खुद पत्रकारिता से जुड़ा होने के बावजूद ये कहने को मजबूर हो गया हूं, आसिफ अली ज़रदारी भारत क्या आये, मानो भारतीय इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को 24 घंटे का मसाला मिल गया. दुखद है ज़रदारी का प्लेन लैंड हुआ, ज़रदारी गाड़ी में बैठकर निकल गये, ज़रदारी का काफिला यहां पहुंचा, ज़रदारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के यहां लंच के लिए पहुंच गये, मानो देश की धरती पर कोई चमत्कार हो गया हो, आखिर मीडिया ये कैसे भूल गया कि ज़रदारी आने से पहले ही सबसे अहम मुद्दे पर प्रधानमंत्री से बातचीत करने के लिए मना कर चुके हैं.
26/11 के मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान सरकार का रवैया पूरे देश की जनता ने देखा किस तरीके से एक एक सुबूत ये चीख चीखकर कहते रहे कि पाकिस्तान की सरज़मी पर बैठकर आईएसआई की रणनीति के तहत हाफिज़ सईद ने मुंबई हमले की साज़िश रची लेकिन पाकिस्तान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, और आज करीब साढ़े तीन साल बात उसी पाकिस्तान के सरपरस्त भारत की सरज़मी पर आए तो मीडिया ने उसे एक चमत्कार बना दिया. किसी ने भी डंके की चोट पर ये बात नहीं उठाई कि आखिर उस देश के राष्ट्रपति की आवभगत में क्यों लगी है भारत सरकार, जिसने हमारे देश में हुए कत्लेआम के ज़िम्मेदार को पनाह दे रखी है.
हां बैलेंस बनाए रखने के लिए बीच बीच में टिकर पर या स्क्रॉल पर ये बात ज़रुर फ्लैश की जाती रही, लेकिन उसके साथ ही बिलावल भुट्टो ज़रदारी और राहुल गांधी ने किस देश की कौन सी यूनिवर्सिटी में तालीम ली है, ये बात भी बार-बार न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित होती रही. कुछ चैनलों ने तो राहुल गांधी को भारत का युवराज और बिलावल भुट्टो को पाकिस्तान का युवराज तक घोषित कर दिया. सबसे बड़ी समझ की बात तो यही कि ना तो राहुल गांधी भारत के युवराज हैं और ना ही बिलावल भुट्टो पाकिस्तान के युवराज हैं. ज़रदारी की खबर को लेकर न्यूज़ चैनल इस कदर बौरा गये कि ये तक भूल बैठे कि भारत और पाकिस्तान में राजतंत्र नहीं है लोकतंत्र है. और लोकतंत्र में देश में ना राजा होता है और ना युवराज.
एक टीवी चैनल पर तो पाकिस्तान के मशहूर टीवी चैनल के संपादक लाइव थे और माननीय हाफिज़ सईद साहब की शान में कल्में पढ़े जा रहे थे, “हाफिज़ सईद साहब सिस्टम के खिलाफ हैं हाफिज़ सईद साहब ये हैं हाफिज़ सईद साहब वो हैं”, उस पर भारत के दो-तीन तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार उनसे ज्ञान लेने देने में जुटे थे. अरे सौ बातों की एक बात हाफिज़ सईद मुंबई हमलों का दोषी है, उसको एक भारतीय चैनल पर जिस तरीके से इज़्जत बख्शी जा रही थी उसे देखकर तो ऐसा लग रहा था कि मानो हाफिज़ सईद आतंकवादी ना हो, एक समाजसेवी हो. पाकिस्तान के सम्मानित पत्रकार ने तो हाफिज़ सईद की शान में यहां तक कह डाला कि आपके यहां भी तो कर्नल पुरोहित जैसे लोग हैं.
अरे, कर्नल पुरोहित ने जो किया वो गलत था उसे कतई स्वाकारा नहीं जा सकता और उसकी बदौलत वो आज सलाखों के पीछे है, लेकिन माननीय हाफिज़ सईद साहब (बकौल पाकिस्तानी पत्रकार) खुलेआम पाकिस्तान में रैलियां कर रहा है, लोगों की भीड़ उसकी रैलियों में जुट रही हैं और पाकिस्तान की पुलिस उसकी रैलियों में बंदोबस्त में जुटी रहती है. उधर अमेरिका कहता है कि हाफिज़ सईद पर 51 करोड़ का ईनाम. ये सब ड्रामा नहीं तो और क्या है? भारत देश का सच्चा और भोला भाला नागरिक इन
तमाम कूटनीतियों को नहीं समझता, वो तो बस ये चाहता है कि भारत का गुनाहगार भारत में ही सलाखों के पीछे हो, वो भी जल्द से जल्द, लेकिन देश के जिस तबके से उसे सबसे ज्यादा उम्मीदें हैं वो तबका तो कुछ और ही रोल अदा कर रहा है.
लेखक शगुन त्यागी सहारा समय चैनल के साथ लम्बे समय तक जुड़े रहे हैं. वे इन दिनों नॉर्थ ईस्ट बिजनेस रिपोर्टर मैग्जीन के दिल्ली-एनसीआर ब्यूरोचीफ के तौर पर जुड़े हुए हैं. सगुन से संपर्क मोबाइल नम्बर 07838246333 के जरिए किया जा सकता है.





