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गोंडा के अदम गोंडवी के जाने के बाद अब ब्रजभूषण लाल चले गए

वामपंथी संस्कृतिकर्मी व राजनीतिक कार्यकर्ता ब्रजभूषण लाल नहीं रहे। बीते रविवार 8 अप्रैल 2012 को लखनऊ में उनका निधन हो गया। वे पिछले काफी अरसे से हृदय रोग से पीड़ित थे। इलाज के लिए उन्हें गोण्डा से लखनऊ लाया गया था। पिछले साल दिसम्बर में गोण्डा से अदम गोण्डवी को बीमारी की गंभीर हालत में लखनऊ लाया गया था। उन्हें भी नहीं बचाया जा सका और अन्त में उनके पार्थिव शरीर को नम आंखों से लखनऊ से गोण्डा के लिए विदा किया गया। ब्रजभूषण लाल के साथ भी यही कहानी दोहराई गई।

वामपंथी संस्कृतिकर्मी व राजनीतिक कार्यकर्ता ब्रजभूषण लाल नहीं रहे। बीते रविवार 8 अप्रैल 2012 को लखनऊ में उनका निधन हो गया। वे पिछले काफी अरसे से हृदय रोग से पीड़ित थे। इलाज के लिए उन्हें गोण्डा से लखनऊ लाया गया था। पिछले साल दिसम्बर में गोण्डा से अदम गोण्डवी को बीमारी की गंभीर हालत में लखनऊ लाया गया था। उन्हें भी नहीं बचाया जा सका और अन्त में उनके पार्थिव शरीर को नम आंखों से लखनऊ से गोण्डा के लिए विदा किया गया। ब्रजभूषण लाल के साथ भी यही कहानी दोहराई गई।

यह संयोग हो सकता है लेकिन ब्रजभूषण लाल और अदम की समानता कोई संयोग नहीं है। ये एक ही धारा के संस्कृतिकर्मी रहे हैं। ये दोनों गोण्डा में और देश में बगावत व बदलाव के आंदोलन के सांस्कृतिक नायक थे और ये दोनों ‘पहचान’ के संस्थापकों में थे जिनका उद्देश्य एक बेहतर व बराबरी के समाज का निर्माण करना था। इन्होंने अपना जीवन और संस्कृतिकर्म इसी को समर्पित किया था।

ब्रजभूषण लाल गोण्डा के लालापुरवा, मसैली, भोकलपुर के रहने वाले थे। निधन के समय उनकी उम्र 72 साल थी। ब्रजभूषण लाल हम साथयों के बीच ‘लाल साहब’ के नाम से मशहूर थे। छात्र जीवन से ही वामपंथी आंदोलन से उनका गहरा रिश्ता बन गया था जो समय के साथ और प्रगाढ़ होता गया। जीवन के अन्तिम दिनों तक उन्होंने वामपंथ की क्रान्तिकारी धारा के परचम को बुलन्द रखा। वे गोण्डा में सी पी आई ;एमएलद्ध तथा इंडियन पीपुल्स फ्रंट के संस्थापकों में थे। उनके लिए संस्कृतिकर्म राजनीतिक काम का अभिन्न हिस्सा था।

लाल साहब ने हिन्दी साहित्य में एम ए किया। हिन्दी साहित्य में शोध भी किया। वे गोण्डा के शास्त्री महाविद्यालय से अध्यापन कार्य शुरू किया और यहीं से वे सेवा मुक्त भी हुए। उन्होंने अदम गोण्डवी, नारायणजी शुक्ल, श्याम अंकुरम, कृष्णकांत, एस पी मिश्र, प्रकाश श्रीवास्तव, चन्द्रप्रकाश, जमाल अहमद, रमाऔतार आदि को संगठित करते हुए गोण्डा में ‘पहचान’ सांस्कृतिक संगठन का गठन किया। उनकी खूबी थी कि वे अपने नाम को हमेशा पीछे रखते थे और अदम जैसे रचनाकार को हमेशा आगे।

वामपंथी राजनीति व विचार को जनता तक पहुँचाने तथा जन चेतना के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से लालसाहब ने ‘कामधेनु’ नुक्कड़ नाटक के करीब 500 से अधिक मंचन किये। राजनीतिक सच का पर्दाफाश करता 1980 के दशक में यह अत्यन्त चर्चित नाटकों में था। इस नाटक में लाल साहब की प्रभावशाली भूमिका तथा उनका ‘दरोगा’ के अभिनय को लोग आज भी याद करते हैं। इस नाटक में उनका अभिनय उनके अन्दर की कला क्षमता को सामने लाता है। इसी क्षमता का दर्शन अवधी तथा हिन्दी में लिखी उनकी कविताओं में भी हमें देखने को मिलता है। ‘जन संस्कृति’ में छपी उनकी कविता अस्सी के दशक में गायन मंडलियों द्वारा गाई जाती थी – ‘अइसन देसवा भवा है आजाद सजनी/जैसे फुरिया में भर गवा मवाद सजनी’।

लाल साहब के लिए भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारी आदर्श थे। क्रान्तिकारियों की परम्परा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से गोण्डा में 1981 में भगत सिंह के पचासवें शहादत दिवस पर जो समारोह हुआ, लालसाहब उसके मुख्य कर्ताधर्ता थे। शहीदों को केन्द्र करके उन्होंने कविता लिखी – ‘जिन्हें शहादत प्यारी थी/मौत भी जिनसे हारी थी/उनको मेरा लाल सलाम/सौ सौ बार लाल सलाम’। लाल साहब ने राजनीति, कविता, नाटक व शिक्षा के साथ साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी काम किया। लखनऊ से जब ‘नवभारत टाइम्स’ का प्रकाशन शुरू हुआ तो वे गोण्डा जनपद के नभाटा के संवाददाता के रूप में काम किया। उनके द्वारा नभाटा में लिखी टिप्पणियां, रिपोर्ट आदि जनपक्षधर पत्रकारिता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। अपने ऐसे महत्वपूर्ण साथी, रचनाकार व राजनीतिक कार्यकर्ता का निधन जनता के सांस्कृतिक व राजनीतिक आंदोलन की बड़ी क्षति है। जन संस्कृति मंच अपने ऐसे साथी को क्रान्तिकारी सलाम पेश करता है।

लेखक कौशल किशोर जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयोजक हैं.

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