटा सा कस्बा है। अब मैं विश्व की नागरिक हूं, पृथ्वी मेरी मातृभूमि है और मानवता मेरा राष्ट्र है।
लेखक अशोक वानखड़े वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं.
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