जवाहर लाल राठौड़ : 65 साल का नाता रहा है नईदुनिया से. कहा कि ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी कि इतना पुराना अखबार बेच देना पड़ा. उन्होंने बताया कि यह नईदुनिया की दूसरी बिक्री है, पहले कृष्ण चन्द्र मुग्दल इसके प्रकाशक थे और कृष्णकांत व्यास इसके संपादक थे. ३० सितम्बर १९४७ को बिक गया था. पांच जून १९४७ को ही यह अखबार शुरू हुआ था. इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है, इतना बड़ा इम्पायर ढह गया. पाठकों का विश्वास क्यों नहीं लिया गया?
अब नईदुनिया का विस्तार जागरण करेगा? अब तक तो नईदुनिया ही सबका विस्तार करता था. नईदुनिया हमेशा अग्रणी रहता था. स्वामित्व का परिवर्तन कितने करोड़ या अरब में हुआ इसकी कोई जानकारी पाठकों को नहीं दी गयी. नईदुनिया ने पाठकों का विश्वास तोडा था. इन्होंने व्यापारी जैसा बेचा, उन्होंने व्यापारी जैसा खरीद लिया है. मेरी शिकायत नईदुनिया के अभय छजलानी से है, वे अपनी समस्या बताते तो शायद जनता खुद आगे आती क्योंकि नईदुनिया तो जनता की धरोहर है. इसकी गुडविल बनाने के लिए असंख्य पत्रकारों ने कड़ी मेहनत की.
उमेश त्रिवेदी (पूर्व ग्रुप एडिटर, नईदुनिया) : यह बात गले नहीं उतर रही है. एक विरासत, जिसे हमने दशकों तक जिया, उस विरासत के कारण हम कई काम कर पाए. उस विरासत के भविष्य के बारे में सोचकर ही दर लगता है. राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते जैसे संपादकों ने खून पसीना बहाकर नईदुनिया स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म कहलाने वाले नईदुनिया की स्थापना की थी. इसके पत्रकारों ने आकाश को छुआ, हिंदी पत्रकारिता को यह सम्मान नईदुनिया ने ही दिया. इस सौदे में हमसे कोई राय नहीं ली गयी. यह मैनेजमेंट का फैसला था. हमारी राय तो यही है कि हम इसे चला सकते थे. हमें इस बारे में कभी नहीं बताया गया, यह सब परदे के पीछे हुआ. हमें अभी भी कुछ नहीं बताया गया. यही कहा गया कि नईदुनिया के हित में ही काम होगा.
प्रो. सरोज कुमार (कवि, नईदुनिया के पूर्व साहित्य संपादक) : अगर यह खबर ३० साल पहले आती तो भूकंप आ जाता, १५ साल पहले आती तो हडकंप मच जाता, लेकिन आज तो ठेस लग रही है, पर आज वो प्रभाव नहीं है, क्योंकि धीरे-धीरे पत्रकारिता में जो व्यावसायिकता आयी, उसके सब ख़त्म हो गया. अब खबर के प्रति नजरिया बदल गया है. जागरण का एक ग्रुप यहाँ आकर फ्लाप हो चुका है. विरासत का इस तरह का हस्तांतरण ठेस पहुंचाने वाला है. नईदुनिया ने एक इतिहास बनाया है. यहाँ खेलों के लिए बहुत काम किया है.
प्रवीण खारीवाल (अध्यक्ष, इंदौर प्रेस क्लब) : मौत ने घर देख लिया है. नईदुनिया ने रिलायंस से धन ले रखा था तो लौटना तो था ही, अब जिन लोगों को हटाया जा रहा है, इसकी जगह उन लोगों को हटाया जाना था, जिनके कारण यह अखबार बिकने की नौबत आई.
जीवन साहू (वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व अध्यक्ष, इंदौर प्रेस क्लब) : नईदुनिया का बिकना हमारी पीढ़ी के लोगों को अच्छा नहीं लगा… नईदुनिया के प्रकाशक नरेन्द्र तिवारी कहते थे कि इस अखबार के असली मालिक इसके पाठक हैं. अब नईदुनिया की आत्मा ही ख़त्म हो गई अब यह केवल खोखा रह गया.
कॉमरेड मनोहर लिम्बोदिया (वरिष्ठ पत्रकार) : 1960, 1970 और 1980 का दशक नईदुनिया का ही दशक था. और उस दौरान उसने इस शहर को चलाया, बड़ी दादागीरी से चलाया था, किसी की नहीं चलने दी थी, पर जब भास्कर आया तब नई सोच सामने आयी. पहले कोई भी मुख्यमंत्री बनता था तो सबसे पहले नईदुनिया को धोक देने (चरण वंदना के लिए जाता था और वे इतनी सी बात पर इतराते थे. जबकि यह छोटी सी बात थी. अब जो यह अखबार बिका है, इसके लिए ज़िम्मेदार बाद की पीढ़ी के विनय छाजनाली ही है.) जाता था.
भानु चौबे (पूर्व संयुक्त संपादक, नईदुनिया) : नईदुनिया एक सोच थी, एक विचार था, सच को सच कहने की ताकत थी. एक प्रवाह था. घोड़ा कितना भी अच्छी नस्ल का हो, मज़बूत हो, उसे एक अच्छे घुड़सवार की ज़रूरत हमेशा रहती है.
सुरजीत सिंह (पूर्व एडी. डीजीपी और लाभचंद छजनाली के मित्र) : गरीब लोगों के बच्चे बेचने की खबरें ज़रूर सुनी हैं लेकिन यहाँ तो लोगों ने अपने बाप दादा को ही बेच डाला. ये लोग (दारू) नहीं पीते, (मांस मच्छी) नहीं खाते, फिर क्या ज़रुरत पड़ी? पाठकों को असलियत बताते तो वे ही कोई अभियान चलाकर मदद कर डालते. हम पाठकों को बताते तो इनको चंदा करके दे देते. ये तो इन्होंने कोई अक्लमंदी नहीं की.
नईदुनिया के बिक जाने की खबर को लेकर डीजी न्यूज ने प्रोग्राम चलाया, जिसे इन लिंकों पर क्लिक करके देखा जा सकता है.
http://bhadas4media.com/video/viewvideo/583/media-world/pakage-naidunia-02-3april-mpg.html
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