जनसंदेश चैनल नाम सुनते ही बसपा का नजदीकी चैनल होने की बात लोगों के जेहन में आ जाती थी. बसपा शासनकाल में यह चैनल बढि़या चला. छोटे सेटअप के बावजूद सब कुछ ठीक ठाक रहा. हालांकि इसके मालिकान को लेकर भी कई तरह की बातें होती रहीं. कभी इसे बसपा के कद्दावर नेता रहे बाबू लाल कुशवाहा का चैनल बताया गया तो कभी उनके खास सहयोगी रहे रामचंद्र प्रधान का. इन सब के बावजूद यह चैनल पिछले तीन सालों से अच्छा चल रहा था.
परन्तु बाबूलाल कुशवाहा एंड कंपनी के एनआरएचएम घोटाले के चपेट में आते ही जनसंदेश चैनल की मुश्किलें बढ़ गईं. सरकार जाने के बाद तो इसके हालात और खराब हो गए हैं. चैनल का नाम भी बदला गया परन्तु मुश्किलें कम नहीं हुई हैं. आर्थिक दुश्वारियों ने इस चैनल को अंदर तक हिलाकर रख दिया है. पहले इस चैनल का नाम जनसंदेश से जनसंदेश प्लस किया गया, फिर भी इसकी नियति नहीं बदली. फिर इसका नाम बदलकर न्यूज टाइम कर दिया गया, इसके बाद भी चैनल की परेशानियां कम नहीं हुई हैं.
बताया जा रहा है कि अब यह चैनल बंद होने के कगार पर पहुंच चुका है. बाबूलाल कुशवाहा और उनके नजदीकी सौरभ जैन के अंदर जाने के बाद चैनल की आर्थिक दिक्कतें और अधिक खराब हो गई हैं. पैसा का जुगाड़ कर पाना प्रबंधन के टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. चैनल के जल्द ही बंद होने की चर्चाएं और गॉसिप भी शुरू हो चुकी हैं. फेसबुक पर भी इस चैनल को लेकर कई तरह की बातें चल रही हैं. पिछले कुछ दिनों दो दर्जन लोगों का चैनल से जाना इस बात को और अधिक बल देता है.
हालांकि इस संदर्भ में जब चैनल हेड सैयदेन जैदी से बात की गई तो उनका साफ कहना है कि यह सब अफवाह है. चैनल के नाम बदले जाने को भी वो एक सामान्य प्रक्रिया बताते हैं. जब उनसे पूछा गया कि कई कर्मचारियों को क्यों हटाया गया तो उन्होंने कहा कि किसी को चैनल से हटाया नहीं गया है. जिनका जहां मौका मिल रहा है जा रहा है. हम किसी को रोक नहीं रहे हैं. पर दूसरे तरफ सवाल उठाने वालों का कहना है कि यह संभव ही नहीं है कि डेढ़ से दो दर्जन लोगों को एक साथ कहीं मौका मिल जाए.
फेसबुक पर तो भास्कर के पत्रकार दिलनवाज पाशा ने चैनल को लेकर एक पोस्ट लिखा है – क्या मीडिया में भी दो नंबर का पैसा लगा होता है? टीवी चैनल जन संदेश के बंद होने की खबरों से तो ऐसा ही लगता है। यूपी में मायावती की सरकार थी तो चैनल खूब चल रहा था। कर्मचारियों को सैलरी भी मिल रही थी…। लेकिन अब खबर है कि चैनल से कर्मचारियों को निकाला जा रहा है। और जल्द है यह चैनल बंद भी हो सकता है।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल यह है कि दो नंबर के पैसे से चलने वाला मीडिया क्या कभी सच कह पाएगा….।। मायावती के शासन के दौरान उत्तर प्रदेश में वसूली संगठित अपराध हो गई। हर सरकारी काम के रेट फिक्स कर दिए गए। इसका बडा़ हिस्सा सरकार के पास पहुंचता था…. वसूली का पैसा आ रहा था तो धंधे भी चल रहे थे। अब सत्ता गई तो पैसा का रूख दूसरी पार्टी की ओर हो गया….फिर चैनल कैसे चले? (यहां मैं यह नहीं कह रहा हूं कि राज्य में वसूली रुक गई है। कल जब ऑफिस आ रहा था तो अपनी आंखों से देखा नोयडा पुलिस की पीसीआर को ठेले वालों से सौ-सौ पांच-पांच सौ लेते हुए)





